Monthly Magzine
Saturday 25 Nov 2017

दूर के रिश्ते

निशान्त
वार्ड नं. 6, निकट वन विभाग
पीलीबंगा - 335803
जिला हनुमानगढ
मो.81044-73197
कई बार कहीं थोड़ा सा जाना भी हमें कई अमूल्य अनुभूतियां दे जाता है। अभी कल-परसों की बात है। भतीजी की लड़की की शादी में जाना हुआ। भतीजी की ससुराल मेरे पैतृक गांव से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है। हम भात (मायरा) लेकर गए थे। भाई-भतीजे, मित्र, औरतें और बच्चे। वहां पहुंचे तो समधी जी का बड़ा भाई जो कोई अस्सी-पच्यासी वर्ष का बूढ़ा था, हमें देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। खड़े होकर मेरा तो उसने मुंह ही प्यार से अपनी हथेलियों में भर लिया जबकि मैं कोई बच्चा या जवान नहीं था। साठ साल का था। हाल-चाल पूछे तो हाथ हिला-हिला कर कहने लगा-बड़े मजे हैं! बाप-दादों की मेहरबानी है। उनकी अच्छी सेहत का राज भी शायद खुश रहना था। नहीं तो इतनी उम्र में इतनी कड़क (दम) में आज कौन है? इनका छोटा भाई, हमारा समधी शराब के नशे के कारण, कब का ही काल कलवित हो चुका है। जहां तक मैं जानता हूं इन्हें कोई बुरी लत नहीं है। शराब तो क्या? ये तो हुक्का-बीड़ी भी नहीं पीते जबकि गांव में ये बीमारियां आम हैं।
    हम दिन डूबने से थोड़ा पहले ही गए थे। धुंधलका होने पर सजावट की रोशनी हुई तो बूढ़ा उन्हें देखकर कहने लगा-रावण आग से धुआं अलग न कर सका परन्तु आज के युग ने वह भी कर दिया। मुझे हैरानी हुई-देखो! इस अनपढ़ आदमी के दिल में विज्ञान के प्रति कितनी इज्जत है? हम जमाने को और विज्ञान को कितना ही कोसे। यह तो इस सब में भी खूब खुश है। आधुनिकता को पुराने संदर्भों से जोड़कर देखने की उसकी वृद्धि ने भी मुझे हैरत में डाला। आग से धुआं अलग करने की रावण की इच्छा कभी बचपन के दिनों में जब रामलीला देखा करते थे, तब सुनी थी अब तो उसका बिल्कुल ख्याल नहीं था और न यह अहसास था कि हम रावण के इच्छापूर्ण युग में जी रहे हैं। वाकई पुराने विज्ञान से आज का विज्ञान बहुत आगे निकल चुका है।
    मुझे अपने पैतृक गांव में कोठी बनानी है। उसारी के लिए मिस्त्री की जरुरत है। एक भतीजा इस गांव के एक मिस्त्री को जानता है। आज सुबह फोन से उससे सम्पर्क हुआ था। बारात आने में अभी काफी देर है। हमारे पास समय है इसलिए नक्शा दिखाकर खुलकर बात करने के लिए हम उससे मिलने निकल पड़ते हैं। मिस्त्री एक कोठी बनाने में लगा था। ढांचा खड़ा कर चुका था। लिपाई को लगा था। हमारा नक्शा देखकर कहने लगा-आओ! आपको मेरी बनाई एक और कोठी दिखाता हूं। आपका नक्शा उससे मिलता-जुलता है। उसे देखकर आपको कोई नई बात सूझ सकती है।
    हम उसके साथ गांव में और आगे निकल पड़े। साधारण घरों के बीच-बीच कई कोठियां डली थी। किन्नू के बागों से लोगों के यहां काफी कमाई होने लगी है। पढ़-लिखकर कई लोग नौकरियां लगे हैं। वहंी कई शहरों में जाकर कार्य-व्यापार भी करने लगे हैं। पैसा तो आना ही था। उसी की माया है। सब के न सही। कुछ के तो है। मिस्त्री अपनी बनाई कोठी दिखाता है। मेरे नक्शे से काफी मेल खाती है। परन्तु मेरे दिमाग में यही है कि मुझे तो अपने नक्शे मुताबिक ही बनानी है।
