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Wednesday 22 Nov 2017

बुंदेली लोक रचना : बसंत पावने आए रे...

डॉ. प्रभु
सत्यशीलम् प्रेस, निकट विजय टॉकीज
सागर-470002 (म.प्र.) मो. 7697425787
फगुना चेता जोहत रस्ता, पलक-पांवड़े बिछाए रे
सास ऊं साल भरे के बाद हमाए बसंत पावने आए रे

बाग-बाग हो रए बाग-बाग, कर बसंत की पहुनाई
ढुलकिया भौजी थाप मिलाएं रमतूला भैया टेर लगाए रे

बांको बसंत रंगीलो लहके टेसू सेमल आम नीम बौराई
लाल-लाल भए जंगल-जंगल, पत्ता-पत्ता पियराए रे
बेला बिन्ना बेले लुचइयां, कचनार छाने डार कड़हाई
चंपा चमेली गुइयां हरों ने मुतके-फुतके पकवान बनाए रे

पीपर देवर बांटे धनियां-चटनी इमली साली लाई खटाई
बरा बिजौरा ददूरा कचरियां खावे बसंत पावने ललचाए रे

ठुमका सारे बसंत बरेदी नाचे बघाव ढिमरिया राई
बुंदेलखंड की रागों-फागों खों, झूम-झूम के गाए रे