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Saturday 18 Nov 2017

आपदा

ओमीश परुथी
463 सेक्टर 14,
सोनीपत (हरियाणा)
मंदिर में प्रवेश करते समय मौसम सामान्य था। आकाश के उत्तरी छोर पर बादल घिर रहे थे। पर पर्वतीय परिवेश में बादलों का आवागमन लगा रहता है।
पूजा, अर्चना एवं दर्शन करके माथुर परिवार अति प्रसन्न था। गजेन्द्र बाबू की केदारनाथ के दर्शनों की चिरअभिलाषा आज पूरी हुई थी, वे गदगद थे। पिछले कई वर्षों से वे अपने इकलौते बेटे उपेन्द्र को यात्रा कराने के लिए कह रहे थे। पर इस वर्ष ही योग बना। साथ में बहू विभा व पौत्र आशुतोष भी आए थे। आशुतोष नाम भी उन्होंने रखा था; बचपन से ही उनकी भोलेनाथ में असीम आस्था थी। दर्शन करके परिवार के सभी सदस्यों के मुखमंडल पावन आभा से दीप्त थे। कितनी देर तक निरंतर द्वार के बाहर लगे घण्टे को बजा-बजाकर गजेन्द्र बाबू अघा न रहे थे। विभा बेटे संग नंदी महाराज की परिक्रमा कर रही थी।
अचानक सारा परिदृश्य बदल गया। धूप तिरोहित हो गई। गगन गर्जाने लगा। देखते-देखते गाढ़े, काले व भयावह बादलों से घिर गया। मोटी-मोटी बूंदें पडऩे लगीं। दोपहर के समय दिन ढल जाने का आभास होने लगा। श्रद्धालुओं ने छतरियां खोल लीं। जैसे-जैसे बारिश बढऩे लगी, श्रद्धालु भागकर इधर-उधर शरण लेने लगे।
माथुर परिवार भाग कर उस दुकान पर पहुंचा, जहां से उसने प्रसाद व पूजा की सामग्री खरीदी थी। वहीं उनके छाते व विभा के चमड़े का बैग रखा था। दुकान के शेड में पहले ही कई श्रद्धालु शरण लिए हुए थे। माथुर परिवार को देख अभी-अभी भीतर से आया दुकानदार चेतावनी-सी देते हुए बोला- ''बाबू जी, मंदाकिनी बड़ी उग्र हो रही है। मैं अभी पिछली खिड़की से देख के आया हूं। जल का रंग स्याह हो रहा है। यह विपदा का संकेत है। आप सब मंदिर के समीप पीछे जो पहाड़ी है; उस पर चढ़ जाओ।ÓÓ उसके चिंतातुर चेहरे को देखकर साफ लगता था कि वह किसी आसन्न संकट को भांप चुका है। पर उसकी चेतावनी सुनकर भी वहां खड़े लोग हिले नहीं, किंकर्तव्यविमूढ़ से एक-दूसरे को देखते रहे।
बारिश और तेज हो गई। मंदाकिनी की गर्जना आतंकित करने लगी। दुकानदार से रहा नहीं गया- ''अरे भाई, जाओ, बच्चों की जान तो बचाओ। मैं भी दुकान बंद कर घर जा रहा हूं।ÓÓ तब एकदम सब उस पहाड़ी को ओर भागे। विभा अपना बैग भी नहीं उठा पाई। चले तो सभी एक-दूसरे का हाथ थाम कर थे। पर बादलों के घोर गर्जन व घटाटोप अंधकार के छा जाने से आपाधापी मच गई। पहाड़ी पर जल्दी से जल्दी पहुंचने की होड़ में सदस्यों के हाथ आपस में छूट गए। पहाड़ी एकदम पास भी न थी। दौड़ते-दौड़ते गजेन्द्र बाबू की सांस फूलने लगी। उन्होंने पोते को उठाकर सीने से लगा लिया था। घबराहट में वे मंदिर की ओर ही मुड़ गए।
पानी इतनी जोर से बह रहा था कि लगता था, मोटी-मोटी कई जलधाराएं इकट्ठी होकर आकाश से धरती पर फट पड़ी है। हड़बड़ाहट में कोई पीछे रह गया, कोई पहाड़ी पर चढ़ गया। सांस फूलने लगी तो उपेन्द्र ने रुक कर पीछे मुड़कर  देखा। पत्नी तो आती दिखी, लेकिन बाबा और आशु का पता न चला। वह एकदम घबरा गया। पैरों तले लगा, जमीन खिसक रही है। उसने चिल्लाकर विभा से दादा-पोते के बारे में पूछा। सुनकर वह सन्न रह गई- ''क्या, हमारे साथ ही तो थे। मैं सोच रही थी वे हमसे आगे होंगे।ÓÓ उपेन्द्र उसे वहीं रुकने को कह कर उन्हें ढूंढने के लिए नीचे उतरने लगा। इतने में उसने नीचे जो देखा उसकी रुह कांप गई। जिस दुकानदार ने उन्हें बचने के लिए इधर भेजा था, वह खुद दुकान बंद करते समय नौकर सहित पानी के प्रचण्ड प्रवाह में बह गया। देखते-देखते वे दोनों विलुप्त हो गए। उपेन्द्र का दिल धक-से रह गया। उसने ऐसा हृदयविदारक दृश्य पहले कभी न देखा था। एक बार तो ऐसा लगा जैसे किसी ने प्राण ही सोख लिए हो। वह नीचे उतरने को था कि विभा चिल्ला पड़ी- ''लौट आओ उपेन्द्र, भगवान के लिए नीचे मत जाओ।ÓÓ
