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Tuesday 21 Nov 2017

सांस्कृतिक समन्वय और भक्ति साहित्य

बारीस जयंतिलाल बी
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर; गुजरात
सांस्कृतिक चेतना की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सार्वभौम सत्य के आधार पर प्रतिष्ठित धार्मिक भावना और दार्शनिक चिन्ताधारा के माध्यम से हुई है। कला, शिल्प, साहित्य और संगीत इन्हीं की आनुषंगिक उपलब्धियां हैं। इन सबका क्षेत्र विशाल मानव समाज है, जिसकी प्रेरणा और प्रसाद से मनुष्य जीवन-यापन करता है। भारतीय जीवन में समय-समय पर विदेशी विजातीय तत्वों के आते रहने के कारण परस्पर संघात होते रहे हैं। परन्तु इन्हीं से होकर ऐसी जीवनी शक्ति का संचार भी होता रहा है कि हम डूबते-डूबते भी उबरते चले आये हैं। इन सबके मूल में हमारी समन्वय साधना की प्रवृत्ति उजागर रही है, जो ब्राह्मण युग से ही उतर भारत में व्यक्त हो चुकी थी। परवर्ती गुप्त काल में वैदिक धर्म का पुनरुत्थान हुआ और देवी-देवताओं तथा देवालयों की स्थापना द्वारा लुप्तप्राय धर्म-व्यवस्था को पुनर्जीवित किया गया। उन दिनों वैष्णव धर्म को विशेष प्रोत्साहन मिला और स्मृति-ग्रन्थों में लोक प्रचलित विश्वासों तथा मान्यताओं को भी स्थान दिया गया।
पुराणकारों ने समन्वय साधना की प्रवृति को पुनर्जाग्रत किया। परम्परा दृष्टि भेद, रूचि वैविध्य, देशकाल तथा तत्कालीन समाज से प्रेरणा ग्रहण कर उन्होंने दोनों रूप से पूजा-उपासना तथा कर्मकांडीय पद्धतियों को अपनाकर उनमें दार्शनिकता का पुट दे दिया। मूर्तिपूजा , अवतारवाद, धर्मशास्त्रों का सम्मान और कर्मफल में विश्वास पौराणिक धर्म की प्रमुख विशेषताएँ थी, जिन में लोक विश्वास का भी योगदान रहा। साधु-संन्यासियों का सम्मान और स्वर्ग-नर्क, श्रद्धा, पिण्डदान आदि इस युग की अन्य उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं जिनकी धुरी पर हिंदू जीवन चक्र चलता रहा और इस्लाम के भारत प्रवेश के पूर्व तक  प्रचलित रहा।
मध्यकालीन हिंदू समाज के दो पक्ष हमारे सामने आते हैं, एक वह जो शास्त्रों का समर्थक है और दूसरा वह जो परम्परागत विश्वासों तथा मान्यताओं अथवा स्वानुभूति का पक्षधर है। यह दूसरा पक्ष ही पौराणिक पक्ष है। परन्तु हम बहुधा यह पाते हैं कि दोनों पक्षों में परस्पर अन्तरावलम्बन है। कभी-कभी जन-घोषित विश्वास शास्त्र-सम्मत बन जाते हैं, तो कभी  शास्त्र विहित मान्यताएँ जनता द्वारा अस्वीकृत हो जाती हैं। इन सभी में ईश्वर को निरपेक्ष मानकर उसकी भक्ति का प्रतिपादन किया गया है, परन्तु आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म आदि के सिद्धांत प्राय:ज्यों के त्यों रह गये हैं।
