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Wednesday 22 Nov 2017

इच्छा-मृत्यु

कुंवर किशोर टंडन
503-5 रेलवे आफिसर कालोनी हबीबगंज भोपाल-462084
जिंदगी किस प्रकार देखते ही देखते हाथों से फिसल जाती है इसका एहसास आज मृदुला और मयंक को हो रहा था जब वे सुबह-सुबह अपने बिस्तर पर ही बैठे-बैठे चाय पी रहे थे। वे विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि उनका पूरा लगभग साढ़े तीन दशक का शासकीय सेवाकाल बीत चुका है और उन्हें सेवानिवृत्त हुए भी दस वर्ष हो चुके हैं। जीवन में कभी-कभी ऐसा हुआ है जब लगा है कि यह एक दिन या एक घंटा कैसे कटेगा और कभी ऐसा लगा है कि यह पूरा वर्ष या यह पूरा माह कैसे बीत गया- पता ही नहीं चला। इसी प्रकार सेवानिवृत्ति पर ऐसा लगा था जैसे पूरा सुखमय जीवन शून्य में विलीन हो रहा है और एक सन्नाटा बुढ़ापा लेकर हाथ पसारे बड़ी तेजी से बढ़ता आ रहा है- पूरी तरह से अपनी गिरफ्त में लेकर, पटकनी देने के लिए। पर मयंक और मृदुला ने अपने एक-दूसरे के प्रति प्रेम से, आपसी समझ से और बच्चों के विश्वास से सब कुछ जीत लिया था।
आज मयंक और मृदुला की शादी की पैंतालीसवीं सालगिरह थी। सुबह-सुबह विभा और प्रणय का शुभकामनाओं के लिए फोन आ गया था- जापान से। अनुभव और रंजना तो सबसे पहले पुष्प-गुच्छ लेकर आ गए थे और पांव छूकर शुभकामनाएं दे गए थे। रंजना व अनुभव ने तो खुद ही देख लिया था पर विभा ने फोन पर पूछा था- \'\'पापा आपने आज चांदी वाले सेट में चाय पी या नहीं।ÓÓ
मयंक ने उत्तर दिया था- \'\'हां, आज हम लोगों ने चांदी वाले सेट में ही चाय पी है। यह कैसे भूल जाता।ÓÓ
अनुभव के विवाह के बाद जब मयंक और मृदुला की शादी की सालगिरह पहली बार पड़ी थी तब विभा, प्रणय, रंजना, अनुभव सभी लोग मयंक व मृदुला के पास ही थे। सभी ने मिलकर उस समय यह चांदी का टी-सेट अपने माता-पिता को उपहार स्वरूप दिया था- बहुत ही सुंदर चांदी का यह सेट। बहुत समय से यह सेट ऐसे ही रखा हुआ था। पिछली दीपावली व दूज पर जब विभा और प्रणय भोपाल आए थे तब एक दिन वह सेट निकालकर साफ किया गया था- पॉलिश की गई थी और उसमें ही चाय पी गई थी। तभी मयंक ने कहा था कि अब आगे से अपनी व दोनों बच्चों की शादी वाले, सालगिरह व अपने परिवार के सभी लोगों के जन्मदिवस पर इसी चांदी के सेट में चाय पी जाया करेगी।
