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Monday 20 Nov 2017

मैं क्यों नहीं

डॉ. नरेश
169, सेक्टर-17, पंचकूला-134109
अपने पड़ोसी से कामेश्वर की जान-पहचान तो तभी हो गई थी, जब उसने यह मकान खरीदकर इसमें रहना शुरू किया था लेकिन पड़ोसी के साथ मेलजोल बढ़ाकर गहरी दोस्ती कर लेने का कारण पड़ोसी की अत्यंत सुन्दर पत्नी थी। कामेश्वर ने जब पहली बार पड़ोसी की पत्नी को देखा था तो उसका मन चाहा था कि उसे अपनी बांहों में भींच ले, चूम ले उसके गदराए हुए गालों को, उसके आकर्षक गुलाबी होंठों को। यह सब न हो सकता था, न हुआ लेकिन यह लालसा पिछले एक वर्ष से उसके भीतर सुलग रही थी, जो आने-बहाने से बार-बार उसको पड़ोसी के घर ले जाती थी।
पड़ोसी भला आदमी था। कामेश्वर का समवयस्क ही था। कामेश्वर की आत्मीयता ने लगभग मोह लिया था उसे। उसकी इकलौती बेटी साधना कॉलेज में पढ़ती थी। कामेश्वर को साधना भी बहुत अच्छी लगती थी लेकिन साधना की मां उसे साधना से कहीं अधिक पसंद थी। वह दस-बीस बार ऐसे समय पर भी पड़ोसी के घर गया था जब पड़ोसी घर में नहींहोता था और साधना कालेज गई होती थी। पड़ोसी की पत्नी बड़ी विनम्रता से पेश आती थी उससे लेकिन वह शालीनता की लक्ष्मण रेखा पार नहीं करती थी। 'साली, बहुत संतुष्ट लगती है अपने पति सेÓ, सोचकर मन ही मन कुढ़ता-खीझता वह वापिस लौट आता।
कई बार उसने घर में अकेली पड़ोसिन से हाव-भाव की भाषा में इशारे से भी किए लेकिन शायद वह शरीर की भाषा का क-ख भी नहीं पढ़ सकती थी। एक बार तो कामेश्वर का मन हुआ कि जो होगा देखा जाएगा, एक बार उसे खींचकर गले से लगा ले और चुम्बनों की बौछार कर दे उसके गालों पर, होंठों पर, गर्दन पर लेकिन यह सब करने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी थी और वह उल्टे पैरों ही लौट पड़ा था।
''भाई साहिब, बैठिए न, कुछ चाय-पानी ले लीजिए।ÓÓ पड़ोसिन ने हमेशा की तरह पूरी शिष्टता दिखाई थी।
''नहीं भाभी, कुछ लेने आया था। क्या लेने आया था, याद नहीं।ÓÓ
''तो बैठकर सोच लीजिए, याद आ जाएगा।ÓÓ
''याद आ जाएगा तो फिर आ जाऊंगा। आपके घर को तो मैं अपना ही घर समझता हूं।ÓÓ
कामेश्वर ने कई बार साधना पर भी डोरे डालने का अस्पष्ट-सा प्रयास किया था लेकिन यहां भी निराशा ही उसके हाथ लगी थी।
''साधना, मेरा मैथ्स बहुत अच्छा होता था कभी। अभी भी ऐसा बुरा नहीं है। कभी कुछ समझना चाहो तो संकोच मत करना बेटा। बेझिझक चली आना।ÓÓ
''थैंक्यू अंकल, मेरा ख्याल है इसकी जरूरत मुझे नहीं पड़ेगी क्योंकि मैं फाइन-आर्ट की स्टूडेंट हूं।ÓÓ
खिसियाना-सा हो गया था कामेश्वर।