''कैसे न जाऊं, बाबा और आशु; न जाने आशु का क्या हुआ होगा।ÓÓ उसकी आवाज लडख़ड़ा रही थी।
''देख नहीं रहे, नीचे तो अब चारों ओर सिर्फ सैलाब है। भला तुम क्या कर पाओगे जाकर।ÓÓ विभा अत्यधिक आतंकित थी।
उपेन्द्र ने स्वयं को इतनी बेबसी में कभी न पाया था। न उसकी सोचने की क्षमता बची, न खड़े होने की शक्ति। वह वहीं गिर गया। विभा ने आकर उसे उठाया। दोनों वहीं एक बड़े पत्थर पर बैठ गए। अन्य सहयात्री ऊपर चढ़ रहे थे, लेकिन उन दोनों की जान तो नीचे बाबा और आशु में अटकी थी। इतने में एक सहयात्री जिसने बाबा को मंदिर पर चढ़ते देखा था, ने उन्हें इसकी सूचना दी। दोनों की जान में जान आई।
पहाड़ों से बड़े-बड़े पत्थर भी नीचे लुढ़कने लगे। भू-स्खलन के दृश्य बड़े विकराल थे। पत्थर प्राणियों को अपने साथ ही लपेट लेते थे। दोनों के दिल दहल गए। वे और भी सटकर बैठ गए। चैन किसी को न था। विभा बेटे आशु को पुकार-पुकार रोने लगी। उपेन्द्र उसके आंसू तो पोंछ रहा था, लेकिन उसका अपना दिल बैठा जा रहा था। अचानक बादल फटे। हर तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा था। प्रलय का प्रकोप-घुप्प अंधेरा। डूबते हुओं की चीख, बचाने की पुकारें। बादलों की दिल हिला देने वाली गर्जना। दानवी-सी दहाड़ती मंदाकिनी। पानी का एक और रेला आया। विभा और उपेन्द्र की गरदनें भी डूब गई। दोनों ठंड से कांप रहे थे। वृक्ष टूट-टूटकर गिर रहे थे। किसी भी क्षण जान जा सकती थी। मौत किस रूप में आती है, पता न था। पानी का एक अत्यंत प्रचण्ड प्रवाह आया। दोनों के सिर के ऊपर से गुजर गया। उपेन्द्र ने फट से गरदन ऊंची कर सांस ली। कहा तो विभा को भी पर वह कर न सकी। पांच मिनट के बाद पानी थोड़ा नीचे हुआ। उसने विभा को कसकर सीने से लगा लिया। लेकिन जिंदगी की कोई तपिश महसूस नहीं हुई। न स्पंदन, न संचार। न बोल, न रुदन। उपेन्द्र भीतर तक कांप गया। ''विभा, ओ, विभा, तुम बोलती क्यों नहीं। क्या हुआ है तुम्हें।ÓÓ उसकी बांहों में ही उसकी गरदन लुढ़क गई। ओह नो, यह नहीं हो सकता। तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकती। हे भगवान! यह कैसा जुल्म हो रहा है मेरे साथ। नब्ज परखी, कलाई को छुआ, कनपटी को छुआ। वह जा चुकी थी। अब वह न चिल्लाया, न रोया। बस जड़, मौन। पथराई सी आंखें। उसे चक्कर-सा आया। बांहें शिथिल हुई, पकड़ के ढीला होते ही विभा पानी में समा गई। उपेन्द्र देखता भर रहा। शून्य में पथराई नजरों से। कर कुछ नहीं सका। कर सकता भी क्या था? सिवाय बेबसी में रोने के। पानी अब भी बरस रहा था। आकाश ने न जाने आज क्या ठान रखी थी, मानो धरती को डुबोकर ही दम लेगा। सारी रात बारिश होती रही। पत्थर लुढ़ककर नीचे जो मिला उसे कुचलते रहे। यह कहर की रात थी। लोगों के आशियाने ढह गए, पुल बह गए और सड़कें धंस गई। कहीं-कहीं पूरी सड़क पानी में डूब गई, जो ढहा उसका मलबा भी पानी में समा गया। ऐसी प्रलय की काली रात्रि न श्रद्धालुओं ने कभी देखी थी, न वहां के निवासियों ने। चारों ओर पानी ही पानी- प्रचण्ड, प्रमत्त; क्रूर काल का रूप लिए, विनाश और विध्वंस पर उतारू !