मयंक मध्यप्रदेश शासन में एक वरिष्ठ फारेस्ट ऑफिसर की हैसियत से दस वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हुआ था। भोपाल शहर के बीच प्रोफेसर कॉलोनी में पहले ही एक निजी मकान बनवा लिया था। एक बेटा और एक बेटी है। बेटे अनुभव की शादी आठ वर्ष पूर्व रंजना के साथ हुई और उसका एक बेटा है तीन वर्ष का, दक्ष। बेटी विभा का विवाह बारह वर्ष पूर्व साफ्टवेयर इंजीनियर प्रणय के साथ हुआ था। प्रणय व विभा तब से जापान में ही रह रहे हैं। दो-तीन वर्ष में एक बार मां-बाप के पास आ जाते हैं। एक आठ वर्ष की बिटिया क्षिप्रा है उनकी। अनुभव डेन्टल सर्जन है- एक सुव्यवस्थित बड़ी प्राइवेट क्लीनिक है उसकी। थोड़े समय में ही उसकी गणना शहर के अच्छे और व्यस्ततम डॉक्टरों में होने लगी है। रंजना न्यूट्रीशन स्पेशलिस्ट है। शहर के दो बड़े अस्पतालों में कार्य करती है। एक में सुबह और दूसरे में शाम को। उसकी भी दिनचर्या अति व्यस्त रहती है।
मृदुला का लगभग तीस वर्ष पूर्व एक कार दुर्घटना में \'हिप ज्वाइन्टÓ खराब हो गया था। मुंबई जाकर एक मेजर ऑपरेशन से \'हिप ज्वाइन्टÓ बदलवाया था- \'आर्टीफिशियल ज्वाइन्टÓ से। तब से मृदुला को चलने के लिए एक छड़ी का सहारा लेना पड़ता था। मंजू नौकरानी ही घर का सारा काम करती थी। पच्चीस छब्बीस वर्ष की विधवा थी जब आई थी काम पर। पांच वर्ष का लड़का था साथ में।
शहर से लगभग पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर मयंक ने दस एकड़ जमीन ले रखी थी। उसमें फलों का अच्छा बगीचा लगाया था। कई तरह के आम और अमरूद के पेड़ थे। दो-चार पेड़ दूसरे फलों के भी थे। फूलों का शौक था तो हर वर्ष कुछ अच्छे फूलों के पौधे भी लग जाते थे। आम और अमरूद की नीलामी से अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी। हां, सालभर बगीचे की देखभाल और हिफाजत अवश्य करनी पड़ती थी। पर आमदनी के साथ परिवार को फलों व फूलों का भी आनंद मिल जाता था।
मयंक के सेवाकाल के समय वह हर क्षेत्र में बहुत सक्रिय और अग्रणी था। चाहे ऑफिसर क्लब हो या शहर की अन्य सांस्कृतिक व खेल संस्थाएं। मृदुला भी पीछे नहीं थी। महिलाओं की संस्थाओं में वह भी बहुत सक्रिय व अग्रणी थीं। जहां पुरुष व महिलाएं दोनों होते वहां तो वह रहती ही थी।
यादों का चक्र जब घूमता है तो जीवन की सारी कड़वी यादें मन को कसैला कर जाती हैं और मीठी यादें बरबस मन-मस्तिष्क को गुदगुदा जाती हैं। मयंक और मृदुला आज के दिन केवल मन में मिठास उत्पन्न करने वाली और दिल को अंदर तक गुदगुदा जाने वाली यादें ही ताजी करना चाहते थे। जिन्दगी की उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें लगता है कि वे एक दूसरे और अधिक नजदीक आ गए हैं। उन्हें एक दूसरे की अधिक आवश्यकता है। एक दूसरे की सहानुभूति और संवेदनाओं की अधिक आवश्यकता है। उलझनों के समय में एक दूसरे को मन की बातें बतलाकर वे बहुत हल्का महसूस करते हैं। वैसे अनुभव और विभा भी इसके विकल्प हैं। रात की खामोशी में अक्सर नींद खुल जाने की दशा में एक-दूसरे का भावनात्मक और भौतिक सम्बल ही मन और तन को आहत होने का क्षत-विक्षत होने से बचाता है।
