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Friday 17 Nov 2017

संशय में हैं संजय जी

सुषमा मुनीन्द्र
द्वारा- श्री एम.के. मिश्र
एडवोकेट, लक्ष्मी मार्केट,
रीवा रोड, सतना (म.प्र.) 485001
मो. 07898245549
विचार जब तक आचरण के रूप में प्रगट नहीं होता, वह पूर्ण नहीं होता। आचरण आदमी के विचार को मर्यादित करता है। जहां विचार और आचार के बीच मेल होता है वहीं जीवन पूर्ण और स्वाभाविक बनता है।
कभी कहीं पर पढ़े गए महात्मा गांधी के ये विचार संजय को दरअसल अपने व्यवहार की पुष्टि करते जान पड़ रहे हैं। नारायणी के सम्मुख संतुलन बनाने की कोशिश करता है लेकिन जानता है उसके विचार और आचरण में फासला आ गया है। नारायणी को फासले का संज्ञान है तभी तो ठीक अभी फैसले जैसी बात कहकर तुहिना के कमरे में चली गई है। स्थिति को आसान बनाए रखने के लिए नारायणी के स्वर और भाव में आमतौर पर जो अनुनय होता है वह अब भी था। इसीलिए फैसला, फैसला जैसा नहीं चुनौती जैसा कुछ लग रहा है।
यदि फैसला है तो उसे और मयार को नारायणी का घर छोडऩा पड़ेगा। यदि मयार के साथ जाने में अनिच्छा दिखाई तो कितनी बड़ी पराजय बल्कि तौहीन होगी। और यदि चुनौती है तो...। शयन कक्ष में चित्त पड़ संजय माहौल तजबीजने की कोशिश कर रहा है। रात का आठ-तीस है लेकिन मध्य रात्रि की नीरवता का अनुमान होता है। कहीं से कोई आहट, आभास नहीं मिल रहा है। संजय ने आंखें मूंद ली। मुश्किल यह है आंखें बंद हों तो चीजें अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं।
अरसा नहीं हुआ। मात्र तीन वर्ष।
सात से दस वर्ष की हो गई तुहिना और आठ से ग्यारह का मयार। वसुधा, संजय से तलाक ले अपने पुराने प्रेमी के पास गई तब मयार चार वर्ष का था। संजय विमूढ़ होकर रह जाता लेकिन नारायणी ने मयार को अच्छी घनिष्ठता दी। नारायणी का पति रत्नाकर, संजय के साथ बिड़ला एरिक्शन आप्टिकल लिमिटेड में काम करता था। फैक्टरी परिसर में दोनों के ऊपर-नीचे फ्लैट। नारायणी की बेटी तुहिना और मयार बिड़ला हायर सेकेण्डरी स्कूल में एक क्लास में पढ़ते थे। वसुधा अपनी क्षुब्धता में और संजय शर्म से किसी से प्रयोजन न रखता था। नीचे के फ्लैट में होती उठापटक ऊपर संजय के फ्लैट तक जरूर पहुंचती थी। रत्नाकर का आचरण वहशी जैसा था। जिस पर प्रफुल्ल हो जाए अपनी जान कुर्बान कर दे। रुष्ट हो जाए, जान लेने पर उतारू। कभी नारायणी को मेवा-मिष्ठान खिलाए बिना दम न ले, कभी शराब में हिंसक होकर पीटे। संजय हतप्रभ हो जाता। नारायणी ऐसी नृशंस परिस्थिति में रह लेती है जबकि निर्मम वसुधा को मयार का भी ख्याल न आया। रत्नाकर ऐसी सरल स्त्री पर हिंसा ठाता है जबकि वह वसुधा की दगाबाजियों के बावजूद प्रतिरोध न कर सका। वसुधा के चले जाने से मयार अस्त-व्यस्त हो गया था। नारायणी ने विपत्ति समझी-
''मेरे लिए जैसी तुहिना वैसा मयार। आप बेफिक्र होकर फैक्टरी जाएं। स्कूल से लौटकर मयार मेरे पास रह लेगा।ÓÓ
