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Tuesday 20 Feb 2018

मनुष्य : एक किताब

   धर्मपाल अकेला
मैं जलगांव (महाराष्ट्र) में दिनभर का अपना काम निपटाकर लॉज में अपने बिस्तर पर लेटा पुस्तक पढ़ रहा था कि उत्तरप्रदेश से गए तालों के एक व्यापारी शर्मा जी मेरा हाथ पकड़कर खींचने लगे, 'चलो उठो, हर समय किताब मत पढ़ा करो, बाहर निकलो, घूम-फिरकर समाज और व्यवहार भी तो देखो... आओ-घूमने चलते हैं।Ó नया-नया परिचय हुआ था, इस लॉज में ही। मैं महाराष्ट्र पहली बार गया था, इसलिए शर्माजी ने उत्तरप्रदेशी होने के कारण स्वयं को मेरा अभिभावक नियुक्त कर लिया था। मैं विवश उठकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हम लोग एक ऐसी सड़क पर पहुंचे जहां अनेक अंगूर बेचने वाले अपना-अपना छीबा कतार में लगाए बैठे थे। महाराष्ट्र में ये लोग 'शेतकरीÓ कहे जाते हैं। मुझे अपनी पुस्तक छोड़ जाने के कारण क्षोभ था... 'हाय, कम्बख्त मैं कहां आया...Ó की मनोदशा थी मेरी।  'गोड़े काई? शर्मा जी ने एक छीबे वाले के सामने ठहरकर अंगूरों की ओर संकेत करते हुए पूछा- 'खाउन नगा...Ó और शेतकरी ने उठाकर कई एक अंगूर हम दोनों की ओर बढ़ा दिए। हमने मुंह में अंगूर डाल लिए और शेतकरी ने आशाभरी निगाहों से देखते हुए पूछा, 'दूं।ÓÓ 'ऊँऽहूंÓ मुंह बिचकाकर शर्मा जी ने मेरी ओर से भी स्वयं ही इनकार कर दिया।  मुंह चलाते हुए हम लोग आगे बढ़े, यही दृश्य हर छीबे के सामने रुक-रुककर इन्हीं शब्दों सहित अभिनीत हुआ, आखिरी छीबे से आगे सरकते ही मैंने शर्मा जी से कहा, बहुत हुआ शर्मा जी, अब तो ले ही लेते हैं। 'पैसे फालतू हैं क्या, अब पेट में स्थान ही कहां रह गया है, चलो।Ó और हम लॉज की ओर लौट चले। अब मुझे किताब छूटने का क्षोभ कतई नहीं रह गया था। एक साक्षात् किताब मैंने अभी-अभी ही पढ़ डाली थी। मनुष्य भी तो अपने-आप में एक किताब ही है... है न?     पुनर्नवा, प्रेमपुरा हापुड़, उप्र- 245101 मो. 9258832100