तो यादों के चक्र में मयंक और मृदुला उस छोर पर पहुंच जाते हैं जब वे लगभग चालीस वर्ष पूर्व प्रदेश के अत्यंत पिछड़े आदिवासी जिला मुख्यालय में डिवीजनल फारेस्ट ऑफिसर की हैसियत से पदस्थ थे। मयंक के एक घनिष्ठ मित्र थे सतीश चौहान जो सिंचाई विभाग में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर थे। दोनों के निवास बिल्कुल अगल-बगल में थे। दोनों के अधिकांश कार्यस्थल मुख्य मार्गों से बहुत अंदर, घने जंगली इलाकों में थे। अक्सर वे लोग दौरे के कार्यक्रम साथ-साथ बना लेते थे। मृदुला और मिसेज चौहान भी साथ चली जाती थी। मयंक और मृदुला तो वैसे भी कहीं भी जाते थे- शासकीय दौरे पर या व्यक्तिगत यात्रा पर हमेशा साथ ही जाते थे। सतीश चौहान व मिसेज चौहान के साथ यात्रा का एक अलग ही आकर्षण रहता था। जंगली क्षेत्रों की सड़कें, बिना पुल, पुलियों के नदी नालों का \'फोर व्हील ड्राइवÓ  जीप से पार करना, रेत और गीली मिट्टी में गाड़ी का डगमगाना, जंगली क्षेत्रों के डाक बंगलों और कभी-कभी टेन्ट या मिट्टी की बनी \'टेम्परेरी हट्सÓ में रातें बिताना एक अलग ही सुखद व \'एडवेन्चरसÓ अनुभव था। आसपास ही जंगल भी इतने घने कि शेर चीतों तथा अन्य जंगली जानवरों की आवाजें दिनभर विशेष रूप से रात में सुनाई ही पड़ती रहती थीं। जीप में जाते हुए शेर, चीता, भालू का रास्ता पार करते हुए दिख जाना या सुनहरे, काले हिरनों, बारहसिंगों व बायसन के झुंड के झुंड गाड़ी के सामने या थोड़े से ही फासले पर होना तो आम बात थी। इन सबका \'थ्रिलÓ व आनंद अलग ही था। दूर-दूर तक फैले हुए ऊंचे और घने साल और सागौन के वृक्ष अपनी अलग अहमियत रखते थे। इस वातावरण में घोर आदिवासी क्षेत्र में, पक्की सड़क से लगभग सौ सवा सौ किलोमीटर अंदर जाकर कच्ची मिट्टी की झोपड़ी में \'फोल्डिंग चारपाईयोंÓ में रात बिताना एक नितांत अलग अनुभूति थी। शादी के बाद कई बार सर्वसुविधायुक्त पांच सितारा होटलों में रात बिताना अपनी तरह की दूसरी अनुभूति थी। मयंक और मृदुला कभी-कभी जब दोनों अनुभूतियों को कल्पनाओं और भावनाओं के तराजू पर रख कर देखते थे तो कच्ची मिट्टी की ओर का पलड़ा अधिक झुका हुआ प्रतीत होता था।
सतीश चौहान के साथ उसकी परियोजनाओं में घूमना, पानी से लबालब बांधों का सुंदर दृश्य, दूर-दूर तक पहाडिय़ों के तले फैले हुए पानी को निहारना बहुत अच्छा लगता था। बनती हुई परियोजनाओं की हलचल, पुरुष व स्त्री मजदूरों का पूरे उत्साह के साथ निर्माणाधीन बांधों के निर्माण में रत रहना, ऊंटों, खच्चरों, गधों के झुण्डों का मिट्टी के कामों में योगदान, बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा मिट्टी की खुदाई, कुटाई और सिंचाई देखते ही बनती थी। निर्मित नहरों में पानी का चलना,  किसानों का पौधों को सींचना और