Monthly Magzine
Tuesday 16 Jan 2018

इस नशीली रात में

मनोज श्रीवास्तव
डीएन 2/11, चार इमली भोपाल (मप्र)
तो यों हुआ कि रात थी
समय के अनंत प्रवाह की और रातों की तरह
लेकिन एक उधार लिया हुआ खब्त था
जिसने इस रात में सुरखाब के पर जड़ दिए थे
और जिसके चलते शराब भी जरूरी थी
और रात के ऐन वक्त पर बत्ती का गुल होना भी

अभी कुछ देर पहले पीके देख चुके लोग
इसे अंधविश्वास नहीं कहते थे
यहां अंधेरे होने का मजा लिया जा रहा था
क्योंकि तब मिनी स्कर्ट और स्लीवलेस से टकराया
जा सकता था
और अंधेरे पर यों उनका विश्वास बढ़ चला था

थोड़ा सा कोसा जा रहा था बारिश को
कि इंतजाम थोड़े अस्त व्यस्त हो गए थे
कि हमेशा से यह नामुराद प्रकृति ही है जो
खेल बिगाड़ती है अन्यथा तो
उन्होंने सब सेट कर रखा है

असहमति भी थी
एक विरोध में उठा स्वर भी था
जो कह रहा था कि बारिश ने मौसम को
रूमानी बना दिया है
तू कहां ये बता इस नशीली रात में

जब वे निकले कार से उस महफिल के बाद
लडख़ड़ाते लौटने तब गौर न कर पाए
सड़क के दूसरी तरफ फुटपाथ पर रात काटते बैठे हुए
उस परिवार के ओठों के वही अस्फुट शब्द
जो आसमान की तरफ आंखें उठा कर कहे गए

तू कहां ये बता इस नशीली रात में ।