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Friday 24 Nov 2017

खुश चेहरा

मूल : हाइनरिश बायल
अनुवाद : तरसेम गुजराल
78, रामशरण कॉलोनी, कॉलेज रोड बस्ती दानिशमंद,जालंधर (पंजाब)
मैं बन्दरगाह पर चिडिय़ों को देख रहा था... पानी में डुबकी लगातीं और फिर उछलकर पंखों को झाड़ देतीं चिडिय़ां। अन्य कोई जीव-जन्तु नहीं था, कहीं भी नहीं, पानी पर तेल के धब्बे तैर रहे थे, और उनकी वजह से पानी हरा-सा और तेलिया-सा लग रहा था। कहीं कोई जहाज नहीं दिख रहा था। क्रेन जंग के खाये हुए मुंह बिसूरे खड़े थे। सभी गोदाम खण्डहर हो चुके थे- इतने कि अब वहां चूहा तक नहीं था। अजीब सुनसान था। मुझे पता था कि इस किनारे का पिछले कई सालों से अन्य देशों से कोई संबंध नहीं रहा था।
एक चिडिय़ा कब से पानी में डुबकी लगाती, फिर झपटकर ऊपर को उड़ती और फिर पानी में डुबकी लगाने के लिए पंखों को मरोड़ लेती थी। वह हर बार ऊपर आकाश में झपटती शायद कोई संग ढूंढ रही थी... जी चाहा कि यदि मुझे कोई रोटी का टुकड़ा मिल जाए, मैं छोटे-छोटे टुकड़े कर इस चिडिया को भी डालूं, ताकि सभी के उडऩे की एक दिशा मिल जाए। परन्तु मैं खुद भूखा था, उन पक्षियों की तरह और थका हुआ भी। खाली जेब में हाथ डालकर मैंने उन पक्षियों की ओर देखा, और अपने दुख का एक घूंट-सा भरा।
लगा कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा था, मुड़कर देखा- एक पुलिस का आदमी था।
मैंने कंधे को छुड़ाने की कोशिश की।
''कामरेड।ÓÓ उसने मेरा कंधा और ज्यादा दबा लिया।
''साहबÓÓ
''अब कोई साहब नहीं, हम सभी कामरेड हैं।ÓÓ
''लेकिन मेरा कसूर?ÓÓ
''कसूर?ÓÓ वह हंस दिया और कहा- ''तुम्हारा चेहरा, तुम्हारा उदास चेहरा।ÓÓ मुझे भी हंसी आ गई।
''यह हंसने वाली बात है?ÓÓ उसका चेहरा गुस्से में सख्त हो गया। पहले तो मुझे लगा कि वह शायद वैसे ही ऊब चुका है- शायद उसे आज बाकायदा पेशा करने वाली कोई वेश्या नहीं मिली, या गली में गिरा कोई शराबी नहीं मिला, या कोई चोर उचक्का और कोई जेबकतरा आज हाथ नहीं लगा। लेकिन फिर मैंने देखा कि वह सचमुच गुस्से में था, और मुझे हिरासत में लेना चाहता था।
उसने मेरी बायीं बांह में हथकड़ी लगा दी। लोहे की छनक के साथ मुझे होश आया कि मैं तबाह हो गया था। जल्दी से एक बार उड़ते पक्षियों को और खुले आकाश को आंखों में भरा, और फिर पानी की तरफ एक कदम बढ़ाया- पुलिस के हाथ आ जाना, और फिर कई दिनों तक गहरी चोटें खाना और इसके बाद जेल की कोठरी में सड़ते रहना डूब मरने से कहीं भयानक है। परन्तु उसने एक झटके से मुझे अपनी तरफ खींच लिया।
''परन्तु मेरा कसूर जनाबÓÓ मैं थथला-सा गया।
''कानून के मुताबिक सभी लोगों को हर समय खुश नजर आना चाहिए।ÓÓ
''परन्तु मैंने कभी यह कानून सुना नहीं।ÓÓ
''सुना नहीं? परन्तु इसको लागू हुए छत्तीस घंटे हो गए हैं। ऐलान होने के चौबीस घंटे बाद प्रत्येक कानून अमल में आ जाता है।ÓÓ
''परन्तु मुझे इसका बिलकुल पता नहीं।ÓÓ
यह सभी समाचार पत्रों में छपवाया गया था, लाउड स्पीकरों से सुनाया गया था- मेरे कामरेड! तुमने पिछले छत्तीस घंटे कहां गुजारे हैं?