फिर खेतों में लहलहाती फसलों को देखना एक गहरी सुखद अनुभूति देता था। किसानों के मन का उल्लास प्रस्फुटित होकर वातावरण को और अधिक आल्हादित कर देता। सड़कों से दूर अंदरुनी क्षेत्रों से जहां किन्हीं कारणों से बांध नहीं बनाए जा सके थे पर छोटी नदियों और नालों में भरपूर पानी बारहों महीने बहता था, थोड़ी सी, कहीं-कहीं तो केवल चार पांच फुट ऊंचाई की पक्की दीवार बनाकर और पानी की छोटी नहर बनाकर सुंदर ढंग से खेती की ओर मोड़ दिया जाता था जिससे खेतों की सिंचाई होना देखते ही बनता था।
यादों में ही खोए हुए मयंक ने मृदुला से पूछा- \'\'मृदुला, तुम्हें याद है, अनुभव जब एक महीने का ही था तो अचानक उसने रात के ग्यारह बजे जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया था। पहले तो कुछ समझ में नहीं आया था- फिर उसकी दादी ने बतलाया कि इसके पेट में दर्द लगता है। घरेलू दवाईयां दी। बड़ी मुश्किल से उसे गोद में लिए रात बीती। दूसरे दिन डॉक्टर को दिखाया। उसने बतलाया कि वह कॉलिक दर्द है। यह तो पंद्रह-बीस दिन, एक माह या अधिक भी ले सकता है, रोज रात में इसी समय ही होगा। फिर समय से ठीक हो जाएगा। फिर भी जो दवाईयां उन्होंने दी हम लोग दे देते थे. आधी रात तुम जागती थी उसे गोद में लेकर और आधी रात में।ÓÓ
\'\'हां, बिलकुल याद है। ऐसी बातें कहां भूलती हैं।ÓÓ मृदुला ने जवाब दिया।
\'\'और एक बार जब वह तीन वर्ष का था- हम लोग बड़े भाई साहब के पास जबलपुर गए हुए थे। वापस सतना जाने की तैयारी में थे। उस समय सतना में पोस्टिंग थी। घर में अनुभव को खोज-खोजकर हम सभी लोग बहुत परेशान थे। अचानक भाभी की नजर ड्राईंग रूम में सोफे के बगल के एक कोने पर गई। अनुभव वहां खड़ा-खड़ा चुपके-चुपके एक पुरानी खराब ट्यूबलाइट का कांच चबा रहा था। भाभी ने जोर की आवाज दी। हम सब दौड़े आए थे। अनुभव को उस हालत में देखकर तो मेरे होश उड़ गए थे। आप भी डर गए थे। भाभी ने जल्दी दो केले खिलाए और अस्पताल ले गए।ÓÓ मृदुला ने भी यादों की कड़ी में यह कड़ी जोड़ी।
यादों की कड़ी में विभा कैसे भुलाई जाती। मयंक बतलाने लगा- \'\'विभा भी जब दो महीने की रही होगी, तुम उसे नहला रहीथी- साबुन लगा लगाकर। साबुन वाला पानी उसकी सांस नली में चला गया। उसकी सांस रुकने लगी। हम लोग एकदम घबरा गए। समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करें। पीठ धीरे-धीरे थपथपाने की कोशिश की। फिर गाड़ी निकालकर अस्पताल की ओर भागे थे। वह तो ईश्वर की कृपा थी कि रास्ते में ही सब अपने आप ही ठीक हो गया था।ÓÓ
\'\'और विभा जब आठ नौ वर्ष की थी व अनुभव पांच छ: वर्ष का था, तुम विभा को पढ़ाते समय उस बेचारी को कितना पीटती थी।ÓÓ
\'\'हां, पता नहीं क्यों मैं अपने को रोक नहीं पाती थी।ÓÓ