मयार, तुहिना के साथ स्कूल से लौटता और नारायणी के साथ दिन बिताता। शाम को फैक्टरी से लौटकर संजय उसे ले जाता। कभी-कभी मयार के साथ तुहिना चली आती। दोनों की बातें सुन संजय हतप्रभ होता। अपनी इनोसेंस में ये दोनों अच्छा विमर्श करते हैं। मयार कहता-
''तुहिना तुम्हारी मम्मी क्यूट हैं।ÓÓ
''मयार, तुम्हारी मम्मी कहां चली गई?ÓÓ
''गंदी मम्मी थी। पापा से लड़कर चली गई। पापा अच्छे हैं।ÓÓ
''मेरे पापा अच्छे नहीं है। ड्रिंक करते हैं। मुझे और मम्मी को मारते हैं।ÓÓ
मदिरा प्रेमी रत्नाकर एक बार रात भर घर नहीं लौटा था। सुबह किसी ने सूचना दी थी बड़े नाले के पास बेसुध पड़ा है। संजय उसे रिक्शे में लादकर ले आया था। रत्नाकर उस दिन बच गया था लेकिन अगली बार मदिरा के अनियंत्रण और बाइक की तेज गति के चलते रात दस बजे दुर्घटनाग्रस्त हुआ, सुबह अस्पताल में दम तोड़ दिया। नारायणी को इतनी मोहलत जरूर मिल गई कि रत्नाकर ने हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में एमआईजी खरीदकर किराए पर दे रखा था। रत्नाकर के न रहने पर नारायणी को फ्लैट छोडऩा पड़ा। किराएदार एमआईजी खाली नहीं कर रहा था। संजय ने दबाव डालकर खाली कराया और नारायणी को सुझाव दिया-
''प्रबंधन आपको अनुकम्पा नियुक्ति दे रहा है लेकिन फैक्टरी में बॉस लोगों की बहुत जी हुजूरी करनी पड़ती है। जो दो-चार महिलाएं हैं उनको लेकर रोज नई अफवाह तैयार  होती है। आप रिक्वेस्ट करें आपको बिड़ला हायर सेकेण्डरी स्कूल में नियुक्ति दें। तुहिना और मयार के साथ आना-जाना कर लेंगी।ÓÓ
''ठीक कहते हैं।ÓÓ
तब संजय को कल्पना नहीं थी दो घर, दो परिवार, दो संसार, दो पीड़ाएं विलय होंगी। उसे किसी सहकर्मी ने प्रेरित  किया था-
''संजय जी, आप नारायणी जी से शादी कर लें। आप परेशान हैं, वे भी।ÓÓ
''मयार उन्हें एक्सेप्ट करेगा?ÓÓ
''मयार के लिए ही कह रहा हूं। उसे सुविधा मिलेगी, सुरक्षा भी।ÓÓ
''मयार का मंतव्य समझना पड़ेगा।ÓÓ
रात को मयार को सुलाते हुए पूछा था-
''मयार, तुम्हें तुहिना की मम्मी अच्छी लगती हैं?ÓÓ
''बहुत। मेरी केयर करती हैं।ÓÓ
''क्या तुम चाहते हो तुहिना और उसकी मम्मी हमारे साथ रहें?ÓÓ
''मजा आएगा। मैं और तुहिना मस्ती करेंगे।ÓÓ
संजय, नारायणी को प्रस्ताव देने की मानसिक तैयारी कर रहा था जबकि मयार ने हल्ला मचा दिया-
''तुहिना, मेरे पापा कहते हैं हम लोग एक साथ रहेंगे।ÓÓ
''ओ गॉड। दिन भर और रात भर?ÓÓ
''हां।ÓÓ
बच्चों की बात सुन नारायणी नहीं चौंकी थी। संजय का रुख समझ रही थी। सास-ससुर फोन कॉल करते रहते हैं अकेली हो, सीधी(गृह नगर) चली आओ। देवर की नजर एम.आई.जी. पर है। इसे बेच कर पैसा हथिया लेगा। सीधी में उसका और तुहिना का जीवन गर्क का हो जाएगा। संजय का अहैतुक सहयोग मिले तो यहां रहने का उद्यम कर सकती है। संजय, मयार को लेने आया। प्रफुल्ल तुहिना, संजय की गोद में बैठ गई-
''अंकल, मैं और मयार एक साथ रह सकते हैं?ÓÓ
संजय, साहस एकत्र कर रहा था जबकि तुहिना ने अपनी मासूमियत में पहल कर दी। संजय ने उम्मीद से नारायणी को देखा-
''हम अपने निजी हित का विचार न भी करें लेकिन बच्चों के लिए सोचना चाहता हूं।ÓÓ
''इस घर में आपका स्वागत है।ÓÓ
