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Saturday 18 Nov 2017

तिनके

ऋषि गजपाल
302, लक्ष्मी एनक्लेव, इस्पात, रिसाली
भिलाई नगर-490006
मो. 9407983335
बिजली की प्रत्येक कौंध से जैसे अकेली नई नवेली चौंक जाती है, घबरा जाती है। वैसे ही मोबाइल फोन के प्रत्येक काल पर वह चौंक जाता, चौकन्ना हो जाता। तुरन्त सारे काम छोड़कर कान से फोन सटाए बाल्कनी में चला जाता या गली की तरफ निकल जाता। आधे-आधे घंटे गुफ्तगू करता रहता। फोन पर बात खत्म कर वापस कमरे में आने पर वो उमंग-चमक गायब हो जाती, जो कुछ देर पहले उसके चेहरे पर होती थी।
पिछले छ:-सात माह से यही सिलसिला जारी है। फोन पर ''रिंकचिका-रिंकचिका हो-हो-हो-हो-ÓÓ रिंगटोन बजता तो बंटी के साथ-साथ घर के सभी सदस्य भी चौकन्ने हो जाते। वैसे फोन में सामयिक हिट फिल्मी गाना ही प्राय: रिंगटोन होता, जो पिताजी के क्रोध की आग में घी का काम कर जाता। बुदबुदाता हुआ उनका चेहरा कुछ और तन जाता और घर के बाकी सदस्यों यानि मां, दादी और छोटी बहन मायूस हो जाते। सुबह छ: बजे से रात बारह बजे तक ऐसे बीसियों काल्स आते और हर बार यही होता। सिर्फ एक बार, लगभग चार माह पहले ही ऐसा हुआ था, कि फोन पर बात खत्म होने के बाद भी चेहरे पर वही चमक बरकरार रही थी। मां के पूछने के पहले ही उसने बताया था कि इंदौर से किसी नौकरी का आफर आया है। सुनते ही दादी चहक पड़ी।
- ''ये इंदौर कहां हैं रेÓÓ
-''ये उज्जैन के पास जहां महाकालेश्वर का मंदिर हैÓÓ
दादी को किसी स्थान की सही जानकारी देने के लिए आसपास की किसी मशहूर धार्मिक स्थल का संदर्भ देना जरूरी होता था।
-''जा-जल्दी जा। अगली बार जाते समय मुझे भी लेते जाना, दर्शन कर लूंगी। हे महादेव...ÓÓ
किसी बात के खत्म होने के बाद भगवान को याद करना दादी की आदत थी। उसका चेहरा सदैव मुस्कुराता सा लगता था, जैसे मोनालिसा की रहस्यमय पेंटिंग। दादी के चेहरे पर होंठ के किनारों की बनावट ही ऐसी थी जिससे वह हमेशा मुस्कुराती सी लगती थी। हालांकि आजकल ऐसी मुस्कुराहट के लिए मेडिकल साइंस में माउथ कार्नर लिफ्ट सर्जरी की जा रही है। क्योंकि आज की तनावभरी जिंदगी में ऐसे चेहरों का बनना नैसर्गिक हो भी नहीं सकता। तभी तो दादा जी उन्हें लाफिंग लेडी बुद्धा कहने लगे थे आखरी के वर्षों में। दादा के गुजरने के बाद चेहरे की बनावट तो वैसी ही है, लेकिन आंखों की चंचलता समाप्त हो गई। मजाक में कभी बंटी को कहती थी, कि ''तेरी सारी आदतें तेरे दादा जैसी ही हैÓÓ बंटी चिढ़ जाता और दादी हंसने लगती।
जब इंदौर से दो माह बाद बंटी लौटा था, तो उसके मायूस- निस्तेज चेहरे को देखकर दादी गमगीन हो गई। मां-बहन उदासी से भर गए। पिता जी का तनाव और बढ़ गया क्योंकि इंदौर जाने के बाद बंटी ने उनसे पचास हजार की मांग की थी। आनन-फानन में जुगाड़कर पचास हजार भेज भी दिया। अब आने के बाद बंटी बताने लगा कि कंपनी में पीछे रास्ते से नौकरी लगाने के लिए दलालों को पैसा देना ही पड़ता है। पिताजी ने मन में संयम रखा कि नौकरी लग जाए तो भी पैसा का खर्च होना नहीं अखरेगा। लेकिन इंदौर से आए तीन माह हो गए। न उधर से कोई जवाब न ही काल्स। अब तो उन लोगों का मोबाइल सिम भी बदल गया। पिता जी ने थाने में शिकायत करने का मन बनाया था लेकिन बंटी ने कुछ दिन रुकने कहा। बंटी तो जानता था कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कैम्पस इंटरव्यू में भी पैसों का जुगाड़ लगता है। लेकिन तब पिताजी से बोलने की हिम्मत नहीं हुई। मध्यमवर्गीय परिवार में पांच सदस्यों के खर्च के साथ इंजीनियरिंग की पढ़ाई तो जैसे-तैसे सम्पन्न हो रही है। छोटी बहन भी अब कॉलेज जाने की तैयारी में थी। वह अंकाउटेंसी में आगे बढऩा चाहती थी। पिताजी की नौकरी पांच साल शेष हैं। स्वयं का घर नहीं है। कंपनी प्रदत्त दो बेडरूम के फ्लैट में जैसे तैसे गुजारा हो रहा था। बंटी के नौकरी लगने से परिवार को बहुत बड़ा सहारा हो जाता। लेकिन कुकुरमुत्तों की तरह उगे कॉलेजों की भरमार ने बेरोजगारों के अनुपात में रोजगार की उपलब्धता न्यूनतम कर दी है। समय रहते पैसों का जुगाड़ हो पाता, तो शायद पढ़ाई खत्म होते-होते नौकरी भी मिल जाती, जैसे राजेश को मुंबई के नामी कंपनी में नौकरी भी मिली और अगले महीने विदेश जाने की तैयारी भी करने लगा है जबकि पढ़ाई में वह बंटी से कमजोर ही था।
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मोटरसाइकिल की मांग ने पिताजी को एक बार गुस्सा होने का मौका दिया था, क्योंकि एडमिशन में ही लाखों रुपयों खर्च हो गए थे। मां के समझाने के बाद मासिक किस्त वाली मोटरसाइकिल ले आए। फिर पेट्रोल और फोन रिचार्ज की आफत। पढ़ाई खत्म होते तक नौकरी की आस से पिताजी ने संयम रखा लेकिन अब सब्र का बांध फूटने लगा था। पढ़ा-लिखा बेरोजगार जवान, कुंवारी बेटी की तरह बोझ लगने लगता है। हर सप्ताह पिताजी अपने किसी मित्र या परिचित के बेटे-बेटी की नौकरी लग जाने की सूचना देते, तब बंटी और तनावग्रस्त हो जाता।
मां ने ये साफ गौर किया कि बंटी इंदौर से लौटने के बाद अधिकतर गुमसुम रहने लगा है। चेहरे और छाती की हड्डियां उभरने लगी है। अब नियमित क्लीन शेव्ड भी नहीं रहता। टोकने पर ही सैलून जाता। बहन भी जानती थी कि भाई फिलहाल अवसादग्रस्त जीवन जी रहा है। क्योंकि रात में वो और भाई साथ एक ही कमरे में पढ़ते सोते थे। वह अपने पलंग पर कभी लैपटॉप तो कभी मोबाइल फोन तो कभी किसी पुस्तक में व्यस्त रहता। तरह-तरह की बातें,जो धीमी होती, फिर भी बहन के कानों तक पहुंचती ही थी। अपनी पढ़ाई में  कोई मदद मांगने पर झल्लाकर भाई असहमति जताता। दिन में जब बहन स्कूल जाती तो यही कमरा दादी का भी हो जाता और बहन के पलंग पर सो जाती। जबकि रात में बैठक कक्ष में बिछे दीवान में उसका डेरा होता था। इस तरह दिन-रात बंटी अपना निजी जीवन तमाम विसंगतियों के साथ जी रहा था और हर दिन किसी अपेक्षा के साथ शुरू करता था।
बहुत सारी नौकरियां के आवेदनों के भरते समय फीस भी जमा करना होता था। पेट्रोल और मोबाइल रिचार्ज अलग से। पिताजी से मांगने की हिम्मत नहीं होती थी। मां ने अपने विवाह के समय मायके से दी हुई एक तोले सोने के झुमके की जोड़ी बेच दी, जो प्राय: बंद संदूक में रखी रहती थी। उस पैसे को बंटी के अकाउंट में जमा करा दिया, ताकि अपने हिसाब में व्यवस्था कर लिया करे। उसे खुशी थी कि बेटा गलत राह में नहीं पड़ा है। वरना बिगडऩे के तमाम सुविधाओं-साधनों की कभी नहीं है जमाने में। मां की यह मदद अतिरिक्त बोझ बन गई थी अब बंटी के लिए।
-''मां, मुझे नासिक जाना है। नौकरी का ऑफर आया है।ÓÓ
घर के सभी सदस्य एक बार फिर खुश हो गए। दादी के चेहरे पर तो बालसुलभ मुस्कान छा गई।
-''ऐ बंटी नासिक कहां है रेÓÓ
-''दादी... वहां पंचवटी है सुना है। राम-सीता वनवास वाला। त्रम्बकेश्वर का मंदिर भी है शायद।ÓÓ
-''जा जल्दी जा। अगली बार जाना तो मुझे दर्शन करा देना।ÓÓ
