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Saturday 18 Nov 2017

कविता का लोकतंत्र

राहुल देव
 9-48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद ;अवध, सीतापुर, उप्र 261203
मो. 09454112975
डॉ.प्रभाकर माचवे कहते हैं कि कवि का मन किसी फार्मूले से नहीं चलता। कवि अंतर्मुखी होते हैं, बहिर्मुखी होते हैं, कोई भी विचार उनकी रचनाप्रक्रिया में दसियों प्रकार से छू सकता है। उसके पढऩे-सुनने में वह आये, उसके पारिवारिक संस्कारों में वह हो, उसके लिए किसी मित्र, कलत्र या किसी स्नेह भाजन ने त्याग किया हो। वह विचार उसके भीतर के उदात्त तत्व को झनझना दे, वह उसके भीतर की मानवीय करुणा को झकझोर दे, वह उसके सोये ज़मीर को जगा दे, वह उसके जीवन का अंग बन जाए, उस विचार को वह पचाकर व्यक्त करता है। इस बारे में कोई त्रैराशिक गणित नहीं दिया जा सकता। वहीं कवि की स्वतंत्रता के प्रश्न पर वह उसके अधिकारों को विस्तार देते हुए लिखते हैं- कवि जिस त्रासदी को अनुभव करता है उसे व्यंग्य से, सपाटबयानी से, वक्रोक्ति से, व्यासोक्ति से जैसे वह चाहे व्यक्त करे, उसे पूरी स्वतंत्रता और अधिकार है।
लेकिन आज कवि की स्वतंत्रता और अधिकारों की बात करना मानो कोई अघोषित गुनाह है। आज कविता में विविध स्तरों पर कई सारे मतभेद दिखाई देते हैं। समग्रता की बात करने वाले कम ही लोग मिलेंगे। कोई छन्दबद्ध, छन्दमुक्त को लेकर परेशान है, कोई विचारधारा को लेकर परेशान है तो कोई विचार और भाव को लेकर घमासान मचाए हुए हैं। कविता को मानो पत्थर की मूरत बनाकर बस अंधश्रद्धा में पागल हुए जाते हैं। संतुलन और समग्रता की बात करो तो कहेंगे जनाब बीच का रास्ता नहीं होता, या तो इधर आ जाइये या उधर चले जाइये। खेमेबाजी बुरी तरह से हावी है साहित्यकारों के मध्य। सच्ची रचनाशीलता वाला व्यक्ति इन सारे वितंडों से चार कदम दूर ही रहता है। मूर्खों से बहस करने में अपनी रचनात्मक शक्ति न गंवाकर वह मौन होकर चुपचाप अपना रास्ता लेता है।
साहित्यशास्त्रियों ने काव्य रचना हेतु तीन हेतु माने हैं- प्रतिभा, निपुणता और अभ्यास। प्रतिभा को लगभग सभी आचार्यों ने अनिवार्य महत्त्व दिया है। ऐसे व्यक्ति को जिसमें प्रतिभा नहीं है, काव्य-रचना सिखाई नहीं जा सकती फिर भी कुछ लोग कविता को सीखने-सिखाने की चीज़ बताते हैं। दरअसल कविता सिखाने की चीज़ है ही नहीं, एक कविता ही ऐसी कला है जिसे कोई किसी को सिखा नहीं सकता। कविता बड़ी मौलिक चीज़ है यह सलीका स्वयमेव आता है। प्रत्येक कवि की कविताई अपने आप में विशिष्ट होती है, कविता कवि की अनुपम रचना का नाम है और रच वही सकता है जिसमें प्रतिभा होती है जिसमें जीवन होता है। इसीलिए कहते हैं कि प्रेमी, पागल और कवि एक जैसे होते हैं, अगर वे नकली नहीं होते तो पथान्वेषी होते हैं। अगर इसे सीखा-सिखाया जा सकता तो इसके भी स्कूल, कालेज या ट्रेनिंग सेण्टर बन गये होते। कविता कवि मानस में सृजित होती है अत: वह वही होती है जो कवि स्वयं होता है। वड्र्सवर्थ ने कविता को प्रबल भावों का सहज उच्छलन है, poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings, कहकर उसकी अनायासता और सहज स्फूर्त रूप का प्रतिपादन किया है।