''मुझे विदा होकर यहां आना पड़ेगा?ÓÓ
नारायणी अरसा बाद हंसी थी ''अपना घर है। फैक्टरी के फ्लैट में क्यों रहेंगे? वहां रोज बातें बनेंगी। बच्चों पर असर आएगा।ÓÓ
अदालती विवाह।
संजय सामाजिक मिसाल बनने का जोश और जज्बा लेकर मयार के साथ नारायणी के घर में स्थापित हुआ। उसके मेनीफेस्टो में त्याग, विनय, संकल्प, निष्ठा, समरसता जैसे आदर्श शब्दों की भरमार थी। नहीं सोचता था उसके संशय बढ़ते जाएंगे जबकि मयार अपनी मासूमियत में इस नवल नाते को सहज स्वीकार कर लेगा। मयार ने तुहिना के कबर्ड में अपने कपड़े ठूंस कर मानो घर को पंजीकृत कर लिया था-
''तुहिना हम दोनों क्लास मेट हैं। इस कमरे में पढ़ेंगे।ÓÓ
संजय ने संशोधन किया ''मयार अब तुम तुहिना के भाई हो।ÓÓ
तुहिना चकित ''अंकल, मैं इसे भाई बना सकती हूं?ÓÓ
''बिल्कुल। यह तुम्हारा भाई है और मैं तुम्हारा पापा।ÓÓ
नारायणी यही आश्वासन चाहती थी ''संजय जी, आप भी इसी सरलता से इस घर को अपनाएंगे जैसे मयार ने अपनाया है।ÓÓ
''नारायणी जी इस घर से मेरी पुरानी पहचान है।ÓÓ
नारायणी को लगा था दिनों बाद किसी ठौर पर पहुंची है। जमाने से लड़ लेगी। तुहिना को आतप-वर्षा से बचा लेगी। तुहिना और मयार के लिए वे उत्सव भरे दिन थे। मयार पूछता-
''मम्मी, स्कूल ले जाने के लिए क्या बना रही हो? पापा तो ब्रेड, जैम या नूडल्स टिफिन में भर देते थे।ÓÓ
''गोभी पराठा बना दूं?ÓÓ
''माय फेवरेट।ÓÓ
नारायणी, मयार को अपना रही थी।
संजय तुहिना को अपना रहा था।
मयार के साथ तुहिना का भी हेयर कट करा लाया था।
''नारायणी जी, तुहिना के बाल देखिये। आपको इसकी चोटियां बनाने में वक्त नहीं लगाना पड़ेगा।ÓÓ
नारायणी मोह से तुहिना को देखती रह गई ''आपने तो इसे स्मार्ट बना दिया। तुहिना तुम ब्यूटीफुल लग रही हो।ÓÓ
तुहिना को अपना लड़कों जैसा हेयर कट पसंद आया था-
''पापा, आप क्यूट हो।ÓÓ
नारायणी तुष्ट थी। रत्नाकर के उपद्रव से डरी हुई बच्ची बेफिक्र रहने लगी है। बोली-
''मयार और आपके साथ कितनी खुश है।ÓÓ
''मैं इसे हमेशा खुश रखूंगा।ÓÓ
संजय ने तब सचमुच नहीं सोचा था उसकी स्वस्थ वृत्ति में विकृति आ जाएगी। तुहिना की उपस्थिति, विपत्ति की तरह लगेगी। उसको लेकर प्रतिस्पद्र्धा जैसा भाव जागृत होगा जो तीक्ष्ण होकर नफरत बल्कि अस्वीकार तक पहुंचेगा।
वह तुहिना की प्रत्येक गतिविधि पर नजर रख रहा था। उसके व्यक्तिगत काम को देखकर हतप्रभ होता। अपना स्कूल बैग, कपड़े, जूते, खिलौने यथा स्थान रखती है। सुबह अलार्म की पहली ध्वनि पर उठ जाती है। मयार सुबह उठने, ब्रश करने, नहाने, दूध पीने में सुस्ती करता। निकट के बस स्टाप से स्कूल बस चली जाएगी जैसी चिंता लिए नारायणी जैसे-तैसे दोनों बच्चों को लेकर भागती। संजय खीझ जाता-
''मयार, तुहिना से सीखो।ÓÓ
तुहिना ताली बजाकर हंसती ''पापा, यह सुबह उठने में आलस करता है। कोई काम ठीक से नहीं करता। इसकी रैंक पीछे रहती है।ÓÓ
तुहिना टॉप फाइव में रहती है। मयार बीस-बाइस रैंक पर।
