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Wednesday 22 Nov 2017

कुंग-फू से महिलाओं का सशक्तिकरण

संगीता गुप्ता
सी-4 टावर, 10 न्यू मोतीबाग कॉम्प्लेक्स
नई दिल्ली- 23
स्त्रियों की आवाज को परंपरागत तौर पर बौद्ध धर्म सहित सभी धर्मों में दबाया जाता रहा है। 800 वर्ष प्राचीन ड्रूक्पा या ड्रैगन, जिनके प्रधान ड्रूक गावा खिलवा (डी.जी.के) हैं, ने इन महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन करने का संकल्प लिया।
ड्रूक्पा के आध्यापिक प्रमुख पवित्र ग्यालवांग ड्रूक्पा कहते हैं : ''भारत और तिब्बत में जी रही भिक्षुणियों को मैंने दयनीय स्थिति में पाया। उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता रहा जबकि सभी विशेषाधिकार भिक्षुओं को दिए गए थे। मैं इनमें परिवर्तन चाहता था।ÓÓ
आमतौर पर भिक्षुणियां बौद्ध मठों में केवल उबाऊ घरेलू कार्यों में ही संलिप्त रहती थीं। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ड्रूक गावा खिलवा मठ अपनी भिक्षुणियों को भौतिक एवं शारीरिक कलाओं के साथ-साथ कुंग-फू एवं ध्यान-साधना के लिए प्रशिक्षित करता है। डी.जी.के. की भिक्षुणियां जो दूरस्थ क्षेत्रों जैसे आसाम, तिब्बत एवं कश्मीर से आती हैं, अब उन्हें प्रार्थना नेतृत्व करने और आधारभूत व्यावसायिक कौशल की शिक्षा दी जाती है। वर्तमान में भिक्षुणियां अतिथि-गृहों और कॉफी की दुकानें चलाने के साथ-साथ आपूर्ति हेतु वाहन भी चलाती हैं।
उनका कहा है : ''आध्यात्मिक और शारीरिक एवं भौतिक समृद्धि दोनों ही समान रूप से हमारी भिक्षुणियों के लिए महत्वपूर्ण है।ÓÓ
मठों में कुंग-फू की शुरूआत 2008 में हुई। 12वें पवित्र ग्यालवांग ड्रूक्पा स्कूल के प्रमुख ने अपनी उत्तरी वियतनाम यात्रा में भिक्षुणियों को कुंग-फू प्रशिक्षण में संलग्न पाया। ग्यालवांग ड्रूक्पा ने महिला मार्शल आटर््स (कला) में प्रशिक्षित भिक्षुणियों को देखा और सुखद आश्चर्य से भर गए। उनका कहना है, ''मैं बहुत प्रभावित हुआ क्योंकि इन वियतनामी भिक्षुणियों ने जबरदस्त आत्म-विश्वास और शक्ति का प्रदर्शन न केवल अपनी दिनचर्या में किया बल्कि अपनी बिरादरी से बाहर वालों के प्रति रवैये में भी किया।ÓÓ कुंग-फू, लम्बे समय से एक पृथक बौद्ध सम्प्रदाय के द्वारा स्थापित किया गया था जो पारंपरिक चीनी मार्शल आट्र्स केन्द्रों एवं प्रसिद्ध शाओलिन मंदिर द्वारा दक्षिण के देशों में प्रसारित किया गया।
वियतनामी ड्रूक्पा भिक्षुणियों ने मार्शल आटर््स प्रशिक्षण की शुरूआत सन् 1992 में की थी, जब उनके स्थानीय धार्मिक प्रमुख एवं परम आदरणीय थीच-विएन-चान्ह ने ताय-थियेन मठ में इस परंपरा की शुरूआत की थी। इसकी शुरूआत केवल तीन भिक्षुणियों से की गई थी और अब 80 से ज्यादा भिक्षुणियां प्रशिक्षित हैं। उनमें से कई नेपाल में अपनी बहनों से जुडऩे को उत्सुक थी ताकि वे ग्यालवांग ड्रूक्पा के और निकट सम्पर्क में आ सकें और प्रशिक्षण देने का कार्य कर सकें। शुरूआत में भिक्षुणियां वियतनामी सेना के सिपाहियों के द्वारा कुंग-फू कौशल में प्रशिक्षण की गईं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह कार्यक्रम कुंग-फू-ग्रैंडमास्टर के पुरुष छात्र, महिलाओं को शाओलिन तरीके से, खासतौर पर वियतनामी मार्शल आट्र्स का प्रशिक्षण दे रहे हैं। ताय-थियान की प्रमुख भिक्षुणी जिग्मे सामतेन वांग्मो, जो कि वियतनामी हंै लेकिन अपने तिब्बती धार्मिक नाम से जानी जाती हैं, कहती हैं कि इन स्वदेशी शैलियों में से एक, किन्ह थुआट, ''ट्रॉन राजवंश के जनरलों और योद्धाओं के द्वारा रची गई थी, जिन्होंने हमलावर चंगेज खां को हराया था।ÓÓ