दो-एक बार कॉलेज में पुरस्कार प्राप्त करने पर आनन्दातिरेक में अपने घर आई साधना को उसने बुजुर्गी के भेस में छूकर देख लिया था। उसकी पीठ थपथपा दी थी, उसे दाईं बांह में ले लिया था, उसके गालों को दोनों हाथों से छू लिया था। ''इसका स्पर्श इतना रोमांचकारी है तो इसकी मां के शरीर का स्पर्श कैसा लाजवाब होगाÓÓ, सोचा था उसने और एक क्षण के लिए भीतर सुलग रही लालसा ने ज्वाला का रूप ले लिया था लेकिन आग की यह लपट जो हवा के तेज चलने से जी उठी थी, हवा के थमते ही फिर राख के आंचल में जा सोई थी।
शाम छह बजे पड़ोसी कामेश्वर के पास आया तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
''क्या बात है दोस्त, सब कुशल है ना?ÓÓ
''क्या बताऊं यार।ÓÓ सिर पकड़कर सोफे पर बैठ गया पड़ोसी।
''खैरियत?ÓÓ
''साधना कॉलेज से नहीं लौटी अभी तक। कॉलेज दो बजे बंद हो गया था। कहां गई, राम जाने। जहां-जहां अनुमान था उसके हो सकने का, वहां-वहां हो आया हूं। उसकी कई सहेलियों के घर हो आया हूं, वह कहीं नहीं थी।ÓÓ
''तुमने किसी पार्क में, किसी सिनेमा हाउस में, किसी कैफीटेरिया में ढूंढा उसे?ÓÓ
''नहीं, इन जगहों पर तो मैं नहीं गया।ÓÓ
''तो आओ चलें, हो सकता है किसी फ्रेण्ड के साथ किसी ऐसी ही जगह पर गई हुई हो।ÓÓ
फटाफट उठकर जूता पहना कामेश्वर ने और पड़ोसी के साथ बाहर निकल आया।
''गाड़ी की चाबी मुझे दो, मैं ड्राइव करता हूं। तुम बहुत टैंस हो।ÓÓ
बिना कुछ कहे पड़ोसी ने गाड़ी की चाबी उसे थमा दी।
उसने गाड़ी स्टार्ट की। शहर की काली-स्याह सड़कों पर सरपट भागती हुई गाड़ी ने बुद्धा पार्क, रोज गार्डन, कर्ण झील, हैगिंग गार्डन आदि का चक्कर लगाया। दोनों ने दो-चार कैफीटेरियाज के भीतर घुसकर झांका। मिनर्वा का शो खत्म होने तक की प्रतीक्षा करते सिनेमा हाल में से निकल रही भीड़ को आंखें फाड़कर देखा। साधना कहीं दिखाई नहीं दी।  थक-हारकर $फन-सिटी के लॉन में एक बेंच पर बैठ गए वे दोनों। पड़ोसी की हताशा अपनी चरम सीमा को छू रही थी।
''कभी पहले भी गई है इस तरह से?ÓÓ पूछा कामेश्वर ने। ''कभी नहीं। कहीं जाती थी तो $फोन पर बताकर जाती थी। घर लौटने तक कई बार फोन करती थी। मगर आज तो उसका मोबाइल ही आउट ऑफ रीच आ रहा है दोपहर बाद से।ÓÓ
''उसका कोई ब्वाय फ्रेंड है?ÓÓ
''कई हैं। हमने उसे पूरी लिबर्टी दे रखी थी। उसके क्लास-$फेलो ही हैं कई लड़के। उसके कुछ फ्रेंड्स हमारे घर पर भी आते हैं। वह भी जाती रहती है उनके घर पर।ÓÓ
''यार, बुरा मत मानना, जवान-जहान लड़की को इतनी लिबर्टी नहीं देनी चाहिए थी तुम्हें।ÓÓ
''क्या करें मित्र, जमाना ही ऐसा आ गया है। हम सोचते थे कि पाबंदियों में रखेंगें तो चोरी-छिपे वह करेगी, जिससे हम मना करेंगे। इसलिए दे रखी है आजादी, लेकिन आज तो उसने हमारा विश्वास ही तोड़ दिया है।ÓÓ
''जी छोटा मत करो, यार, मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं। तुम्हारी चिन्ता-दुश्चिन्ता का भी अहसास है मुझको, मैं तुम्हारे परिवार को अपना परिवार समझता हूं। तुम अगर सख़्ती नहीं कर सकते तो मुझे करनी पड़ेगी सख़्ती। मेरी भी तो बेटी है वह आ$िखर।ÓÓ