ईश्वर और मनुष्य के बीच सम्बन्ध स्थापित करने का एक माध्यम धर्म है। जाति, कुल, देश काल और परिस्थितियों से निरपेक्ष होकर नैतिक दायित्वों का निर्वाह करना धर्म है। धर्माचार अथवा नैतिकता समाजपरक है और धर्म साधना व्यक्तिनिष्ठ है। साध्य और साधक का एकीकरण साधना के माध्यम से होता है। साधना का विकास रूचि-शिक्षा और संस्कार के अनुसार कई रूपों में होता है। स्थूल रूप में साधना के तीन अंग है देवाराधन, संस्कार-मूलक क्रिया और नित्य, नैमितिक कर्म। देवाराधन के भी दो रूप हैं- आत्मविश्वास मूलक योग और आराध्यनुग्रह मूलक भक्ति। आत्मा रक्षा की वृत्ति ने मनुष्य को देवाराधन की ओर प्रवृत्त किया फलस्वरूप कल्याणकारी शक्तियों को व्यक्तित्व प्रदान करके उन्हें मानवीय इच्छाओं, उद्देश्यों, विचारों तथा संवेदनाओं से सम्पन तथा भावापन्न मान लिया गया। भगवान के सगुण और साकार के रूप का इसी प्रकार विकास हुआ।
शक्ति-सम्पन समर्थ व्यक्तियों की मरणोतरकालीन आत्माओं को अलौकिकता प्रदान कर उन्हें कल्याणप्रद शक्तियों से सम्बद्ध कर देने की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। कुलदेवता और ग्रामदेवता इन्हीं की उपज है। जिनके प्रतीक पिण्ड तथा पदार्थ बने। इसी प्रकार सशक्त तथा सहायक पशु-पक्षियों की आत्माओं से टोटेमवाद और फिटिशवाद का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्हें भौतिक आपदाओं के कारण मान लिया गया और उनकी तुष्टि के लिए धातुविद्या तथा जटिल साधना-विधान का विस्तार हुआ।
संस्कारग्रत जनता में आज भी भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी-शक्ति तथा उनसे त्रास दिलानेवाले ओझा आदि के झाड़-फंूक, मन्त्र-तन्त्र, की मान्यताएँ पायी जाती हैं। साध्य की अपेक्षा साधना पर अधिक बल दिया जाने लगा है, जो कभी-कभी जड़ता को जन्म देती है। इसलिए साधना के विकृत और विस्तृत रूप की आलोचना उपनिषद काल से लेकर श्रवण युग तक होती रही, जिसे संतवाणियों में मुखर पाते हैं।
मध्यकाल में हिंदू समाज की बृहतर इकाई गांव था और लघुतर इकाई परिवार, जो जीविका के सम्मिलित साधनों से युक्त था। अयोग्य पति की पत्नी होकर भी नारी सम्बन्ध-निर्वाह करने को बाध्य थी। सतीत्व के यथार्थ गौरव से अनभिज्ञ नारी और उसकी सन्तान से बना हिंदू समाज मध्यकाल की विडम्बना रहा है। मध्यकाल में अरुचि और संस्कार का प्राधान्य था। इस कारण बहुधा सामंजस्य बिगड़ जाता था और संतुलन बनाये रखने के लिये बार-बार समन्वय की और उन्मुख होना पड़ता था। समन्वय हमारे संस्कार में था, इसलिए उसे लाने में विध्न-बाधाओं के रहते भी कठिनाई नहीं होती थी। वैदिक वांग्मय में भी इसके बीज मिलते हैं जैसे- रामो व्यपकोडत्र शिवरूपरम कारणम।  लोकविश्वासों पर आधारित लोक धर्म की निष्ठा किसी धर्म विशेष के प्रति न थी। उसका धर्माचार परम्परागत और चमत्कार प्रभावित था। आदिवासियों का धर्म अधिकतर उन्हीं तक सीमित था, परन्तु सम्पर्क द्वारा वे परस्पर न्यूनाधिक रूप में अनुप्राणित होते रहते थे और जाने अनजाने एक दूसरे का अनुकरण करने में भी हिचकते न  थे। फिर भी उन दिनों हिंदू-इस्लाम दो ही मुख्य धर्म थे।