परम पूज्य ने न केवल मार्शल आटर््स की शुरूआत की बल्कि उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए चार अनुभवी वियतनामी ड्रूक्पा भिक्षुणियों की ही सेवाएं प्राप्त की क्योंकि उनका मानना था कि प्रशिक्षक के रूप में भिक्षुक केवल लिंग मानसिकता को ही मजबूती प्रदान करेंगे। शारीरिक एवं आध्यात्मिक सशक्तिकरण उनका मिशन बन गया। उनका कहना था : ''यहां आने से पहले जो लड़कियां स्वतंत्रता की चाह में हिमालय के विभिन्न हिस्सों में जाकर भिक्षुणियां बनी थीं उनमें से अधिकांश मठों या अपने गुरु परिवारों की सेवा में घरेलू कामकाज करते हुए मिट गईं।ÓÓ
अपने यौवन के 20वें साल में ही पुरुष-प्रशिक्षित वियतनामी युवतियां अपनी नई विशेषताएं, इन भिक्षुणियों को प्रदान कर रही हैं। लद्दाख की एक मृदुभाषी भिक्षुणी कहती हैं कि कुंग-फू ने भिक्षुणियों को आत्म-विश्वास दिया है और यह ध्यान-साधना में भी सहायक है। वे अब आश्वस्त हैं कि अपनी आत्मरक्षा कैसे की जाती है।
वर्षों पहले एक भिक्षुणी ने मठ में शामिल होने के लिए अपना परिवार और कश्मीर में पुलिस अधिकारी के रूप में अपना भविष्य त्याग दिया था। उनका कहना है कि महिलाएं अब पहले की तुलना में भिक्षुणी बनने में ज्यादा रुचि रखने लगी हैं।
भारत की एक भिक्षुणी कहती हैं कि कुंग-फू उसे ध्यान-साधना में सहायता प्रदान करता है। यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। ध्यान-साधना बहुत कठिन है और यदि वह कुंग-फू करती है तो उसके बाद ध्यान-साधना ज्यादा सरल हो जाती है।
भारत की एक दूसरी भिक्षुणी कहती हैं कि वह कुंग-फू पसंद करती हैं क्योंकि यह उसे शक्ति प्रदान करता है। वह कहती हैं: ''यह हमारी सुरक्षा के लिए बहुत उपयोगी है। यदि कोई हमें छेड़ता है या कुछ और उल्टी-सीधी हरकत करता है तो हम उसे सबक सिखा सकती हैं।ÓÓ
इन युवा भिक्षुणियों द्वारा प्रदर्शित आत्मविश्वास असाधारण है। हिमालय की बौद्ध भिक्षुणियों को भिक्षुकों की तुलना में प्राय: कमतर करके देखा जाता रहा है। एक अंग्रेज महिला जो कि ड्रूक्पा भिक्षुणी बन गई कहती हैं कि पारंपरिक तौर पर भिक्षुणियों को उपेक्षित और अनदेखा किया जाता रहा है। भिक्षुणियों के साथ मुख्य समस्या यह है कि वे प्रतिकूल परिस्थितियों में रहती आई हैं। उन्हें लोगों से वह सहयोग एवं समर्थन नहीं मिला जो भिक्षुकों को मिलता आया और उन्हें शिक्षा भी नहीं दी गई। आज वे अपने मार्शल आटर््स के कौशल का प्रदर्शन कर रही हैं, उनकी ऊर्जा ब्रह्मांडीय ओज से ओतप्रोत प्रतीत होती है। मुंडित मस्तक और गहरे कत्थई लबादे में लिपटी तरुण भिक्षुणियां छरहरी और चुस्त-दुरुस्त दिखती हैं।
वैश्विक बौद्ध पदानुक्रम में बहुत उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित पवित्र बौद्ध संन्यासी ग्यालवांग ड्रूक्पा ने कहा है : ''स्त्री एवं पुरुष दोनों की ऊर्जा पृथक है। एक बेहतर दुनिया के लिए स्त्री एवं पुरुष, दोनों की ऊर्जा की आवश्यकता होती है।ÓÓ