सबसे पहली बात कविता में सरलता और क्लिष्टता के प्रश्न पर। मेरे विचार से किसी भी रचना में सरल शब्द अपेक्षाकृत ज्यादा सम्प्रेषणीय होते हैं जबकि क्लिष्ट शब्दों से सजी रचना बौद्धिक वर्ग विशेष तक सिमट कर रह जाती है, सरल शब्द क्लिष्ट शब्दों की अपेक्षा जनमानस में आसानी से व्यापित भी हो जाते हैं। यह जरूरी नहीं कि रचना में क्लिष्ट शब्द ही गहन अर्थ रखते हों, सरल शब्द भी गहन अर्थ रख सकते हैं। यहाँ पर यह भी ध्यान रहे कि चलताऊ और छिछले शब्द तथा सरल शब्द दोनों में पर्याप्त फर्क होता है। मेरे ख्याल से सरल शब्द वह होता है जो अर्थ में अधिकांश पाठकों तक अपनी पहुंच रखता है तथा पाठकों, श्रोताओं को कोई विशेष बौद्धिक प्रयास नहीं करना पड़ता। उदाहरण के तौर पर आप केशवदास और तुलसीदास को ले सकते हैं। मुझे भी सरल और सहज कविताएं ज्यादा आकर्षित करती हैं बजाये कि कठिन, शब्दाडम्बरी या बनावटी टाइप की कविताओं के। खैर यहां पर मुझे यह भी लगता है कि साहित्यकारों को किसी भी विधा में सरल या कठिन के चक्कर में न पड़कर अपनी रचना में आने वाले स्वाभाविक शब्दों को अपनाना चाहिए और मुझे नहीं लगता कि इस स्वाभाविकता को निर्धारित किया जा सकता है। अगर सभी कवि-लेखक एक जैसा लिखने लगे तो उनमें विशिष्टता क्या रह जाएगी। यदि किसी की रचना हमें सरल या क्लिष्ट लगती है तो यह पढऩे वाले की समस्या है न कि लिखने वाले की, कारण लिखने वाले ने तो उसे अपने मानसिक स्तर व ज्ञान के अनुरूप अपनी स्वाभाविक भाषा में ही लिखा होगा। हाँ छिटपुट लोग ऐसे भी पाए जाते हैं जो अपनी विद्वता झाडऩे के लिए जानबूझकर क्लिष्टता का कृत्रिम मायाजाल रचते हैं । एक सर्वज्ञात तथ्य यह भी है कि कोई भी रचना प्रत्येक व्यक्ति को संतुष्ट नहीं कर सकती।
फेसबुक आदि पर कुछ लोगों को मैं देखता हूं कि बहुत जल्दी में रहते हैं। रचनाओं की लाइन लगा देते हैं बगैर किसी एक रचना पर केन्द्रित होकर, उसपे मेहनत किये बगैर फलस्वरूप रचना में वह दम नहीं आने पाता जो आ सकता था। सोशल मीडिया पर अच्छी रचनाएं पोस्ट करने से मेरा आशय यह भी है कि कविगण कच्ची रचनाएं न पोस्ट करें, आप अपनी तरफ से रचना को कई बार देख लें और आवश्यक परिवर्धन कर लें, यह भी ध्यान रहे कि वह जिस विधा के । अंतर्गत लिखी गयी है उसके अनुसार ही हो, उसमें भाषा या वर्तनी की त्रुटियाँ न हों। जब आप खुद आश्वस्त हो जाएँ कि हाँ अब आपकी रचना अच्छी हो गयी है फिर पोस्ट करेंगे तो पाठक निश्चित रूप से उसे पढऩे के लिए विवश होगा। उसके बाद भी कुछ कमी रह जाती है तो उसके लिए विद्वतजन आपको स्वयं अपने कमेंट्स से अवगत कराएंगे। हमें समझना होगा कि यह एक प्रक्रिया है।
कविता में क्या सही है और क्या गलत है तो मेरे खयाल से कविता में क्या सही, क्या गलत का निर्धारण सिफऱ् और सिफऱ् उसके पाठकों के हाथ में होता है। यह सच है कि इसके बीच में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका आलोचक की भी होती है। लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा पाठक के हाथ में होता है। कहते हैं- जिसमें सबका हित सन्निहित वही साहित्य अत: कविता भी जब तक प्रकाशित नहीं होती तब तक वह कवि की