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Tuesday 21 Nov 2017

नागार्जुन का कविकर्म

अजितकुमार
166 वैशाली, पीतमपुरा दिल्ली-110034
मो. 9811225605
कविता की असंख्य परिभाषाओं में से जिन दो के दायरे में बहुतेरी कविता को समेटा जा सकता है वे हैं- इमोशन रीकलेक्टेड इन ट्रैंक्विलिटी और स्पांटेनियस ओवरफ्लो आफ पावरफुल फीलिंग जिन्हें हिन्दी में इस तरह कहा जायेगा कि कविता शांत क्षणों में अनुभूति का पुनस्र्मरण है और कि वह उद्दाम भावना का अनायास उच्छलन है।
नागार्जुन के सिलसिले में, वैसे तो कविता से जुड़ी दोनों ही दृष्टियाँ सार्थक और प्रासंगिक दिखती हैं लेकिन उनके मुख्य स्वर को पहचानने की कोशिश की जाए तो तीन दिन तीन रात, यह दंतुरित मुस्कान, तालाब की मछलियाँ आदि तमाम कविताओं के आधार पर, वह उद्दाम भावना के अनायास उच्छलन के अधिक निकट मालूम होगी । तथापि बादल को घिरते देखा है, कालिदास सच-सच बतलाना, सिन्दूर तिलकित भाल जैसी अगणित कविताएं उन्होंने ऐसी रची हैं जो शांत क्षणों में अनुभूति के पुनस्र्मरण की श्रेणी में रखे जाने योग्य हैं ।
कुल मिलाकर नागार्जुन अपने समय की बहुविध हलचलों से जुड़े और उन पर तीखी, दो-टूक अभिधात्मक प्रतिक्रिया करने वाले कवि हैं, पर गाँव-घर-परिवार, प्रकृति की व्यापक छवि से गहरे जुड़ाव और घुमक्कड़ी के साथ-साथ समकालीन तथा प्राचीन साहित्य के प्रति अनुराग ने उनकी रचना के विभिन्न आयाम खोले हैं। उनके काव्य-शिल्प और छन्द-विधान में प्रचुर विविधता भले न हो, पर बोलचाल की सरल हिन्दी, मैथिली, बँगला और संस्कृत से घुले-मिले उनके भाषिक संस्कार का फैलाव काफ़ी विस्तृत है ।
यहाँ उनकी एक कविता की थोड़ी-सी चर्चा करने से पहले पूर्वोक्त दोनों प्रवृत्तियों के सूत्र जोडऩे वाली उनकी एक रचना का हवाला देना उपयुक्त होगा। 1947 में लिखित जनकवि शीर्षक छोटी सी कविता में उन्होंने लिखा था
मैं भी तो पहले देखा करता था सपने
साथी, अब तो रंग-ढंग ही बदल गए हैं
समझ गया हूँ
जीवन में इस धरा-धाम का क्या महत्व है
कैसे कहलाता कोई धरती का बेटा
आसमान में सतरंगी बादल पर चढ़कर
कैसे जनकवि धान रोपता
समझ गया हूँ
कैसे जनकवि जमींदार के उन अमलों को मार भगाता
हरे बाँस की हरी-हरी लाठी लेकर...
सब समझ गया हूँ !