\'\'तुम्हारी बच्ची जो थी। तुम्हें लगता था कि उसे सब कुछ एकदम याद हो जाए। बहुत बुरा लगता था मुझे। कई बार तो मैंने सोचा तुम्हारे उसे पढ़ाते समय की सारी बातें चुपके से टेप रिकार्डर में रिकार्ड कर लंूगा और फिर बाद में तुम्हें सुनाऊंगा। तब तुम्हें भी बुरा लगेगा।ÓÓ
\'\'खैर छोड़ो, शिवप्रसाद जो अपना व्यक्तिगत नौकर था बहुत अच्छे से देखता था उन लोगों को। बेचारे को, बुरी टी.बी. हो गई थी तो जाना पड़ा वरना वह कभी छोड़ कर नहीं जाता। दोनों बच्चे भी उससे बहुत हिल गए थे। जब वह गया था तो बहुत रोए थे।ÓÓ मृदुला ने याद किया।
\'\'उसको जो हिदायतें तुम दे देती थीं वह अक्षरश: पालन करता था। बच्चों के खेलने के लिए भेजती थीं तो वह घड़ी देखकर उतने ही समय में अनुभव और विभा को वापस घर केअंदर ले आता था। बच्चों को पढ़ाने के सुबह शाम के समय भी तो तुम्हारे हाथों में लगी स्याही बाहर परिचितों को भी यह बतला देती थी कि तुम बच्चों को पढ़ाकर आ रही हो या उनके लिए नोट्स बनाकर। उस समय तो स्याही भरने वाले पेन ही चलते थे न।ÓÓ मयंक ने भी याद दिलाया।
मृदुला भी मयंक के एक अधिकारी के संबंध में बतलाती हुई बोली- \'\'बहुत गंदे किस्म का था वह तुम्हारा अधिकारी। उससे अदिक उसकी बीवी घमंडी और गिरे हुए विचारों की थी। उनका बेटा अनुभव के साथ कक्षा पांच में जब था तो उसने किस तरह नाजायज रूप से अपने बेटे के नंबर बढ़ाकर उसकी प्रथम पोजीशन करवा ली थी जबकि अनुभव और विभा दोनों ही अपनी-अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आते थे। मैंने शिकायत करके कापियां खुलवाई तो अनुभव के कई प्रश्नों के उत्तरों के नंबर ही नहीं जोड़े गए थे। नंबर जोड़े तो अनुभव बहुत आगे निकल गया।ÓÓ
सुबह से एक के बाद एक मयंक और मृदुला के यादों के चक्र में से कई कडिय़ां निकलकर सामने आती रहीं। उनका जीवन प्रेम और सद्भाव का अनूठा उदाहरण था। साथ उठते, साथ सोते, साथ ही चाय, और खाना-पीना होता। कहीं भी जाते आते साथ ही जाते आते थे। मृदुला मायके भी जाती तो मयंक के साथ ही जाती और साथ ही वापस आ जाती।
जिंदगी अपनी रफ्तार से चलती रही। शादी की छियालीसवीं सालगिरह के दो माह पूर्व एक दिन मयंक के पेट में तेज दर्द उठा। दर्द को रोकने वाली दवाईयां दी गई। डॉक्टर को दिखलाया गया। सारी जांच करवाई गई। दो दिन बाद निश्चित हुआ कि \'जॉन्डिसÓ काफी बढ़ी हुई स्थिति में है। \'बिलरूबिनÓ का स्तर पच्चीस से भी अधिक है। शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती किया गया। इलाज चला। पर कोई फायदा नहीं हुआ। हालत बिगड़ती गई। अनुभव और रंजना ने इलाज के लिए मुंबई ले जाने का निर्णय लिया। किसी तरह ट्रेन में आरक्षण करवाकर मयंक को मुंबई ले जाया गया। साथ में अनुभव व रंजना भी गए। मृदुला