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Sunday 19 Nov 2017

एक धूप थी जो साथ गई आफ़ताब के...

शेख मोहम्मद कल्याण
505/2 नरवालपाईं  एयर पोर्ट रोड सतवारी                                                   
जम्मू -180003
मो. 09697018943
रोज़ की तरह उस दिन भी मैं ठीक आठ बजे अपने ऑफिस पहुँच गया काम में व्यस्त हो गया था। बीच-बीच में डॉ. गुप्त से पिछली रात हुई बात मन को गुदगुदा रही थी। रात लगभग आठ बजे उनका फोन आया और भरपूर ठहाके के साथ कहने लगे,  सर जी, तुहारी रिपोर्ट मिली ए मैनु, तुस्सी देर रात तक करों बार रहनदे औ।  मैंने कहा डॉ. साहब नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।  फिर उन्होंने एक बड़ा सा जोरदार ठहाका लगाया,  सर जी, मेरे कौल तुहाड़ी पूरी डीटेल ए। मैं जद वी फोन करनां तुस्सी कार ही नई होन्धे।  दरअसल, डॉ. गुप्त अक्सर मेरे लैंड लाइन नंबर पर बात करते थे, और घर पर मेरी पत्नी ही अक्सर फोन उठाती तो जिस से उन्हें मालूम हो जाता कि मैं घर पर नहीं हूँ । कहाँ मैं एक छोटा सा लेखक और कहाँ डॉ. गुप्त की शख्सियत। लेकिन इसके बावजूद हमारे बीच अच्छी आपसी समझ विकसित हो चली थी। हम हर विषय पर गंभीर चर्चा तक भी कर लेते थे। वे अक्सर मुझे सर कहकर ही बुलाते जबकि उनका सर कह कर संबोधित करना मुझे अच्छा नहीं लगता था, लेकिन इस एक शब्द में अपनेपन की सोंधी महक थी। मैं डॉ. गुप्त की इन्हीं बातों को याद कर रहा ही था कि अशोक कुमार जी का फोन आया, कल्याण,  डॉ. साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्होंने केवल इतना ही कहा और फोन काट दिया, मैंने फिर से उनका नंबर डायल किया और पूछा कि, अशोक सर, कौन से डॉ. साहब? वो केवल इतना ही कह पाये कि डॉ गुप्त। मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरे पैरों तले ज़मीन ही नहीं रही। मैंने फिर पूछा कैसे ? अभी रात को ही  तो उन्होंने मुझसे बात की थी, फिर अचानक यह सब कैसे?  मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिनसे मैंने कुछ घंटों पहले हंस-हंस कर लंबी बात की हो उन्हें समय के क्रूर पंजों ने हमसे छीन लिया है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। फिर भी अपने कर्तव्य की पूर्ति करते हुए अपने कुछ साहित्यिक मित्रों को सूचना दी। जिस किसी ने भी सुना वह अवाक रह गया। जो कि स्वाभाविक ही था क्योंकि अभी फिर से डॉ. गुप्त ने अपने आपको एक अरसे के बाद साहित्यिक रूप से सक्रिय कर लिया था, जो जम्मू की साहित्यिक गतिविधियों को ऊंचाइयों की ओर ले जा रही थीं। शमशान भूमि पर जब उनकी शवयात्रा पहुंची तब ऐसा लगा कि जैसे एक युग का अंत होने जा रहा हो।
  उनके अंतिम संस्कार से लौट कर जब मैं घर वापिस आया बिस्तर पर लेटते ही मुझे स्मृतियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया।  मुझे याद आने लगा कि कैसे मैं पहली बार डॉ. गुप्त से मिला और कहाँ .... जहां तक मुझे याद है, बात उन  दिनों की है जब मैं नया नया युवा हिन्दी लेखक संघ (युहिले) का सदस्य बना था। 1991 के हिन्दी दिवस पर युहिले ने काव्य पाठ का आयोजन युहिले कार्यालय में ही रखा हुआ था मैंने भी कुछ कविताएं उस गोष्ठी में पढ़ीं थीं। ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा बहुत निरंतर लिखता था और शहर में मेरा नोटिस भी लिया जाने लगा था। युहिले अपनी परंपरा के अंतर्गत नियमित गोष्ठियाँ करवाता था।  