सच तो यह है कि अकेले नागार्जुन ही क्यों, लगभग सभी कवि ऐसे दौरों से एक या अनेक बार गुजऱते हैं। वे सपने भी देखते हैं और धरा-धाम का महत्व भी समझते रहते हैं। इन दोनों के बीच अन्य कवियों की तरह नागार्जुन भी सहज-स्वाभाविक रिश्ता बनाते चलते हैं जो उन्हें यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ सहज रूप में संचरण करने की छूट देता है। तथापि स्पष्ट दिखता है कि  कालक्रम में नागार्जुन जनकवि वाली अपनी भूमिका से अधिकाधिक प्रतिबद्ध होते गए और अनुभूतिपरक रचनाओं की जगह जुझारू, संघर्षधर्मी रचनाओं में उनकी रुचि बढ़ती गई। यही उनकी जनकवि वाली प्रसिद्धि का मुख्य आधार बना किन्तु इसीके कारण उन पर तात्कालिकता का दबाव बढ़ा और वे काव्य-कौशल के प्रति उदासीन या असावधान भी होते गए।
उदाहरण के लिए उनकी प्रसिद्ध और बहुचर्चित कविता शासन की बंदूक को एक बार फिर पढ़ा जाय। यह पाँच संबद्ध दोहों से मिलकर बनी है। इसमें बंदूक और उससे आक्रान्त पक्ष आमने-सामने हैं। कविता का गद्यान्वय यहां दिया जाता है। पहले दोहे में, नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक कंकालों की हूक चांप कर खड़ी हो गई। दूसरे पद में, सभी उस हिटलरी गुमान पर थूक रहे हैं, जिसमें शासन की बन्दूक कानी हो गई । तीसरे पद में, वह शासन की बन्दूक धन्य, धन्य, धन्य है जिससे बधिरता दस गुनी बढ़ी और विनोबा मूक हो गए। चौथे पद में, शासन की बन्दूक जहाँ-तहाँ दगने लगी, जिससे स्वयं सत्य घायल हुआ और अहिंसा चूक गई। अंतिम पाँचवें दोहे में, कोकिला जली ठूँठ पर बैठकर  कूक गई ;कि शासन की बंदूक उसका बाल ;भी बाँका न कर सकी ।
स्पष्ट ही, यह कविता बन्दूक से भिडऩे में कंकालों की हूक, सार्वजनिक भत्र्सना, सत्य-अहिंसा, मौन आदि सबको बेबस बताती है। विनोबा-गाँधी तक बहरे-गूँगे दिखते हैं। केवल कोयल है जिसका बन्दूक बाल भी बाँका न कर सकी। लेकिन कवि का ध्यान इस ओर गया हो या न गया हो, तालियों की गूँज मिट चुकने के बाद कुछ को यह ज़रूर खटकता रहेगा कि विषम चुनौती से निबटने के लिए हमारे कवि ने अनवरत और सतत प्रतिरोध की नहीं, पलायन की राह सुझाई है । हरे-भरे पेड़ को जलाकर ठूँठ कर देने के बाद, उस पर आ बैठी कोयल को भी जब बन्दूक ने भून देना चाहा तो उसने फुर्र से उड़कर अपनी जान बचाई ।
सत्यमेव जयते का दम भरनेवाले देश के एक जुझारू कवि का संदेश पूरा तो तब समझा जाता जब  कविता का समापन कुछ इस तरह होता कि मार से दूर जा चुकी कोयल को तलाशती बंदूक पर घात लगाए गिद्धों-चीलों, छापामार दस्तों ने आकस्मिक हमला कर बन्दूक को कुछ उसी तरह खत्म कर दिया, जिस तरह उसने कहा था के जवानों ने दुश्मन का सफ़ाया किया था। लेकिन इसके लिए अपेक्षित धैर्य, सूझ या संयम बरतने की जगह, यदि नागार्जुन अविचारित वाहवाही से ही संतुष्ट हो गए तो यही इशारा किया जा सकता है कि गहरे अँधेरे को चीरकर सूरज की किरन फूट पडऩेवाले जिस सरलीकृत समाधान में हमारी बहुतेरी क्रान्तिधर्मी कविता भूलती-भटकती रही, उसका प्रतिवाद अँधेरे में का कवि पहले ही कर चुका था ।
मुक्तिबोध इसे समझ गए थे कि प्रबल शत्रु से निहत्थे और अकेले नहीं लड़ा जा सकता। समानधर्माओं से जुड़कर-मिलकर ही उसे प्रभावी चुनौती दी जा सकेगी। इस विचार से बेखबर तो नागार्जुन भी न होंगे। लेकिन शायद वीरता का यह पारंपरिक आदर्श उनको अधिक खरा मालूम हुआ होगा कि तुम दुश्मन को मार या उससे बच नहीं सकते तो सीना तान उसकी गोली का सामना करो.. या, वह उपयुक्त नहीं, तो किसी भावी प्रतिरोध की योजना बनाने के लिए भागकर अपनी जान बचाओ..वाहवाही के हक़दार तभी हो सकोगे ।
मुमकिन है, इस कविता का मेरा यह पाठ अशुद्ध, भ्रामक या  अपर्याप्त हो । तो, आशा है, नागार्जुन-साहित्य के अध्येता मेरे भ्रम का निराकरण करेंगे। वैसे, पाठ के सही होने पर भी, नागार्जुन जैसे समर्थ कवि का अध्ययन स्फुट रीति से नहीं समग्रता में ही किया जाना चाहिए । उनके संपूर्ण अवदान का उचित बोध और आकलन तभी हो सकेगा।