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Friday 24 Nov 2017

रंगकर्मी सफदर हाशमी के शहादत दिवस पर काव्य गोष्ठी

पूर्णिया पाठक मंच, पूर्णिया के तत्वावधान में 4 जनवरी को वरिष्ठ कवि प्रो. इंदुशेखर की अध्यक्षता में रंगकर्मी स$फदर हाशमी के शहादत दिवस पर दो मिनट का मौन धारण कर उनके चित्र पर सुमनांजलि अर्पित की गई। साथ ही इस मौके पर एक काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। संचालन कथाकार, समीक्षक अरुण अभिषेक ने किया। सर्वप्रथम मंच से कवि उमेश पंडित 'उत्पलÓ ने अपनी कविता 'परदाÓ की पंक्ति- 'परदा साहब के चेंबर की जान है...Ó के माध्यम से संभ्रांत व्यक्ति के छद्म को उजागर किया है, वहीं शोध-छात्र चंद्रभूषण 'चंद्रÓ ने परदा के ही बिंब पर कविता की पंक्ति- 'कल सारी रात मैं ताकता रहा अपलक और सुबह हो गई...Ó को बड़े ही मोहक अंदाज में श्रोताओं के बीच रखा। शिवनारायण शर्मा 'व्यथितÓ ने मां के सांस्कृतिक सौंदर्य को व्यक्त करती हुई, कविता- 'मां की हंसीÓ का पाठ इस पंक्ति से किया कि 'मां की हंसी जब बनती है फूंक... तृप्त हो जाती है पूरी सृष्टि।Ó सुवंश ठाकुर 'अकेलाÓ ने अपनी कविता- 'माई का जागरण और भाई छुतहरूÓ सुनाई, जो मानवीय संवेदनाओं को बड़े ही शाइस्तगी से स्पर्श करती है तथा समाज के बुर्जवा चरित्र एवं सामंती सोच पर प्रहार करती है। अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि प्रो. इंदुशेखर ने अपनी लंबी कविता 'अश्वत्थामाÓ के सस्वर पाठ से श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर दिया।
-शिवनारायण शर्मा 'व्यथित'
पूर्णिया (बिहार)