दादी खुशी-खुशी दीवान पर चादर ओढ़कर सो गई। रात भर बंटी तरह-तरह की तैयारियां करता रहा। पिताजी ने आगाह किया कि इंदौर वाले से अपना पचास हजार मांग ले वरना दबा जाएंगे दलाल। बंटी ने बताया कि नासिक वाला जुगाड़ भी तो उन्हीं का है। पिताजी संतुष्ट हो गए कि पैसा व्यर्थ नहीं गया। बंटी झूठ बोलकर भी उतना दुखी नहीं था क्योंकि उसे अब कुछ दिन खुली हवा में रहने को मिलेगा। बहुत दिनों बाद वो रात बहुत अच्छी गुजरी थी सबके लिए। उस रात सभी ने भरपेट भोजन किया।
बंटी के जाने के बाद घर में सभी अपनी सामान्य दिनचर्या तनावरहित होकर सम्पन्न करने लगे। बंटी के अब कोई भी मित्र नहीं आते। पड़ोसियों के पूछने पर मां उत्साहित होकर बताती कि बेटे की नौकरी लग चुकी है और वह सीधे दीवाली त्यौहार में आ पाएगा। प्रतिदिन रात नौ से दस बजे के बीच वह बहन या मां को जरूर एक बार फोन करता था। पिताजी को सिर्फ एक बार किया था। एक दिन झल्लाकर पिताजी ने बात करती मां से लगभग फोन छिनकर बात की तो बंटी कुछ असहज हो गया और बताने लगा कि सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। महीनेभर के अंदर कभी भी ज्वाइनिंग हो सकती है। हो सकता है नासिक की बजाय पूना या मुंबई में कंपनी की शाखाओं में ज्वाइनिंग करनी पड़े। पिताजी को चिंता हुई अभी भी नौकरी निश्चित नहीं हो सकी है। मां को चिंता थी कि बेटा माह भर से किसी सस्ते होटल में रह रहा है। उसके पास पैसा है भी या नहीं। दिनों दिन फोनकाल्स की आवृत्ति कम होने लगी क्योंकि अंतराल बढ़ता गया। फिर एक दिन बंटी ने फोन पर बताया कि मुंबई जाना पड़ेगा। मां का कलेजा हिल गया। मुंबई जैसी महानगरी। अक्सर सुनती है। फिल्मों-टेलीविजन के समाचारों में सब दिखता है। तंग और भीड़भाड़ वाले शहर में संघर्ष करता उसका अकेला मासूम बेटा। कैसा अपना अस्तित्व बचा पाएगा। कुछ बन जाने की कल्पना तो दूर ही थी।
इस बार दीपावली का त्यौहार बंटी के बिना एकदम अप्रत्याशित था सभी के लिए। कोई उमंग नहीं। जैेसे तैसे पूजा की गई, दो चार दीये जलाए गए।
अब बंटी के फोन पर संपर्क भी ढंग से नहीं हो पाता। ''आउट ऑफ रेंजÓÓ या ''मोबाइल स्विच ऑफÓÓ जैसी सूचनाएं ही अक्सर मिलती।
दादी अब बैठक कक्ष में कम ही आती। प्राय: बंटी के बिस्तर पर ही दिन-रात लेटे हुए कभी रामचरित मानस के रंगीन चित्रों को एकटक निहारती और हे भगवान- हे राम उच्चारती रहती या कभी आंखें बंद कर हाथ में तुलसी माला की कंठियां गिनती रहती। भाई के बिना बहन स्वयं को अधूरी ही अनुभव करती। तनावभर दिन थे तो क्या हुआ। भाई के साथ का संबल तो था। पिताजी तो वैसे भी अंतर्मुखी व्यक्ति थे। अब और भी कम ही बात करते थे। उनके चेहरे पर एक प्रकार का खिंचाव व्याप्त रहता था। घर से ड्यूटी, ड्यूटी से घर, बाजार से सौदा-सुलफ और ज्यादा हुआ तो गली के अंतिम छोर पर बने गार्डन के सीमेंटेड बेंच पर घंटों अकेले बैठे रहते। मां बेचारी, सब को खिलाती पिलाती-सहेजती-दुलारती थकी-मांदी रात में बिस्तर पकड़़ लेती और आधी रात से बेटे का पनीला अक्स आंखों में समेटे सुनहरी सुबह का इंतजार कर रही होती। उत्साहहीन शिथिल काया बिस्तर पर सारी रात एक करवट लेकर गुजार जाती। सुबह जब आंख खुलती तो एक तेज कड़ुवाहट सी लगती। मुंह धोकर शांत मन से भगवान के चित्र के सामने हाथ जोड़कर कुछ बुदबुदाती। शायद यही कि चाहे जैसा भी हो जहां भी हो, उसका जवान बेटा सही सलामत जवान ही रहे।