प्रतिस्पद्र्धा रैंक से शुरू हुई अथवा संजय का पुरुष अहं तुहिना को स्वीकार नहीं कर रहा था, कहा नहीं जा सकता। मयार का रैंक देख संजय को लगता मयार, तुहिना से पिछड़ रहा है। छ: माही परीक्षा में मयार के कम अंक देख संजय आक्षेप पर उतर आया-
''नारायणी जी मयार के नम्बर बहुत कम हैं। आप इसे उस तरह ध्यान देकर सख्ती से नहीं पढ़ातीं जिस तरह तुहिना को।ÓÓ
''दोनों को एक साथ एक तरह से पढ़ाती हूं। तुहिना कन्सनट्रेट करती है, मयार थोड़ी लापरवाही कर देता है।ÓÓ
संजय, मयार से संबोधित हुआ ''मयार, तुम अपनी जिम्मेदारी कब समझोगे?ÓÓ
''पापा, मयार को मत डांटो। मैं स्टडी में इसकी हेल्प करूंगी।ÓÓ
खुद को मयार की टीचर समझती है। संजय ने प्रतिक्रिया यह दी ''मयार मैं तुम्हें ठीक करूंगा। देखता हूं कैसे नहीं पढ़ते हो।ÓÓ
नारायणी बच्चों को दोपहर में पढ़ा देती थी। फैक्टरी से लौटकर संजय, मयार को दोबारा पढ़ाने लगता-
''मयार, बुक्स लाओ।ÓÓ
''पापा मैंने होम वर्क कर लिया।ÓÓ
''बुक्स लाओ।ÓÓ
मयार को स्कूल बैग खोलना पड़ता। तुहिना मदद करने के लिए उसके आसपास मंडराने लगती-
''मयार, गलत कर रहे हो। अरे बुद्धू इस सम को ऐसे साल्व नहीं करते। मैं बताती हूं।ÓÓ
संजय, तुहिना की हरकत पर बेरुखी दिखाता-
''जानता हूं पोजीशन होल्डर हो। जाओ यहां से। मयार ठीक से नहीं पढ़ोगे तो मैं तुम्हें बाथरूम में बंद करूंगा।ÓÓ
तुहिना न समझ पाती, मयार की मदद कर संजय को क्षुब्ध कर रही है ''सॉरी मयार। मेरे कारण तुम्हें डांट पड़ी। कहती हूं पढ़ाई में भेजा लगाओ, तुम नहीं लगाते।ÓÓ
''तुहिना, मयार की टीचर मत बनो। ये दोनों कप उठाओ और जाओ यहां से।ÓÓ
तुहिना, संजय और मयार के जूठे प्याले उठाकर रसोई में आ गई। संजय का तेज स्वर खाना बना रही नारायणी तक पहुंच रहा था। उसने सिंक में प्याले रख रही तुहिना के सिर पर हाथ फेरा-
''मयार को डिस्टर्ब मत करो।ÓÓ
''मम्मी यह पढ़ता क्यों नहीं? डांट खाता है।ÓÓ
''अपने और मयार के जूतों में पॉलिश कर लो। सुबह जल्दी रहती है।ÓÓ
''मम्मी, सनडे को हम लोग ट्रेड फेयर चलें? मेरी फे्रण्ड्स कहती हैं बच्चों की ट्रेन और बहुत तरह के झूले हैं।ÓÓ
''चलेंगे।ÓÓ
शनिवार को नारायणी स्कूल की कॉपियां जांचने के लिए ले आई। जांचने का काम इतवार को भी पूरा नहीं हुआ। उसने संजय के साथ बच्चों को व्यापार मेला भेज दिया-
''आप लोग वहीं कुछ खा लेंगे। मुझे कॉपियां जांचने में वक्त लगेगा।ÓÓ
तुहिना ने पूछा ''मम्मी, तुम्हारे लिए क्या लाऊं? क्या खाओगी?ÓÓ
''जो तुम खाओगी, ले आना।ÓÓ
व्यापार मेले में संजय ने तुहिना की पसंद और रुचि का ख्याल नहीं रखा। मयार ने जिस झूले में झूलने के लिए कहा टिकिट खरीद कर दोनों को उसमें बैठा दिया। तुहिना ने अपनी पसंद के झूले में झूलना चाहा। संजय ने अरुचि दिखा दी ''वह झूला खतरनाक है। मयार डरेगा, तुम भी।ÓÓ
मयार को महंगा ट्वाय रोबोट दिलाया तुहिना को सस्ती गुडिय़ा-
''लड़कियां, गुडिय़ों के साथ खेलती हैं और घर का काम काम सीखती हैं।ÓÓ
तुहिना, संजय की बेरुखी समझने लगी थी। हतोत्साहित हो गई। घर आकर नारायणी से कहा-
''पापा ने मुझे अपनी पसंद के झूले में नहीं झूलने दिया।ÓÓ
