Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

बाजार में

नवनीत कुमार झा
हरिहरपुर,
दरभंगा( बिहार ) 847306
सोचता हूँ लिखूँ कविता प्रेम पर
सुने जब कोई विभोर हो
सुने जब कोई कहे वाह !
मगर....
क्या करूँ मैं लिख नहीं पाता
सोचता हूँ बनाऊँ एक तस्वीर शब्दों से
हूबहू तुम्हारा चेहरा/ तुम्हारा माथा
और तुम्हारी देह बनाऊँ
पर तुम्हारी आत्मा छूट जाती है
मैं काँपता रह जाता हूँ
जैसे पानी में काँपती है परछाई
जब उतरती है नहाने को पूर्णिमा
पूरा चाँद दिखता है आकाश में
पानी में डोलती है छाया
सोचता हूँ नहीं है आसान
लिखना प्रेम पर कविता
प्रेम अछूत है समाज में
प्रेम की कोई पूछ नही
हम खड़े हैं बाजार में