अच्छे साहित्यकार हमें सुनते थे और हमारी रचना पर बात करते थे। डॉ. गुप्त भी उनमें से एक थे। मेरी जिंदगी में बहुत से लोग आए जिनके आशीर्वाद से मैंने साहित्य को जानने समझने की शुरुआत की। उन में से डॉ. ओम प्रकाश गुप्त भी एक थे।  एक बार युहिले की गोष्ठी में उन्होने मेरी कविताएं सुनी और मुझे कहने लगे, कल्याण, कभी समय मिले तो अरुण बज़ाज़ के साथ घर आना।।  उनका मेरे जैसे नए चेहरे को इस तरह घर बुलाना, मुझे सचमुच चकित कर रहा था।  सीधे-सीधे कहूँ तो मुझे डर भी लग रहा था कि कैसे मैं उस महान साहित्यकार के घर जाने की हिम्मत करूँ पर अरुण बज़ाज़ ने मेरी हिम्मत बढ़ाई और हम एक दिन पहुँच गए डॉ. साहब के घर। मुझे याद है कि जनवरी माह का शायद पहला या दूसरा सप्ताह था, हल्की बारिश और ठंड से ठिठुरन ,पर फिर भी डॉ. गुप्त से मिलने की गरमाहट से मन में कुछ अजीब उठापटक चल रही थी।  जब अरुण बज़ाज़ ने दरवाज़े की घंटी बजाई तो डॉ. गुप्त खुद गेट खोलने आए उन्हें देखते ही मैंने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें नमस्ते कहा और उन्होंने हमें भीतर ले जाकर ड्राइंग रूम में बिठाया और कहा- मैं आया अरुण जी। कोई पाँच मिनट के अंदर ही डॉ. गुप्त के सामने मैं और अरुण बैठे थे।  मेरे मन में तब अजीब सा कौतूहल चल रहा था कि बात कहाँ से शुरू की जाए, तभी अरुण ने कहा- डॉ. साहब कल्याण आजकल अच्छी कविताएं लिख रहा है और युहिले का काम भी बड़ी ईमानदारी से कर रहा है।  डॉ. गुप्त ने मेरी ओर देखा और कहने लगे, अरुण जी यह तो अच्छी बात है, किसी संस्था को चलाने के लिए ऐसे युवाओं को सामने आना चाहिए।  कल्याण अगर आपको बुरा न लगे तो एक बात पूछूं।  मैंने कहा जी- डॉ साहब। कल्याण मुझे आपके  नाम के बारे में आपसे कुछ पूछना है, तो मैंने कहा पूछिये डॉ. साहब। डॉ साहब ने कहा,  कल्याण, तुम तो मुस्लिम हो, शेख मोहम्मद कल्याण, फिर कल्याण क्या तुमने तखल्लुस रखा हुआ है ?  मैंने कहा नहीं, डॉ. साहब तखल्लुस नहीं, कल्याण हमारी सब कास्ट है। डॉ साहब ने फिर पूछा, कहाँ रहते हो? क्या करते हो?  बातों के सिलसिले को यूं ही बढ़ाए रखा था डॉ. साहब ने।  तब तक बारिश तेज़ हो चुकी थी, डॉ. गुप्त की पत्नी जिन्हें हम आंटी कहकर बुलाते थे, ने गरम गरम चाय के साथ गरम गरम पकोड़े भी टेबुल पर रख दिए थे, चाय की चुिस्कयों संग हमारे बीच की सारी झिझक बारिश के पानी में बह चली थी।  डॉ. गुप्त जैसी महान हस्ती मेरे सामने बैठी थी और मैं एक छोटा सा लेखक ... खैर, चाय ख़त्म होते तक बारिश भी बंद हो़  चुकी थी और हमने डॉ. गुप्त से इजाज़त ली और जैसे ही गेट से बाहर निकले डॉ. गुप्त ने विशेष रूप से मुझे कहा- कल्याण, फिर कभी आना , जी सर, ज़रूर और हमने स्कूटर स्टार्ट किया और निकल पड़े अपने-अपने घर की ओर, पर मन में जैसे बसंत के तमाम फूल आज ही खिल उठे थे।  फिर तो डॉ. गुप्त के घर आने जाने का सिलसिला नियमित चल पड़ा था, और डॉ. गुप्त के संबंध मुझसे और गहरे होते चले गए। युवा हिन्दी लेखक संघ को लेकर अक्सर डॉ. गुप्त मुझसे चर्चा करते रहते।  इस बीच मैं युवा हिन्दी लेखक संघ का अध्यक्ष हो गया था। 