आसमान को शांत होते का$फी देर लगी। पानी उतरते, उतरते ही उतरा। तब तक कितने असहाय प्राणी प्राण गंवा बैठे थे। कुछ दब गए, कुछ गार में फंस गए, असंख्य प्रवाह में बह गए। शायद ही कोई परिवार समूचा बचा हो।
केदारधाम की सारी शोभा, रौनक जाती रही। ऐसा लग रहा था समूचे केदारधाम को भारी भरकम पत्थरों से खुरच-खुरच कर खुरदरा, भद्दा तथा बदरंग कर दिया गया हो। पानी उतरने पर पत्थर, बोल्डर व मलबा बिखरा हुआ ऐसा लग रहा था जैसे धरती के गाल पर ढेर-सी फोड़े-फुंसियां हो गई हों।
पानी उतरने पर लोग पहाड़ों व आश्रमस्थलों से नीचे उतर स्वजनों को तलाशने लगे। उपेन्द्र लुटा-पिटा-सा नीचे उतरकर सीधा मंदिर में गया। द्वार पर ठिठककर भीतर देखा तो अवाक रह गया। मंदिर-मंदिर ही न था। ऊपर तक गार भरी थी। मंदिर में शरण लेने आए श्रद्धालु उसी गार से लथपथ, गार में धंस गए थे। शिव का पावनधाम शवों से अटा पड़ा था।  उन्हें देखकर आशंका तडि़त-सी उसके अन्तस में दौड़ गई। वह सिहर-सिहर गया। किसी की बाजू, किसी की टांग, किसी का धड़ दिखाई दे रहा था। किसी के सिर के बाल भर दिखाई दे रहे थे, शेष जिस्म गार में डूबा-फंसा था। काफी जूझने के बाद भी उसे कोई शव ऐसा न लगा जो बाबा या आशु का रहा हो। वह फूट-फूट-कर रोने लगा- 'हे शंकर, तेरे रहते न पिता रहे, न पुत्र। शरणागत को भी न बचा पाए, आप। मैं आपके दर्शन करने यहां आया था या पूरा परिवार खोने। अच्छे दर्शन दिए आशुतोष। मेरा आशु ही न रहा। ओ भगवान, फिर मुझे भी क्यों न मार डाला। ओ-हो-हो-।Ó द्वार-स्तंभों  से सिर पटकते-पटकते उसका माथा खून से भर गया। वह गिरने को ही था कि एक साधु ने उसे थाम लिया। किसी प्रकार सहारा देते हुए उसे अपने टूटे-फूटे आश्रम तक ले आया। लिटाकर, उसे पानी पिलाया। जबरदस्ती कुछ उसके मुंह में डाला।
''बाबा, मुझे क्यों जिला रहे हो। मर जाने दो न!ÓÓ उपेन्द्र ने उन्हें रोकना चाहा।
''ऐसा नहीं कहते वत्स! प्रभु प्रदत्त जीवन इतना तुच्छ नहीं है।ÓÓ साधु ने उसे समझाना चाहा।
''तुच्छ नहींÓÓ, व्यंग्य व क्षोभ से भरी थी उसकी वाणी- ''ये इतने शव बिखरे पड़े हैं। कोई मूल्य है मानव का? उसके जीवन का? उसे बनाने वाले को ही नहीं लगा। नहीं तो ऐसे जान लेता सबकी।ÓÓ
''तुम अभी गहरे शोक में हो। घाव बहुत ताजे हैं। कालान्तर में वही इन्हें भरेगा। और वत्स, तुम अकेले ही नहीं हो इस आपदा के भुक्तभोगी। देख तो रहे हो, हजारों बेघर व निराश्रित हैं, हजारों स्वजनों के वियोग से संतप्त है।ÓÓ
''बाबा, उपदेश देना मुश्किल नहीं होता। जब अपने पर बीतती है, तो असलियत सामने आती है। फिर गियान ध्यान सब धरा रह जाता है।ÓÓ