तो थी ही। एक दिन बाद जापान से प्रणय, विभा व क्षिप्रा भी आ गए। एक सर्वसुविधायुक्त अस्पताल में भरती कराया गया। दूसरे ही दिन डॉक्टरों ने सूचित किया कि मयंक \'हेपेटाइटिस कोमाÓ में चले गए हैं। \'लाइफ सेविंग वेन्टीलेटरÓ में रख दिया गया। दस दिनों तक जीवन और मृत्यु से लड़ते हुए मयंक ने यह संसार छोड़ दिया। परिवार को देखते ही देखते असह्य गहरा धक्का लग गया। गहन शोक में डूब गया सारा परिवार। मुंबई में ही अंतिम संस्कार कार्य कर दिया गया।
सभी लोग भोपाल वापस आ गए। चौथे, दसवें व तेरहवीं का कार्य भोपाल में पूरा किया गया। मृदुला तो जैसे बिल्कुल ही अपंग हो गई थी। गुमसुम हो गई- एक दम गुमसुम। तेरहवीं के पश्चात प्रणय व विभा वापस जापान चले गए। अनुभव और रंजना भी अपने-अपने काम पर जाने लगे। घर पर रह गई तो अकेली मृदुला। दक्ष भी स्कूल जाने लगा था नर्सरी में। खाना बनाने वाली नौकरानी जो समय-समय पर आती थी, उसका समय ऐसा रख दिया गया कि जिस बीच दक्ष घर पर रहता हो और रंजना घर पर नहीं रहती हो, यह नौकरानी घर पर रहे व दक्ष को देखे। मृदुला का जीवन तो एकदम बंजर हो गया- सूख गया। अनुभव व रंजना बहुत समझाने की कोशिश करते पर वह केवल चुपचाप सुनती भर रहती। उसकी स्मृति में मयंक की ही सारी बातें घूमती रहतीं- उसके द्वारा सुख और दुख के समय कहे गए शब्द-संवेदना व सांत्वना के रूप में कहे गए शब्द- घोर निराशा के समय में कहे गए आस्था के शब्द- हर समय ही उसके मन- मस्तिष्क में गूंजते रहते। डर और एहसास तो मृदुला को पहले भी था पर जब कोई मूल्यवान वस्तु खो जाती है तब उसका वास्तविक महत्व समझ में आता है। फिर मयंक तो मृदुला के रोम-रोम में बसा था। हर सांस में बसा था- वह तो उसके लिए वह था जिसका वह मूल्य ही नहीं आंक सकती थी। मृदुला ने मयंक के साथ रात दिन के हर एक पल एकाकार होकर जिए थे। जिंदगी की सांझ में जब अपने जीवन साथी के सहारे की, भावनात्मक व संवेदनात्मक अनुभूति की ऊष्मा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है उसका जीवन साथी उसे छोड़कर चला जाए तो जीवन किस प्रकार धूल-धूसरित हो जाता है वह अब महसूस कर रही थी। एक और अप्रिय घटना जो मयंक के हादसे के एक माह पूर्व ही हुई थी वह यह कि घर की विश्वस्त नौकरानी मंजू यह घर छोड़कर चली गई थी। उसका लड़का व बहू उसे लेकर अलग घर में रहने लगे थे। लड़का व बहू दोनों ही नौकरी करते थे। उनका बच्चा छोटा था। उसकी देखभाल के लिए भी उन्हें मंजू की बहुत आवश्यकता थी।