2005 की बात है, हमने युहिले की ओर से दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन रखा, जिसमें मुझे लगा कि एक पूरा सत्र डॉ. गुप्त के समग्र लेखन पर ही केन्द्रित किया जाए और हमने किया भी, पर उस सत्र में डॉ. गुप्त नहीं आ सके क्योंकि उन दिनों उनकी सेहत ठीक नहीं चल रही थी । तब पंजाब की साहित्यकार डॉ. कीर्ति केसर और डॉ. रजनी ने डॉ. गुप्त के लेखन पर अपने अपने पत्र प्रस्तुत किए। वो दोनों पत्र हमने युहिले पत्रिका में प्रकाशित भी किए थे।  मैं अक्सर डॉ. गुप्त से मिलने उनके घर जाया करता हमारे बीच साहित्यिक गैर साहित्यिक बातें होतीं।  बातों ही बातों में कई बार जम्मू के साहित्य पर चर्चा करते-करते वह गंभीर हो जाते और याद करते अपने पुराने दिनों को कि कैसे और किन हालातों में उन्होंने युवा हिन्दी लेखक संघ की नींव रखी, कौन कौन लोग उस समय साथ थे,  जिनमें से बहुत तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले ही उन्होंने युवा हिन्दी लेखक संघ को फिर उसी उच्च स्थान पर ले जाने का संकल्प लिया। और इसी सिलसिले में हमारे बीच बहुत गंभीर बातें होतीं और हमारे बीच केंद्र बिन्दु हमेशा जम्मू का साहित्य होता और डॉ. गुप्त नए लेखकों को सुनकर हमेशा ही संतुष्ट होते और कहते कि जम्मू के नए लेखक मुख्य धारा से कहीं भी कम नहीं हैं चाहे कविता की बात हो या कहानी की।  और इन छह माह में उन्होंने फ़ेसबुक पर भी अपने आपको सक्रिय कर लिया था। हमारी घंटों आपस में 'चैटÓ होती और मुख्य बात कविता को लेकर ही होती।  वह इस बात से बहुत संतुष्ट थे कि जम्मू में जो नए लेखक इन दिनों हिन्दी कविता लिख रहे हैं उस कविता को किसी भी तरह से कम नहीं आँका जा सकता। अक्सर ऐसी चर्चा हमारी बातों में रहती।
 एक अरसे के बाद डॉ. गुप्त युहिले की हर गोष्ठी में, बाकायदा, बिना नागा आने लगे थे । मुझे याद है, एक दिन डॉ. गुप्त ने मुझे घर पर बुलाया।  वैसे तो हम जाते ही रहते थे पर उस दिन डॉ. साहब ने मुझे ज़ोर देकर कहा कि कल्याण, ऑफिस से घर जाते हुए मुझसे मिलकर जाना। मुझे अच्छा लगा, मैंने सोचा कि शायद डॉ. साहब को कोई नई योजना बनानी होगी युहिले के अगले कार्यक्रम की, और मैं दोपहर लगभग ढाई बजे उनके घर पहुँच गया। बातों-बातों में उन्होंने अपने नये काव्य संग्रह  तोषी तथा कुछ अन्य कविताएं पर कुछ लिखकर मुझे देते हुए, कहा, कल्याण, यह प्रति तुम्हारे लिए। मैंने उन्हें धन्यवाद कहा और उनसे विदा लेकर घर आ गया।  घर पर खाना खाने के बाद मैंने पुस्तक खोली तो मैं हैरान रह  गया, डॉ. साहब ने लिखा था कि  युहिले के कल्याण के लिए, मैं स्तब्ध, कि डॉ. साहब ने मुझे युहिले से किस तरह जोड़ दिया जैसे संस्था का सारा दारोमदार मुझी पर हो। जबकि सभी जानते हैं कि संस्था किसी भी एक आदमी की नहीं होती बहुत से साहित्यकार जब मिलकर बैठते हैं तब संस्था बनती है । दूसरा झटका मुझे तब लगा जब मैंने डॉ. साहब का लिखा आत्मनिवेदन पढ़ा , जिसमें डॉ साहब ने मेरा हवाला देते हुए लिखा था कि आपकी कोई नई पुस्तक आ रही है ?  कल्याण ने सहज भाव से ही पूछ लिया था। मन में कांटा सा अड़ गया। साहित्य संगम पब्लिकेशन्स के सुदेश महाजन से बात की तो उन्होंने पूरा मैत्री भाव उड़ेलते हुए कहा- पुस्तक ले आइये । सो बन गई यह पुस्तक तोषी तथा अन्य कविताएं । ऐसी थी डॉ. गुप्त की शख्सियत। उनका यूं चले जाना हमारे लिए तो नुकसानदेह है ही पर हमारे साथ जम्मू के पूरे साहित्य परिवेश की जो क्षति हुई है। ऐसी क्षति कि जिसकी भरपाई हो ही नहीं सकती।