बाबा हल्के से मुस्कुरा दिए। फिर गहरी सांस लेते हुए बोले- ''जानते हो, यह जो भगवाधारी तुम्हें समझा रहा है, यह बाल्यकाल से ही साधु न था। मैं भी सात वर्ष... पहले थोड़ा रुक-रुक कर, शून्य में मानो अतीत को साकार करते हुए बोले ...अपनी मां को केदारनाथ के दर्शनार्थ लाया था यहां। तब मैं बेगूसराय के सरकारी स्कूल में पढ़ाता था। हम केवल दो प्राणी थे परिवार में। मां दर्शन करके अतीव प्रसन्न थी। अगले दिन ऊपर जाने का कार्यक्रम था। अचानक मौसम बिगड़ गया। ऐसा झंझावात, ऐसी भंयकर बाढ़, कभी देखी न थी जीवन में। उस समय भी सैकड़ों भक्त मंदाकिनी में समा गए। मेरी जननी को भी मंदाकिनी बहा ले गई। तब मेरी दशा भी दयनीय थी, तुम्हारे समान। वापिस जाने की मेरी इच्छा भी मर गई। मैं तो अवसाद में इतना डूब गया कि विवेक खो बैठा। उसी रात नदी में कूद गया, मरने के लिए। बाद में स्वयं को इसी आश्रम में पाया। मुझे कौन लाया, कैसे बचाया, कुछ पता नहीं। इसी को हरि इच्छा मानकर यहीं साधुओं के साथ रहने लगा।Ó
''ओह, क्षमा करना बाबा। मैं न जाने आपको क्या-क्या कह गया।ÓÓ फिर काफी देर सोच में डूबा रहा। उसे एक सूत्र तो हाथ लगा, पर शोकाकुलता के साथ कदम-किधर बढ़ाएं, समझ नहीं पा रहा था।
प्रशासन के द्वारा राहत कार्य प्रारंभ हो गया, भले ही काफी देर से वे सम्हले। सैनिकों की सहायता से काम हो रहा था। उपेन्द्र भी सारा दिन इधर से उधर भटकता, शायद बाबा और बच्चे का कुछ पता चल जाए। रात को आश्रम में आकर पड़ जाता। रात को भी सो कहां पाता। अपने जिगर के टुकड़ों के बिछोह का दर्द रूह तक समाया था, नींद भी आती तो कैसे।
एक सुबह उठा तो खुद को थोड़ा शांत पाया। टहलते-टहलते मंदाकिनी की ओर चल पड़ा। साधु वहीं स्नान कर रहे थे। वह किनारे पर मंदाकिनी की लहरों को देख रहा था। वह काफी देर बैठा सोचता रहा। कई दिनों से ऊहापोह में था। आश्रम में बाबा के संग ठहरूं या...। या के बाद धुंध सी छा जाती। समझ न पाता। पर मन में यह तो बार-बार घुमड़ रहा था कि मैं अभी से ऐसा निष्क्रिय जीवन न जी पाऊंगा। वापिस जाना भी आसान न था। सोच-सोचकर कुछ हाथ न आ रहा था।
अचानक उसकी दृष्टि नदी की धारा में बहे जा रहे बच्चे के शव की ओर गई। सूना चेहरा, फूला हुआ अंग-अंग। वह कूद कर उसे किनारे पर ले आया। उसे देख अपने आशु का दर्द उभर आया। सोचा इसका क्या करूं, कैसे इसे रुखसत करूं, कैसे अंतिम संस्कार हो। दूर सैनिकों का राहत शिविर दिखाई दे रहा था वह उस बेजान मासूम को वक्ष से लगाए उधर ही चल पड़ा। उसके चेहरे पर उलझाव के भाव जाते रहे। राहत कार्य में डूबकर ही उसे शायद कुछ राहत मिले। यही सोचकर वह आगे बढ़ता चला गया।