संजय ने दखल दिया। नारायणी के सम्मुख वह संतुलित व्यवहार बनाए रखता था-
''यह खतनाक चकरी झूले में झूलना चाहती थी। झूला इतना ऊपर तक जाता था कि मुझे देखकर चक्कर आ रहा था।ÓÓ
मयार ने बेवकूफी दिखा दी ''पर पापा आपने तुहिना को इसकी पसंद का ट्वाय भी नहीं दिलाया। तुहिना तुम मेरा रोबोट ले लो।ÓÓ
तुहिना ने प्रफुल्ल होकर रोबोट ले लिया ''मयार, अब मैं बिल्कुल गुस्सा नहीं हूं। हम दोनों मिलकर खेलेंगे।ÓÓ
संजय को शिद्दत से लगा तुहिना को सहन करना कठिन है। यह चतुर है, मयार बेवकूफ। मयार को चतुराई सिखानी पड़ेगी। कैसे सिखाए और कहां सिखाए? तुहिना मयार की ऐसी किलाबंदी किए रहती है कि मयार उसका पुत्र कम तुहिना का भाई अधिक लगता है। संजय ने मयार को साइकिल सिखाने का प्रलोभन दिया-
''चलो मयार, आज तुम्हें साइकिल सिखाऊं।ÓÓ
मयार ने खुश होकर जम्प किया ''तुहिना भी सीखना चाहती है।ÓÓ
''तुम सीख लो फिर उसे सिखा देना।ÓÓ
''गुड आइडिया। साइकिल सीखकर मैं उसे सरप्राइज दूंगा।ÓÓ
संजय, मयार को साइकिल नहीं चतुराई सिखा रहा था-
''मयार, तुहिना पोजीशन होल्डर है। तुम उससे पीछे रह जाते हो।ÓÓ
''हां पापा। मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?ÓÓ
''तुम समय खराब करते हो, वह पढऩे में लगी रहती है। चालाक है।ÓÓ
''तुहिना बिल्कुल चालाक नहीं है। मेरी कितनी केयर करती है। मेरे शूज में पॉलिश तक कर देती है।ÓÓ
''मैं कुछ समझा रहा हूं। तुम तुहिना के शागिर्द बन रहे हो।ÓÓ
''पापा आप तुहिना को टीज करने लगे हो।ÓÓ
मयार ने मासूमियत में बात को अलग रंग दे दिया।
''तुहिना कहती है?ÓÓ
''कहती है। मुझे भी लगता है। पापा वह अच्छी लड़की है। हम दोनों को अपने घर में रहने देती है।ÓÓ
मयार हद दर्जे का बेवकूफ है।
''यह तुहिना का नहीं तुम्हारा भी घर है। मेरा भी। यदि कहती है यह सिर्फ उसका घर है तो मुझे बताना।ÓÓ
''वह कहती है मयार तुम मेरे घर से कभी मत जाना। तुम रहते हो तो अच्छा लगता है।ÓÓ
''घर को मारो गोली। तुम्हें इस बार अच्छा रैंक लाना है।ÓÓ
''लाऊंगा पापा लेकिन आप तुहिना को नेगलेक्ट नहीं करेंगे।ÓÓ
शागिर्द को तुहिना की संगत से अलग रखना होगा।
रात को नारायणी शयन कक्ष में आई। संजय ने सीधे कह दिया-
''नारायणी जी, मयार और तुहिना बड़े हो रहे हैं। उनका एक कमरे में सोना ठीक नहीं है।ÓÓ
''तीसरा कमरा कहां है संजय जी?ÓÓ
''ड्राइंग रूम में दीवान है।ÓÓ
''मयार को लगेगा उसे दीवान में सुलाकर हम पक्षपात कर रहे हैं।ÓÓ
''तुहिना सो सकती है।ÓÓ
''कुछ व्यवस्था करती हूं।ÓÓ
नारायणी को आभास मिलने लगा था संजय, तुहिना को लेकर संशय में है। वह पूरी निष्ठा और ईमानदारी बरत रही है पर भिन्न स्थितियां शायद भिन्न ही रहती हैं। मयार और तुहिना सहोदर नहीं हैं जैसी बात शायद संजय के जेहन में है। नारायणी ने नहीं कहा तुहिना लड़की है। उसकी सुरक्षा के लिए हम लोगों को अधिक सतर्क रहना चाहिए। वह ऐसी कोई बात नहीं कहना चाहती जब मयार और तुहिना की निश्छलता को आघात पहुंचे या संजय को असंतोष हो। नारायणी ने करवट बदल ली।  