अचानक वाटर-फॉल की बगल के ट्रैक पर, एक लड़के के बाजू में बा•ाू डाले, टहल रही साधना पर नज र पड़ी कामेश्वर की। उसकी उत्तेजना, क्रोधाग्नि में बदल गई।
''वह रही उस हरामी के साथ।ÓÓ उंगली से इशारा करते हुए कामेश्वर ने कहा और हठात् उठकर दौड़ पड़ा वाटर-फॉल की ओर। पड़ोसी उसके पीछे-पीछे उद्विग्न डग भर रहा था।
''साधना!ÓÓ लगभग चीखकर पुकारा कामेश्वर ने।
साधना ने उसकी ओर देखकर हाथ हिलाया, ''हाय अंकल।ÓÓ
तुरन्त ही उसकी नजर अपने पिता पर पड़ी तो वह एकदम घबरा गई। लड़के से हाथ छुड़ाकर वह तेज-तेज कदमों से उन दोनों के पास पहुंची तो कामेश्वर ने आव देखा न ताव, एक जोरदारा तमाचा जड़ दिया उसके गाल पर। उसके पिता की हालत तो ऐसी थी कि काटो तो खून नहीं।
पड़ोसी अंकल के नितान्त अप्रत्याशित, अभद्र, आक्रामक व्यवहार से चकरा-सी गई साधना।
''शर्म-हया है तुमको कुछ? दोपहर से तुम्हारे पापा ढूंढ रहे हैं तुम्हें। शाम से हम दोनों भटक रहे हैं जगह-जगह। कौन है ये लड़का।ÓÓ पूछा कामेश्वर ने।
''मेरा दोस्त है।ÓÓ
''दोपहर से इसी के साथ हो?ÓÓ
''हां... चेतन, इधर आओ।ÓÓ उसने थोड़ी दूरी पर खड़े किंकत्र्तव्यविमूढ़ चेतन को आवाज दी।
बूचडख़ाने की ओर जा रहे बकरे की तरह घिसटता-सा बढ़ आया उन तक चेतन।
''पापा, ये चेतन है। प्रो$फेशनल आर्टिस्ट है।ÓÓ
''आप चलिए चेतन जी। दोबारा आज जैसी हरकत की तो अपना पढ़ा-लिखा समझ लेना।ÓÓ पापा के व्यवहार में अप्रत्याशित तब्दीली देखकर साधना हक्का-बक्का रह गई।
''चलो साधना।ÓÓ पड़ोसी ने आदेश दिया बेटी को।
''बाय चेतन।ÓÓ कहकर बेटी पिता और अंकल के साथ चल दी।
गाड़ी स्टार्ट करते ही कामेश्वर की जबान फिर चल निकली।
''तुम्हें पता है कि आज तुम्हारे घर पर दोपहर का खाना नहीं बना। तुम्हारी मां का रो-रोकर बुरा हाल हो रहा है। ये भाई साहिब पचास बार रोते-रोते बचे हैं।ÓÓ
''अंकल प्लीज, आपने मेरे साथ जिस क्रूरता का व्यवहार किया है, वह क्रिमीनल बीहेवियर है। आप हमारे फेमिली-फ्रेंड हैं, इसलिए मैंने अदरवाइज रिएक्ट नहीं किया। प्लीज फार गॉड सेक, मेरी पर्सनल लाइ$फ में दख़ल देने का कोई हक नहीं है आपको। आई होप इट शुड बी क्लीयर टू यू। ÓÓ
''ओके।ÓÓ कामेश्वर ने चुप साध ली और गाड़ी चलाता रहा।
बाप-बेटी भी चुप बैठे रहे घर पहुंचने तक। उनके घर के बाहर गाड़ी पार्क करके चाबी पड़ोसी को थमाई कामेश्वर ने और बिना उसके औपचारिक धन्यवाद की प्रतीक्षा किए अपने घर चला आया।
देर तक सोचता रहा वह सो$फे पर लेटकर कि उसे साधना पर इतना क्रोध क्यों आया था। क्या केवल इसलिए कि वह पड़ोसी मित्र की बेटी थी और $गलत रास्ते पर जा रही थी या इसलिए कि वह अगर किसी दूसरे लड़के के साथ रंगरेलियां मना सकती थी तो मेरे साथ क्यों नहीं। चेतन क्यों, मैं क्यों नहीं?