कुछ ही समय में एक बात और हो गई। मृदुला को \'आर्टीफिशियल ज्वाइन्टÓ की जगह पर बहुत दर्द रहने लगा। दर्द निवारक दवाएं भी बेअसर होने लगीं। डॉक्टरों से परामर्श लिया गया। \'हिप ज्वाइन्टÓ की \'लाइफÓ खत्म हो चुकी थी। वह काम नहीं कर रहा था। उसके कारण कोई नर्व दब रही थी जिसे वह से असह्य दर्द होता था। अब ऑपरेशन के अलावा कोई अन्य प्रभावी उपचार नहीं था। इस उम्र में पुन: \'हिप ज्वाइन्ट रिप्लेसमेंटÓ का बड़ा ऑपरेशन जीवन के लिए खतरा था। अनुभव और रंजना ने डॉक्टरों से चर्चा के उपरान्त यह निर्णय लिया गया कि \'ज्वाइन्ट रिप्लेसमेंटÓ के बजाय, पुराना खराब हो गया \'आर्टीफिशियल ज्वाइन्टÓ पूरी तरह हटा दिया जाए। यह ऑपरेशन तुलनात्मक रूप से छोटा होगा और कम \'रिस्कीÓ भी। ऐसा ही किया गया। ऑपरेशन सफल हो गया। दर्द भी ठीक हो गया पर मृदुला का चलना-फिरना बिल्कुल बंद हो गया। सब कुछ बिस्तर और कुर्सी पर सीमित हो गया। वह अखबार और धार्मिक पुस्तकें पढ़-पढ़कर दिन बिताने की कोशिश करतीं। थोड़ा बहुत टी.वी. देखकर। कुछ समय और निकल गया। मृदुला के जीवन में अकेलापन बढ़ता गया। अनुभव को अपने काम से फुर्सत नहीं मिलती थी। चलते-फिरते मां के सामने दो-चार मिनट को आ जाता था। रंजना भी दो अस्पतालों में काम करती थी। एक में सुबह और दूसरे में शाम को। थोड़ा सा जो समय घर के लिए मिलता वह बेटे दक्ष के साथ निकल जाता। रंजना भी मृदुला से दो-चार शब्द बोलकर चली जाती। कभी भी सास के पास बैठकर बातें करने का समय नहीं होता। मृदुला पैरों व हिप की दिक्कत के कारण बच्चे को संभाल नहीं पाती थी। वह बहुत दु:खी रहने लगी। कोई भी बात करने वाला नहीं मिलता। अपने आप उठकर कहीं जा नहीं पाती। पारिवारिक विघटन और जालसाजियां, साजिशों से भरे, भारतीय संस्कृति की धज्जियां उड़ाते हुए, भद्दे नग्न प्रदर्शन वाले सीरियल व कार्यक्रम, उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थे। समाचार कब तक देखें। अखबार कितना पढ़ें। अकेलेपन की घुटन उनका दम घोंटने लगी।
एक दिन जब अनुभव और रंजना दोनों ही घर पर थे तो नौकरानी ने उन्हें बतला दिया- \'\'साहब जी, आज मम्मी जी ने सुबह से कुछ भी नहीं खाया है। बिल्कुल भूखी है।ÓÓ
\'\'क्यों? क्या बात है?ÓÓ अनुभव ने पूछा।
\'\'मुझे नहीं पता। कुछ भी नहीं बतलातीं। बस, इतना कहती हैं कि भूख नहीं है।ÓÓ नौकरानी ने जवाब दिया।
अनुभव व रंजना तुरंत मृदुला के पास पहुंच गए।
\'\'मम्मी क्या बात है? आपने आज खाना क्यों नहीं खाया?ÓÓ
मृदुला चुप रही। कोई जवाब नहीं दिया। अनुभव और रंजना ने बहुत दवाब डाला तो वे बोलीं- \'\'बेटा, मैं अब जीना नहीं चाहती हूं।ÓÓ
\'\'ऐसा मत बोलिए मम्मी। ऐसी क्या बात है।ÓÓ अनुभव और रंजना दोनों ही एक साथ बोल उठे और मृदुला का हाथ पकड़ लिया।