संजय को नींद नहीं आ रही थी। इस घर में वह बहुत अच्छे पापा की तरह दाखिल हुआ था। विश्वास था तुहिना को अपनी संतान की तरह स्वीकार करेगा। कोशिश की, पर तुहिना सामने होती है तो पता नहीं क्या हो जाता है। बहुत बार सोचा इससे असुविधा क्यों होती है? इससे सामना ही कितना होता है। फैक्टरी के लिए सुबह आठ बजे निकलकर देर शाम लौटता है। लेकिन तुहिना इस घर में उसके जीवन में मौजूद है यह एहसास दबाव बनता जा रहा है। स्नायु खिंच जाते हैं। कनपटियों में सनसनाहट होने लगती है। तुहिना दखल की तरह लगने लगी है। तुहिना को सताने के मौके ढूंढने लगा है। नारायणी के विद्यालय की प्राचार्य अस्पताल में भर्ती थी। नारायणी अन्य शिक्षकों के साथ उन्हें देखने अस्पताल चली गई। संजय बच्चों को होमवर्क करने के लिए कह टी.वी. देखने लगा। प्यास लगी और दोनों की गतिविधि देखने आ गया। तुहिना एकाग्र होकर गृहकार्य कर रही थी। मयार खिड़की से बाहर ताक-झांक कर रहा था। संजय ने तुहिना को दखल दिया-
''तुहिना, पानी पिलाओ।ÓÓ
तुहिना एकाग्र थी ''मयार, पापा को पानी पिला दो। मैं यह आन्सर पूरा कर लूं।ÓÓ
संजय ने तेज आवाज में कहा ''तुहिना, मैंने तुमसे कहा है।ÓÓ
''पापा, वन मिनिट। मेरा कन्सनट्रेशन बिगड़ रहा है।ÓÓ
''मैं लाता हूं न।ÓÓ मयार रसोई में जाने लगा।
''मैंने तुहिना से कहा है।ÓÓ
''तुहिना को टीज करते हो।ÓÓ
तुहिना का शागिर्द हर बात में कहता है तुहिना को टीज करते हो।
''तुम्हें करता हूं।ÓÓ
पूरी तरह उच्छश्रृंखल होकर संजय ने मयार को पकड़ा और पीटने लगा। कोई भावना-दुर्भावना प्रबलतम हो जाए तो मनुष्य की फितरत में अतिरंजना आ जाती है। मयार स्तब्ध। संजय ने क्रूर होकर उसे कभी नहीं मारा था। तुहिना भावुक-सरल लड़की। मयार को संजय की पकड़ से खींचने लगी ''मयार को छोड़ो पापा। मुझे पता होता आप भी मेरे पापा की तरह गंदे हो, मैं आपको पापा नहीं बनाती। बस मयार को अपना भाई बना लेती।ÓÓ
ललकार रही थी छंटाक भर की लड़की।
तुहिना के आरोप ने संजय को वहशी बना दिया। मयार को छोड़ उसे मारने लगा। आज नहीं तो कभी नहीं। इस लड़की को बर्दाश्त करना नामुमकिन है।
''पापा, मुझे मारो। तुहिना को क्यों मारते हो?ÓÓ
मयार की आपत्ति ने संजय को विवेक शून्य कर दिया। उसकी पकड़ से किसी तरह छूटकर रोती-बिलखती तुहिना अपने कमरे में चले गई। मयार झपट कर उसके पीछे गया और कमरा भीतर से बोल्ट कर लिया। संजय हांफता खड़ा रहा फिर शयन कक्ष में आ गया। टी.वी. बंद कर बिस्तर में धसक कर हांफता रहा। ...नारायणी के लौटने पर चेत आया उसने क्या क्रूरता की है। नारायणी की आहट पाकर मयार और तुहिना कमरे से बाहर निकले। तुहिना, नारायणी से लिपट गई। कंठ में हिचकियां-
''मम्मी, पापा ने मुझे और मयार को बहुत मारा। उनको बोलो अपने घर वापस जाएं। यहां मैं, तुम और मयार रहेंगे।ÓÓ
मयार, अपराधी की तरह सिकुड़ा हुआ ''पापा ने बहुत मारा।ÓÓ
''बेटी, तुम्हें तो तेज बुखार है।ÓÓ
