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Monday 20 Nov 2017

फूल चम्पा

 डा. गायत्री प्रियदर्शनी
रघुवीर नगर, बदायूं, 243601
मो. 08923591758
उदग्र हरी चिकने पत्तों वाली
उद्धत फूलों वाली
व्याकुल बांहें  बार-बार
नोचे झिंझोड़े
मसले कुचले जाने पर भी
फिर - फिर
उठती हुई
बेचैन जीने की जिद से भरपूर
सूरज से आंखें मिलाती
तेरी पुरकशिश आँखें
कैसे  घुल-मिल गई हैं
मेरे सपनों की राख-भरी
आँखों से
अपने  हरेपन मे सँजोए
फिर - फिर से
अपने होने
अपने से उगने की
तेरी इच्छा
दहका रही है
मेरी भी
राख के ढेर में दबी
सपनों की आग को।
कितना अधूरा सा
 कितना अधूरा सा है
 प्यास का यह सफर
 जहां संग है पर साथ नहीं है
 देह है पर मन नहीं।
 थकी हुई पलकों में
 चुभती हैं
 रेतीले सपनों की किरचें
 फिर भी यह बावला मन
 न जाने क्यों
 बार - बार
 डूबना चाहता है
सुर्ख गुलमुहर की आंच सी तप्त
 जुड़ी हुई हथेलियों की
 आत्मीय दहक में!
टपक रहा है
समय की शाखों से
घना - घना
कोहरा
परतीली धुन्ध से
झांक रहा है
फीका सा
मटमैला चाँद
डूबता जा रहा है
सन्नाटे में
रात का शहर।
होने लगी हैं
घरों में कैद
जिन्दगी की बेचैनियां
थम गया है
थोड़ी देर को
पहियों पर
भागता - दौड़ता
रात का शहर।
फैलने लगी हैं
सड़कों पर
रात की बदमाशियाँ
और
जाग रही हैं वे
हड्डियों को चीरती
सनसनाती हवाओं में
मेकअप से लिपी - पुती
गठरी बनी हुई
पतली गली की
खंडित मूर्तियाँ
सड़क पर जलते
लैंप पोस्ट की तरह
अभिशप्त
इन्तजार में।
वसन्त में बारिश
दोनों किनारों पर
हरी छींटदार
पीली धधरिया में
दोलती
इठलाती सरसों
बीच में
नील दर्पण सा
लहरियों वाला
ताल
ताल पर नाव
नाव पर पाल।
उफ।
यह मादक सा
गुनगुना फागुन
और
अचानक
फागुनी बारिश में
भीगऩे लगा है
बसन्त
सागर ताल पर।
                        
मन्नतों के धागे  
सुबह के झुटपुटे से झाँकते
दूर से ऊँचे शिखर पर
कुछ ज्यादा उजला
चमचमाता और नज़दीक
नजर आ रहा है
भोर का तारा ।
ये तेज, घुमावदार, तीखे मोड़
और
निगाहों के दोनों ओर
आड़ी, तिरछी, रपटीली खाइयां।
सरक रहा है
धीरे - धीरे
नववधू सा उषा का
झीना नीला आवरण
और
अरूणोदय की लालिमा के
रंग में
फागुनी हो रही है
उफ।
ये खड़ी चढ़ाइयाँ।
पहाड़ों से नीचे उतर रहे हैं
बादलों के घेरे

तुम हो
और
है तुम्हारा साथ
जीतने
शिखरों की
अंतिम ऊँचाइयाँ
जहाँ
बाँधेंगे हम
अपनी मन्नतों के धागे
कि जुड़ी रहें यूं ही
रिश्तों की यह
नरम हथेलियां
उम्र के अंतिम
छोर तक।

  उल्लास के घेरे
माथे की गोल सी बिंदिया
कुछ ज्यादा खुशी से
दमक रही है
होठों के कोनों पर
मुस्कान
कुछ ज्यादा खुलकर
छलक रही है
अंग - अंग में
समा नहीं रही है
आँखों में झलकती
हँसी और खुशी ।

हाथों की मुद्राएँ
ठीक नहीं
कोई बात नहीं
बेतरतीब
अंगों का संचालन
कोई फिक्र नहीं
बस
वे तो
अपनी बेटियों के
सपनों के पंख और उनकी
उड़ान की ताकत
बनते बनते
न जाने
कब खुद भी
पैरों को
पंख बना कर
शामिल हो गई हैं
इस
उल्लास -नृत्य में।
जहां
कुछ घन्टों के लिए ही सही
वे भूल चुकी हैं
पिंजरों की घुटन
विवशता
न उड़ पाने की
मरोड़े हुए पंखों के साथ
दीखते अछोर आसमान में
पीड़ा
कुछ न कह पाने की
और दंश सहने का
धरती की तरह।
    
सब कुछ को
दर किनार कर
बस
वे नाच रही हैं
सिर्फ नाच रही हैं।

देखते ही देखते
मैं भी
निषेध का
बाँध तोड़
न जाने कब
शामिल हो चुकी हूँ
इस
उल्लास के घेरे में।
                                         
झुलस रही धरती
झुलस हुई धरती
जलता हुआ आकाश
राहतों की
बारिश को
तरसती हैं
आंखें।
तप रही है धरती
जल रही है
दोपहर
दिखाते हुए
मौसम को ठेंगा
दहक रहे हैं
सुर्ख गुलमोहर।