मृदुला ने अब बोलना प्रारंभ किया- \'\'नहीं बेटा, ऐसी बात है। मैंने जीवन को अर्थमय और सुखमय बना लिया था। अब मैं बिल्कुल अकेली हूं। चल फिर भी नहीं पाती हूं। कुछ कर भी नहीं सकती। दिनभर ही नकारात्मक बातें दिमाग में घूमती रहती हैं। रात में ठीक से नींद नहीं आती। नींद खुल जाती है तो रात काटना मुश्किल हो जाता है। दिन में भी कहां तक अखबार पढ़ूं। तुमको और रंजना को फुर्सत नहीं मिलती है कि हमारे पास बैठ सको। जो भी फुरसत मिलती है उसमें तुम्हारी भी तो अपनी जिंदगी है। तुमको तो मालूम है और विभा को भी कि अपने दिनों में हम और तुम्हारे पापा हर क्षेत्र में कितने सक्रिय थे। चाहे वह ऑफिसर क्लब की बात हो अऔर चाहे किसी अन्य सांस्कृतिक, सामाजिक संस्था की या उनके आयोजनों की- पुरुषों के क्षेत्र में तुम्हारे पापा और महिलाओं के क्षेत्र में हम अग्रणी रहते थे। हमेशा ही अति व्यस्त और महत्वपूर्ण स्थिति में रहे हैं हम दोनों। कभी हम लोगों को आशंका होती थी कि हममें से कोई एक नहीं रहा तो दूसरे का जीवन बिल्कुल अकेला और भार हो जाएगा, तो तुम्हारे पापा कहते थे- \'\'हमारे बच्चे ऐसा नहीं होने देंगे। हमने उन्हें अच्छा संस्कार दिए हैं।ÓÓ अब तुम्हीं बतलाओ, जिसका जीवन इतना व्यस्त और सक्रिय रहा हो, जिसको तुम्हारे पापा जैसा मजबूत भौतिक व भावनात्मक सहारा और अटूट प्यार मिला हो वह इन परिस्थितियों में और अकेलेपन में ऐसे घुट-घुटकर कैसे जी सकता है। आज की स्थिति सोचो। दिनभर न कुछ कर सकने की स्थिति, न चल फिर सकने की स्थिति और न कोई बोलने बात करने वाला। मैं अब जीना नहीं चाहती। मैं इच्छा-मृत्यु चाहती हूं। मैं इसके लिए सक्षम कोर्ट को और राष्ट्रपति को पत्र भेज रही हूं।ÓÓ
अनुभव और रंजना स्तब्ध रह गए। अनुभव तो एकदम फूट-फूटकर रो पड़ा और मां से लिपट गया- \'\'मम्मी, मत बोलो ऐसा। हम ऐसा कुछ भी नहीं होने देंगे।ÓÓ
रंजना अवाक खड़ी थी। उसकी आंखों से भी आंसू गिर रहे थे।
अनुभव मां से लिपटा हुआ था। उसका रोना नहीं रुक रहा था। सिसकियां भरते हुए ही वह बोला- \'\'अब, हम लोग तुम्हें अकेला नहीं रहने देंगे। पापा का खोया हुआ सम्बल हम लोग देंगे। तुम वचन दो कि इस तरह की गलत बात अब बिल्कुल भी नहीं सोचोगी।ÓÓ फिर रंजना की ओर देखकर बोला- \'\'तुम ऐसा ही करोगी न।ÓÓ
\'\'हां, बिल्कुल अकेला नहीं रहने देंगे मम्मी जी को। अब कोई दु:ख नहीं होने देंगे। हम लोग प्रण लेते हैं।ÓÓ
मृदुला ने एक ओर से अनुभव को अपनी बांहों में समेट लिया और दूसरी ओर से रंजना को। मृदुला की आंखों से स्नेह अश्रु गिरने लगे।
रात में ही अनुभव और रंजना ने यह तय किया कि रंजना अब केवल एक अस्पताल में ही काम करेगी। दूसरे अस्पताल का बचा हुआ समय घर को और मृदुला के साथ रहने में देगी। अनुभव ने भी अपने क्लीनिक का समय कम करने का निश्चय किया और यह भी कि समय इस प्रकार नियोजित करेगा कि रंजना और उसमें से कोई एक अवश्य ही घर पर और मां के पास रहे।
और मृदुला ने अपनी \'इच्छा-मृत्युÓ के पत्र टुकड़े-टुकड़े करके जला दिए।