नारायणी का दिल भर आया। रत्नाकर, तुहिना को मारता था तब नारायणी बीच में आ जाती थी- मुझसे बात करो। बच्ची को क्यों मारते हो? आज चीख न सकी- संजय जी मुझसे बात करें। बच्ची को क्यों सताते हैं। शिद्दत से लगा वे कानूनी तौर पर पति-पत्नी बन गए हैं लेकिन भिन्न स्थिति भिन्न ही रहती है। खासकर तब, जब दूसरा पक्ष निष्ठा और ईमानदारी पेश न करे। विश्वास, अधिकार, उम्मीद जैसे भाव दृढ़ नहीं हो पाते। अस्वीकार, असुरक्षा, अनिश्चय, भंगुरता जैसा संशय बना रहता है। चीजें आसान हों इसलिए नारायणी ने सदा अनुनय बनाए रखी है। इस वक्त जानने की कोई कोशिश नहीं की संजय कहां है। बेड रूम में छिपा पड़ा होगा। मयार ने आग्रह किया-
''मम्मी, तुम हम दोनों को हॉस्टल भेज दो।ÓÓ
दस और ग्यारह की उम्र। आज हुए ध्वंस ने इन्हें इतना बड़ा बना दिया कि छात्रावास जैसे विकल्प का विचार कर लिया। नारायणी, बच्चों के साथ उनके कमरे में देर तक रही फिर खाना बनाने लगी। दोनों को थोड़ा-बहुत कुछ खिलाकर शयन कक्ष में आई। वातावरण की निरंतर टोह लेता संजय आंखों पर बांह रखकर लेटा हुआ था। नारायणी बिछावन के दूसरे छोर पर संजय से दूरी बना कर बैठ गई। संजय की रीढ़ में सिहरन। बड़ी बेवकूफी हो गई। नारायणी पता नहीं क्या उग्रता दिखाएगी। स्त्री बहुत कुछ सह लेती हैं, संतान का दर्द नहीं सह पाती। क्योंकि वह संतान से अत्यधिक प्रेम करती हैं। चुप्पी। संजय साहस खोज रहा था। नारायणी आमतौर पर जिस अनुनय से बोलती है, बोली-
''लगता है बच्चों ने आज आपको थका डाला है। मारपीट करना आपका स्वभाव नहीं है संजय जी...
संजय ने आंखें नहीं खोली। बरौनियां जरूर फडफ़ड़ाई।
''... कुछ डिसकस करना चाहती हूं। सामान्य स्थिति में तो सभी निभाते हैं, हमारी स्थिति कुछ अलग है। शायद आपको याद हो बच्चों को सुविधा और सुरक्षा देने के लिए हमने एक साथ रहने का उपाय किया है। मुझे लगता है तुहिना को आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। सच कहूं तो मयार के साथ सामंजस्य बनाने में मुझे भी दिक्कत हुई है। संतान और संतान जैसे में फासला है। मैंने देखा मयार मुझ पर भरोसा करता है तो मैंने उसके भरोसे को बनाए रखने की कोशिश शुरू कर दी। धीरे-धीरे मैं उसे स्नेह करने लगी। हमें ही नहीं नई स्थिति को अपनाने में बच्चों को भी दिक्कत हुई होगी। तुहिना मेरे साथ इसी रूम में सोती थी। अलग सोने को तैयार नहीं थी। मैंने उसे समझाया, तब मानी। अब तो मयार के साथ इतनी खुश रहती है,... और मुझे डर है अब तो माहौल बनने लगा है, बच्चों पर गलत असर आएगा...
संजय शर्मसार।
''... तुहिना बताती है,मयार ने भी बताया आप उसे टीज करते हैं। फर्क मैं भी समझ रही हूं। आपको देखकर खुश होने वाली बच्ची आपसे मतलब नहीं रखना चाहती पर मुझे उम्मीद थी एक दिन चीजें आसान हो जाएंगी।ÓÓ
संजय, शव की तरह निश्चेष्ट पड़ा है।
''... आज बच्चे किस यातना से गुजरे। कह रहे हैं उन्हें हॉस्टल भेज दिया जाए...
संजय के चेहरे पर स्याह-सफेद रंग।
''... हमें जो चीजें अच्छी लगती हैं उनके साथ वे चीजें भी स्वीकार करनी पड़ती है जो अच्छी नहीं लगतीं। ऐसा न कर हम दूसरों को तकलीफ देते हैं, खुद भी गहरी तकलीफ में रहते हैं। स्वीकार कर लो तो सामने वाले की ही नहीं हमारी भी तकलीफ कम हो जाती है...