अब वह मुझे घसीटते हुए ले जा रहा था। कहर की ठंड का एहसास हुआ और बहुत-बहुत भूख का भी। मैंने खुद पर नजर डाली- कपड़े बहुत खस्ता थे, शेव भी नहीं की थी। हालांकि कायदा यह था कि प्रत्येक कामरेड को सा$फ-सुथरे कपड़े पहनने चाहिए।
सड़क पर जितने भी लोग नर आ रहे थे- सभी ने उत्साह का नकाब पहना हुआ था, और देख रहा था कि पुलिस की शक्ल नजर आते ही उनका नकाब और चमक उठता था। परन्तु सभी बड़ी जल्दी कदम उठा रहे थे, जैसे बड़े जोश से काम से लौट रहे हों...।
समझ रहा था कि सभी लोग बड़ी होशियारी से हमसे खिसक रहे थे- जैसे सभी की कोशिश हो कि वे जल्दी-जल्दी किसी घर, किसी गोदाम या कारखाने में पनाह ले लें या आगे का मोड़ मुड़ जाएं, पुलिस की नजर से वे परे चले जाएं।
सिर्फ एक बार ऐसा हुआ- हम एक चौराहे पर पहुंचे और अधेड़ आदमी के साथ हमारा सीधा सम्पर्क हो गया। उसे देखते ही मैं समझ गया कि वह कोई स्कूल मास्टर था, अब खिसककर कहीं जा नहीं सकता था, और जैसा कि कानून के अनुसार जरूरी था, उसने पुलिस वाले को बड़ी इज्जत से सलामी दी, और फिर फर्ज अनुसार तीन बार मेरे मुंह पर थूका, और कहा- 'राष्ट्र विरोधी सुअरÓ उसने सभी कुछ पूरे तरीके के साथ किया था। परन्तु मैं देख सकता था, उसका गला सूखा हुआ था। मैंने भी कानून के अनुसार सभी कुछ अपनी कमीज की बांह से पोंछ डालने की कोशिश की।
मेरी पीठ पर जोर का एक घूंसा पड़ा, और आवाज आई- ''पहली सीढ़ीÓÓ मतलब साफ था यह मेरी सजा का पहला रूप था।
वह स्कूल मास्टर जल्दी से अब कहीं चला गया था। बाकी पूरे रास्ते, सभी लोग, हमें टालकर निकलने में सफल हो गए और फिर वह ठिकाना आ गया, जहां मुझे पहुंचना था। एक बिगुल की आवा सुनाई दी, पता चला कि मजदूरों की छुट्टी होने वाली थी, और उन्हें अपने चेहरे खुश करने के लिए अच्छी तरह मल-मल के मुंह-हाथ धोने थे। कारखाने से बाहर आते हुए उनके चेहरे पर तसल्ली नर आनी चाहिए थी। लेकिन ज्यादा खुशी नहीं, ताकि ऐसा न लगे कि उन्हें काम से जान छूटने पर बहुत खुशी हुई थी। बहुत खुशी सिर्फ कारखाने में जाते हुए ही नर आनी चाहिए थी, उस समय राह चलते हुए उन्हें गाना भी चाहिए, ताकि पता चले कि काम पर जाते समय उनमें बहुत उत्साह था।
शुक्र यह कि यह बिगुल, छुट्टी होने से दस मिनट पहले बजाया जाता था- साबुन से हाथ-मुंह धोने की तैयारी के लिए। नहीं तो यदि ये सारे मजदूर इस समय सड़क पर निकल आते और सभी को मेरे मुंह पर तीन-तीन बार थूकना था।
जहां मुझे पहुंचाया गया, यह एक सादा लाल ईंटों का मकान था, और दो सिपाही दरवाजे के आगे पहरा दे रहे थे। सबसे पहले उन्होंने कानूनन मेरी मुरम्मत की। बंदूकों के कुंदे मेरी कनपटियों पर मारे।
अंदर के कमरे में एक बड़े मेज (टेलीफोन सहित) और दो कुर्सियों के अतिरिक्त कुछ नहीं था। मैं कमरे के ऐन बीच में खड़ा था। मेज वाली कुर्सी पर कोई व्यक्ति लोहे का टोप पहने डटा था। पिछली तरफ कोई और आया, उसने भूरे रंग की वर्दी पहनी हुई थी, वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया। सवालों का सिलसिला शुरू हुआ-
- कारोबार?
- सादा कामरेड।
- जन्म?
- 1-01-01
- पिछले दिनों की तफसील?
- कैदी
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
- कहां, और कब?
- जेल नं. 12, कोठरी नं. 13, कल रिहा हुआ था।
- परवाना?
मैंने रिहा होने का परवाना जेल से निकाला और उनके सामने रख दिया।
-उस समय का कसूर?
-मेरा खुश चेहरा।
दोनों ने फिर एक-दूसरे की ओर देखा, और कहा- ''सा$फ-सा$फ बताओ?ÓÓ
''जनाब। तब कोई बहुत बड़ा सरकारी अफसर मर गया था, और सरकार की आज्ञा थी कि पूरे राज्य में शोक मनाया जावे। परन्तु एक पुलिस मैन का दावा था कि मेरा चेहरा दु:ख भरा नहीं था।ÓÓ
''सजा की मियाद?ÓÓ
''पांच बरस।ÓÓ
फिर खूब पिटने के बाद मुझे नई सजा सुना दी गई- ''दस बरसÓÓ, खुश चेहरे पर पांच बरस की सजा मिली थी, दु:खी चेहरे पर दस बरस की... सोचता हूं- अब जब जेल से बाहर आऊं मेरा कोई चेहरा न हो.. न सुखी, न दु:खी।