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Tuesday 21 Nov 2017

गज़़ल

चांद 'शेरी
के-80 आई.पी.आई.ए.
रोड नं. 1, कोट-5 (राजस्थान)
मो. 09829098530
(1)

कोई दाता-अमीर ढूंढेंगे
शहर में क्या फकीर ढूंढेंगे।

हम नए दौर की किताबों में
खाक तुलसी-कबीर ढूंढेंगे

बिक गया है जो चंद सिक्कों में
उसमें हम क्या जमीर ढूंढेंगे

ये तो शतरंज है सियासत की
गोटियां खुद वजीर ढूंढेंगे

पीर अपनी भुला के हम 'शेरीÓ
दीन-दुखियों की पीर ढूंढेंगे

(2)

जब परिन्दा उड़ान पर होगा
तीर कोई कमान पर होगा

देश की एकता का सुर इक दिन
देखना हर जबान पर होगा

छिड़ गई फिर वही महाभारत
रक्स शकुनी की तान पर होगा

देश का हर जवान सरहद पर
खेतवाला मचान पर होगा

$कस्मे-वादे निभा के चल वर्ना,
हुस्न तेरा ढलान पर होगा

क्या पता था बुरी नजर का असर
हिन्द के खानदान पर होगा

तुझमें कितना है हौसला 'शेरीÓ
फैसला इम्तिहान पर होगा।


(3)
क्या $खूब पत्थरों में व$फा ढंूढते हैं लोग
$खामोश म$कबरों में सदा ढूंढते हैं लोग

भड़के जो शोले उनको हवा दे के और भी
इंसा के सोजे-गम में रजा ढूंढते हैं लोग

मातम $गरीब मौत का भी क्या अजीब है
लाशों में द$फन अपनी दुआ ढूंढते हैं लोग

कुछ बात पीने वालों की पूछो न दोस्तों
इंसान के लहू में नशा ढूंढते हैं लोग

'शेरीÓ बुझेगी आग हवस की भी किस तरह
अपने गुनाह में भी अदा ढूंढते हैं लोग