उन्होंने कहा, यह एक वैज्ञानिक सिद्धांत है, यह एक ऐसा मौलिक रिश्ता है जैसा सूर्य और चन्द्रमा के बीच का है और इसका महत्व सर्न की विशाल ''बिग बैंगÓÓ मशीन, द लार्ज हार्डन कोलाइडर (एल.एच.सी.) में कणों की टकराहट के समान है।
उनका मानना है कि उनके पूर्व के आध्यात्मिक गुरुओं ने महिलाओं के उत्थान के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किया। उनका कहना है : ''जब मैं बहुत छोटा था, तब से सोचा करता था कि महिलाओं को समाज में दबाना ठीक नहीं है। जब मैं बड़ा हुआ तब मैं यह सोचने लगा कि मैं उनके लिए क्या कर सकता हूं? तब मैंने सोचा कि मैं एक मठ बनाऊं और उन्हें वहां आध्यात्मिक रूप से अध्ययन एवं अभ्यास करने का अवसर प्रदान करूं।ÓÓ ग्यालवांग ड्रूक्पा द्वारा निर्मित अमिताभा ड्रूक्पा मठ पूजा-अर्चना एवं अध्ययन हेतु एक आधुनिक, सु-वित्त-पोषित एवं सुसज्जित मठ है।
भिक्षुणियों को साथ ले दूसरे देशों के लोगों को उनके मार्शल आटर््स प्रदर्शन का आनंद प्रदान करवाते हुए, वे कहते हैं-मुझे ऐसे प्रदर्शन के माध्यम से लैंगिक समानता के प्रति जागरुकता बढ़ाने की आकांक्षा है।
उन्होंने कहा कि भिक्षुणियों को इससे बड़े पैमाने पर लाभ हुआ है। तिब्बत एवं उसके आसपास के इलाकों में सदियों से बड़ी सख्ती से महिलाओं को मार्शल आट्र्स के किसी भी रूप का अभ्यास करने से रोका जाता रहा है। लद्दाख के हिमालय क्षेत्र में स्थित अपनी मातृभूमि के संदर्भ में ग्यालवांग ड्रूक्पा ने कहा है-महिलाएं मुख्य रूप से बौद्ध संन्यासियों की नौकरानियां, बावर्चियां एवं सफाई कर्मियां रही हैं।
दैनिक कार्यशाला एवं अभ्यास केवल आत्मरक्षा, आसन और ध्यान-साधना में मदद नहीं करता। कुंग-फू कक्षाएं एक प्रकार की बहाली या भर्ती का माध्यम भी साबित हुआ है। शैक्षणिक कार्यक्रमों यथा अंग्रेजी भाषा की कक्षाएं, कम्प्यूटर कौशल और सही मायने में मार्शल आटर््स ने आने वाली भिक्षुणियों की संख्या में इजाफा किया है।
भिक्षुणियों और मार्शल आटर््स का एक लंबा इतिहास रहा है। बौद्ध भिक्षुणी एंजी मुई विंग-चुन (जिसका अध्ययन ब्रुस-ली ने किया) को लगभग 300 साल पहले इसको प्रारंभ करने और उसका नामकरण अपने पहले शिष्य यिम-विंग-चुन के नाम पर करने का श्रेय जाता है। मार्शल आटर््स (शाउलिन-कुंग-फू) की खोज के पीछे मूल कथा स्वत: बौद्ध संन्यासी कमोवेश कमजोर एवं क्षीण दिखते हैं उन्हें कैसे सशक्त एवं सक्षम बनाया जाए। इन भिक्षुणियों को देखकर ऐसा लगता है कि कुंग-फू अपनी जड़ों की ओर वापस जा रहा है।
एक भिक्षुणी का कहना है-यह बहुत अच्छा अभ्यास है, दूसरी बात यह कि यह अनुशासन और एकाग्रता के लिए बहुत अच्छा है,तीसरी यह कि यह आत्मविश्वास की भावना पैदा करती है जो भिक्षुणियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और चौथी यह कि जब पुरुषों को यह पता होता है कि भिक्षुणियां कुंग-फू में प्रशिक्षित हैं तो वे सम्माननीय दूरी बनाए रखते हैं। अब भिक्षुणी बनने की रुचि बढ़ती जा रही है क्योंकि महिलाओं को बेहतर शिक्षा और अभ्यास कार्यक्रम मुहैया कराया जा रहा है।