Monthly Magzine
Tuesday 19 Feb 2019

बसंत की कविताएं

 

केशव शरण
एस-2/564, सिकरौल
वाराणसी-221002
मो.- 09415295537
एक
जब हरे खेतों के बीच
पीले खेत दिखे
और हरे पेड़ों के बीच
लाल पेड़ दिखें
समझ लो
बसंत के इलाके में हो
और कोई भी रंगीन घटना
हो सकती है
तुम्हारे साथ!

दो
सर्वत्र नये-नये फूल
नये-नये पत्ते हैं
इस शस्य-पुष्प सज्जा में
मोती जड़ते
आम के पेड़ों पर
सफेद-सफेद गुच्छे हैं
यहां-वहां लग रहे
मधुमक्खियों के
नये-नये छत्ते हैं

तुम भी सक्रिय हो जाओ
सपने देख चुके तो!

तीन
सुन रहे हो न!
कोयल बोल रही है
कछार में

फर्क़ कर सकते हो
असली और नकली
कोयल की बोल में?

प्यार का आमंत्रण
दोनों में है
एक-सा

चार
देख रहे हो न!
क्या गजब ढा रही है
सोने की समीज-सलवार पर
सोने की ओढऩी डाले जो
सोने के खेत से जा रही है
सोने की हिरनी की चाल

पांच
सोच रहे हो
क्या सोच रहे हो
सोचने के लिए नहीं है बसंत
प्राकृतिक बसंत
और मानसिक बसंत भी
वहां से शुरू होता है
जहां होता है
सोचने का अंत।