संजय स्पीचलेस। शब्द ढंूढे नहीं मिल रहे हैं।
''... तुहिना को आप इतना मानते थे। अब यह छोटी सी बच्ची दिक्कत देने लगी? तुहिना के साथ आपको निभाना ही कितना है? शादी हो जाएगी। चली जाएगी। मयार के साथ मुझे जीवन भर निभाना है...ÓÓ
संजय विचलित। स्नायु ढीले पड़ रहे हैं।
''... तुहिना को लेकर कुछ अड़चन या असमंजस है तो हम अलग हो सकते हैं। आपका खाना मेज पर रख दिया है। तुहिना सदमे में है। तेज बुखार है बच्ची को। मैं उसके कमरे में सोऊंगी।ÓÓ
संजय पूरी तरह विमूढ़।
निस्संग सा पड़ा रहा। सोचना नहीं चाहता लेकिन नारायणी स्थिति का जो विश्लेषण कर गई, विचारों की आंधी चल पड़ी। सच है, इस घर में वह बहुत अच्छे पापा के रूप में दाखिल हुआ था। दूरदर्शी मेनीफेस्टो के साथ। आज लग रहा है मेनीफेस्टो में तुहिना के प्रति जवाबदेही नहीं थी। नारायणी की संगत और मयार को साफ-सुथरे, तौर-तरीके वाले घर की सुरक्षा और सुविधा दिलाने का ध्येय था। आज शायद नारायणी का धीरज और अनुनय खत्म हो गया है। विभाजन रेखा खींचना चाहती है बच्चों के साथ रहेगी। उसे इस घर में रहना है तो अपनी बेवकूफी और क्रूरता के साथ अकेला पड़ा रहे। शायद फैसला करना चाहती है तुहिना को संकट में डाल इस रिश्ते को नहीं ढो सकती। घर छोडऩा पड़ा तो उसी आलोचना और फुसफुसाहट से पुन: गुजरना पड़ेगा जिससे नारायणी से विवाह कर गुजर चुका है। इस घर से प्राप्त सुरक्षा, सुविधा मयार से छिन जाएगी। मयार ने साथ जाने से मना कर दिया तो करारी हार होगी। बलपूर्वक ले जाने पर चला जाएगा पर उसे माफ नहीं करेगा।.... संजय पूरी तरह बेचैन हो गया। इतना कि झटके से उठ बैठा। इच्छा हुई जोर से चीखे। नहीं चीखेगा तो दिमाग की नसें फट जाएंगी। लगा दीवारों से टकराता हुआ तेजी से घूमकर अपना सिर फोड़ ले। नहीं चीखा। जैसे कंठ में आवाज नहीं है। खड़ा नहीं हुआ। जैसे पैरों में रक्त संचार नहीं है। माहौल तजबीजने की कोशिश करने लगा। रात का आठ-तीस है लेकिन मध्य रात्रि की नीरवता का अनुमान होता है। कहीं से कोई आहट, आभास नहीं मिल रहा है। बैठा रहा विमूढ़ होकर। निस्संग। देर बाद चोरों की भांति दबी चाप से शयन कक्ष से बाहर आया। अपराधी की तरह तुहिना के कमरे में झांका। रात्रि बल्ब के मद्धिम प्रकाश में नारायणी के एक तरफ तुहिना सोई है, दूसरी तरफ मयार। आज घर जिस कहर से गुजरा है नारायणी चाहती तो मयार को शयन कक्ष में भेज सकती थी कि आज से अपने पापा के पास रहो। लेकिन यह तुहिना और मयार को समभाव से समीपता दे रही है। संजय ने तुहिना को देखा। इस घर में इसका वर्चस्व रहा होगा। बड़ी सरलता से घर को मयार और उसके साथ बांट लिया। इसकी चाल में खरगोश सी चपलता और तेजी होती थी। मंद पड़कर चाल क्षीण हो गई है। आघात से बुखार आ गया। मयार की कितनी केयर करती है। उसके जूतों में पॉलिश तक कर देती है। इच्छा हुई नारायणी के सम्मुख घुटनों पर बैठ कर विनम्रता से कहे- नारायणी जी आप ठीक कहती हैं। बात सिर्फ स्वीकार-अस्वीकार की है। अस्वीकार करो तो समस्या है। स्वीकार कर लो तो समाधान है। मयार को इस घर से अलग करने की कल्पना मुझे डराती है। मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जब मयार और तुहिना का, विश्वास जैसे शब्द से विश्वास उठ जाए। मुझे एक मौका दें। नहीं कह सका। कहने का यह सही वक्त नहीं है। नारायणी इसे त्वरित संवेदना समझेगी या दिखावा। मयार और तुहिना इस वक्त नारायणी की समीपता में खुद को पूरी तरह सुरक्षित पा रहे होंगे। अपनी उपस्थिति का एहसास करा इनसे इनकी समीपता, सुरक्षा,नींद, सुकून नहीं छीन सकता।
संजय दबी चाप से जिस तरह आया था उसी तरह शयन कक्ष में चला गया। रात लम्बी है लेकिन हर रात की सुबह होती है। सुबह पता नहीं कैसा मंजर होगा। कैसे इन तीन प्राणियों का सामना करेगा? संशय में हैं संजय जी।