मध्यकालीन भक्ति साहित्य प्राय: रूपमय है और वहाँ साहित्य काव्य का यथार्थ है। इसलिए काव्य रसिकों अथवा साहित्य पारखियों का ध्यान यथावसर उन मानदण्डों की ओर आकर्षित हो जाता है जिन्हें उत्कृष्ठ काव्य की कसौटी मान लिया गया है, और जो किसी-न-किसी काव्यशास्त्रीय परम्परा का अनुसरण करते हैं। मध्यकालीन भक्ति साहित्य की उपलब्ध सामग्री कई रूपों, स्तरों और वर्गों में पायी जाती है। अधिकांश पूर्ववर्ती इतिहास लेखकों की यह सामान्य धारणा रहती है कि भक्ति साहित्य मात्र वैष्णव धर्म की उपज है, जिसे उसकी भागवतशाखा से विशेष प्रेरणा, प्रोत्साहन मिला है। परन्तु यह पूरासत्य नहीं है। इसके पूर्ववर्ती तथा पाश्र्ववर्ती अन्य अनेक भक्तिमार्गी साधक हैं, जिनकी रचनाएँ न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध हैं। ऐसे भक्त साधकों में शैव, शाक्त और श्रवण-भक्तों की गणना की जाती है।
भक्ति साहित्य किसी क्षणिक भावावेग अथवा इन्द्रियजन्य भावोन्माद की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। परन्तु यह ठोस तथा उर्वर धरातल की उपज है। इसके साधन लौकिक अवश्य हैं, किन्तु इसका साध्य एक ऐसी लोकोतर अनुभूति है जिससे भक्त के चित्त को अनुपम शांति और आनन्द की उपलब्धि होती है। विद्वानों ने भक्ति साहित्य को प्रत्यानुसार दो विभागों में विभाजित किया है ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी। परन्तु ज्ञान अपने आपमें एक उपलब्धि है, क्रिया नहीं जिसका आश्रय लेकर मनुष्य मुक्ति लाभ कर सके। फिर ज्ञान द्वारा सत्य के स्वरूप का साक्षात्कार होने की संभावना में आज्ञावादी वर्ग के लोग संदेह प्रकट करने लगे थे। ऐसा भक्त वास्तव में ज्ञानमार्गी न होकर अनुभवश्रयी होता है, और अनुभव क्रिया की आनुषंगिक प्रक्रिया है।
उपसंहार:  मध्यकालीन संस्कृति एवं लोक जीवन का भी चित्रण इनमें सहज स्वाभाविक रूप में हुआ है। अत:पूर्व परम्परा के निर्वाह एवं युगीन वातावरण के चित्रण की दृष्टि से तो इनका महत्व निर्विवाद रूप में है। साथ में शुद्ध काव्यत्व की दृष्टि से भी यह परम्परा कम महत्वपूर्ण नहीं है। अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं में विभिन्न शास्त्रीय तत्वों, दार्शनिक, धार्मिक, नैतिकता आदि का भी समन्वय किया है। भक्ति साहित्य के वर्गीकरण का एक अन्य आधार साम्प्रदायिक भेद को भी मान लिया जाता है, किन्तु कभी-कभी सम्प्रदाय विशेष के अंतर्गत भी सभी भक्तों साधकों को, उनकी रचनाओं में हम ठीक एक ही प्रकार की अभिव्यक्ति करते नहीं पाते जिससे सबको किसी एक वर्ग में बिठाने से कठिनाई उपस्थित होती है। फिर भी मीरा और रसखान जैसे भक्तों का भी अभाव नहीं जिन्हें सम्प्रदायनिरपेक्ष तक ठहराया जा सकता है। इसलिए सम्प्रदाय भेद के आधार पर भक्ति साहित्य का वर्गीकरण समीचीन नहीं जान पड़ता। भक्ति साहित्य के वैज्ञानिक वर्गीकरण का एक आधार जैविक, दैहिक और मानसिक भक्ति भी हो सकती है।
संदर्भ ग्रन्थ सूची:
1 हिन्दी साहित्य का इतिहास -डॉ.नगेन्द्र
2 भक्ति काव्य का समाजशास्त्र प्रेमशंकर