    हम देखकर वापिस उसी घर के दरवाजे पर आ जाते हैं जिस घर में मिस्त्री काम कर रहा था। दरवाजे के भीतर खड़ा होकर वह हमसे चाय पीकर जाने का अनुरोध करने लगता है। मैं कहता हंू-नहीं! आज तो चाय बहुत हो चुकी। हम यहां फलानों के विवाह में आए हुए हैं। मेरी आवाज सुनकर घर के भीतर से एक बूढ़ी औरत बाहर आती है। घूंघट निकाला हुआ है। मुझे देखकर उत्साह और खुशी से पूछती है-रामजी (मेरा बचपन का नाम) ही है क्या? भतीजा अपना और मेरा परिचय देता है। भतीजे की तो ननिहाल ही है यह। इसलिए उसे तो वह अच्छी तरह से जानती है। उसके सिर पर हाथ फिराती है। मुझे हाथों से इशारा करके अन्दर आने को कहती है। मैं हिलता नहीं तो अधिकारपूर्वक कहती है-आओगे कैसे नहीं? अपने दोलड़े (दोहरे) रिश्ते हैं।
मैं तुम सब को जानती हंू। वह मेरे सब भाई-बहनों के नाम गिनाती है। उसके प्यार और अधिकार को देखकर मैं ज्यादा 'नाÓ नहीं कर सका। भीतर हो लिया। वह प्यार के अतिरेक में उत्साहित होकर अपना परिचय बताती रहीं।
वह हमारे गांव की ही लड़की है। उसका बाप हमारा दूर का रिश्तेदार था। मुझे उनके पचास वर्ष पहले वाले घर की याद आती है और याद आती उस घर में फिरती गौर वर्ण की एक सुन्दर युवती।
तो वह सुन्दर जवान लड़की आज इस हाल में है। घंूघट सम्भालते वक्त  उसका थोड़ा सा चेहरा दिखाई पड़ा था। वर्ण तो अभी भी गौर है लेकिन सलवटें पड़ी हैं। परन्तु प्यार में कोई कमी नहीं। उसके साथ हमारा एक रिश्ता तो आप जान ही गए होंगे। दूसरा रिश्ता मैं तो नहीं जानता अब यह बता रही है। मेरी सास की और इसकी सास की आपस में कोई रिश्तेदारी है। वह अपने पति से भी कहती है कि आपकी माता जी का और इनकी सास का फलां-फलां रिश्ता था। उसके बताएं रिश्तों के तार अपने से जोडऩे की मुझमें कोई रुचि नहीं जगती। इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं देता। ऊपरी तौर पर हूं-हां! करता रहता हंू। आधुनिक जो हो गया हूं। परन्तु उसके प्यार के नाप से मैं सोचता हूं कि उसके साथ हमारे रिश्ते दूर के नहीं बल्कि निकट के हैं।
जब इतना परिचय और प्यार हो गया तो चाय तो पीनी ही थी। चाय पीते हुए उसने अपनी राम कहानी भी सुना दी कि उनका बड़ा लड़का उनसे रुठा हुआ है। बाहर (जहां मैं रहता हूं) रहता है। वह कहती है-गांव में आता है तो हमें तो मिलने भी नहीं आता। हमने दोनों भाईयों के बीच बंटेज कर दिया। जितना धन उसे आता था, सब दे दिया। वह हमारे (बूढ़े-बूढ़ी के) हिस्से में से भी हिस्सा मांगता है। अब बताओ हमें क्या नहीं चाहिए?
उसकी राम कहानी सुनते हुए मुझ में थोड़ा-थोड़ा उबाल आ रहा था कि जाकर इनके बेटे से बात करुंगा। परन्तु मैं जानता था कि वह अक्खड़ स्वभाव का है। मेरी बात नहीं मानेगा। इसलिए चाहते हुए भी प्रकट में मैं उन्हें कोई आश्वासन नहीं दे पाया। बस ढेर सारा प्यार बटोर कर चला आया। उनका यह प्यार उन लोगों के चेहरे पर एक तमाचा है जो कहते फिरते हैं कि आज कोई किसी को नहीं चाहता। धन्य है वह बुढिय़ा जो इतनी सताई होने के बावजूद अपने इतने दूर के एक रिश्तेदार से इतना प्यार जताती है।