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Monday 20 Nov 2017

तलाश में

 

सुसंस्कृति परिहार
 प्राचार्य
रामकुमार उ.मा. शाला दमोह (मप्र)
मो. 09826379049
एक पुकार है
एक मौन सी
दर्द और बेचैनी में डूबी
अँदर ही अँदर
वह तुम्हारे लिए है
या स्वयं के लिए
पहचानना मुश्किल ।

एक प्यास अनंत सी
कि पूरी नदी रिक्त हो जाये
फिर भी ज्यों की त्यों

एक आकांक्षा पर्वत सी
जिसे सर करने की कोशिश लगातार

एक समुद्र अँदर हिलोरता
तट पर हाहाकार

क्या अभाव
क्या कमी
क्यों व्यक्त करने में असमर्थ

एक पुकार बहुत-बहुत
अभ्यांतर, हृदय तंत्रों से
किसे पुकारती
नहीं जानती

एक चाहत भरपूर
पा लेने को
अपना मनचाहा संसार
पर जिसका न रूप
न पता

एक दौड़ में शामिल
पर मंजिल कहां
पता नहीं

मैं सदियों से
इसी तलाश में
शायद सृष्टिï के अंत के बाद
भी
जिन्दा रहेगी यही तलाश  !
बहुत मुश्किल है
बहुत मुश्किल है
समझाना किसी को
उसकी ही जड़ता के विरूद्व
जैसे कि कठोर चट्टान के, भीतर
पैदा करना जीवंतता
पैदा करना प्रफुल्लता

बुझने को आतुर
अँगार को मारोगे कितनी फूंक
अगर अँगार स्वयं ही
हो न ऊर्जा की ओर
लौटने को व्यग्र

बहुत मुश्किल है
समझाना
कुंठा की कुँडली से ग्रसित को
खुली शुद्ध हवाओं का
कुनकुनी धूप का
और वसंत के हरे भरे मौसम को
समझना हो तो
पहले भीतर
वसंत धूप और
ताजा हवा की करना होगी
कामना
कठिन बहुत है ।