निजी सम्पत्ति रहती है। एक बार प्रकाशन हो जाने पर वह सार्वजनिक सम्पत्ति बन जाती है। अमुक अच्छा लिख रहा है या बुरा इसका निर्धारण पाठक-श्रोताओं के साथ-साथ समय भी तय करता है। उच्चस्तरीय और अच्छा लेखन कभी भी अल्पकालिक व सामयिक नहीं होता, वह कालजयी होता है। आप उसे कभी भी उठाकर पढ़ लीजिए, हर देशकाल में उसकी प्रासंगिकता बनी रहती है। समय के साथ-साथ गलत लेखन पीछे छूट जाता है और सही लेखन उसे वहीं छोड़कर दो कदम आगे बढ़ जाता है।
अब बात कविता के अगले प्रश्न यानि छन्दबद्धता और छन्दमुक्तता को लेकर। वास्तव में कविता कविता होती है चाहे वह छन्दबद्ध हो या छन्दमुक्त। यहां पर हमारा छन्दबद्ध या छन्दमुक्त कविता को लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं है लेकिन परिवर्तन संसार का नियम है। नयी कविता का उद्देश्य क्या था? प्रयोगवाद के बाद हिंदी कविता की नयी धारा को नयी कविता कहा गया। नयी कविता सामाजिक यथार्थ तथा उसमें व्यक्ति की भूमिका को परखने का प्रयास करती है। जिन छन्दों की बात छन्दबद्ध काव्य के समर्थक कर रहे हैं वह बदलते समय के साथ कदमताल नहीं कर पा रहे थे। कविता सिर्फ  मनोरंजन या रसास्वादन का माध्यम भर नहीं होती। भाव संग विचारों का संतुलन एक अच्छी कविता का आधार होते हैं। सिर्फ आदर्श या कल्पना से कविता गतिमान नहीं होती। यथार्थ और सरोकार भी उसका अभिन्न अंग हैं। अगर सिर्फ  उपरोक्त छन्दों से काम चल सकता तो नई कविता का आविर्भाव ही नहीं हुआ होता। अगर गीत में ही सब कुछ कहा जा सकता तो नवगीत क्यूं आता। इसलिए हमें समझना होगा कि हर विधा का अपने समय में अपनी जगह पर अपना महत्त्व होता है।
आज बनावटीपन और बाजारू अपसंस्कृति हर तरफ  से हमारे जीवन में हावी होकर प्रवेश कर चुकी है। मानवीय संवेदनाएं मर रही हैं। नैतिक मूल्यों का दिनोंदिन ह्रास हो रहा है। हमारी भाषा, सभ्यता और संस्कृति के लिए ये सब ज्वलंत प्रश्न हैं। जनतंत्र में राजनीति हर चीज़ का नियामक होती है। प्रेमचंद ने कहा था साहित्य राजनीति को आगे-आगे राह दिखाने वाली मशाल है। इस नाते भी साहित्यकार की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि वह अपने लेखन के माध्यम से इन तमाम सामाजिक विसंगतियों पर भरसक प्रहार करे, झूठ को झूठ और सच को सच कहने का साहस करे। कविता कर्म आज भी जीवन की साधना है, इस कठिन समय में मुझे मात्र रसरंजन करने वाली या आत्मपरक भावों वाली साधारण प्रेमकविताएंं उतना आकर्षित नहीं कर पातीं। हालाँकि कई बार मैंने देखा है कि क्रांतिकारी कविता लिखने के चक्कर में ओवरकॉंफिडेंट घोर प्रगतिशील कविगण यह जान ही नहीं पाते कि उन्होंने कितनी भद्दी, अश्लील और वीभत्स कविता लिख डाली है। साहित्य सृजन एक सतत चलने वाली लम्बी प्रक्रिया है। हमें बड़ा सतर्क और सचेत रहकर रचना करनी चाहिए। अगर लोग आपकी कविता पर कोई कमेंट या सुझाव देते हैं तो उस पर भी गौर किये जाने की जरूरत है भले ही उसे आप माने या न मानें। साहित्यकार जब अपनी रचना में अपने अर्जित अनुभवों के माध्यम से सामाजिक तादात्म्य स्थापित कर लेता है तब जाकर कोई श्रेष्ठ कृति हमारे सामने आती है। दरअसल यह समय ही ऐसा है, ऐसी विकट परिस्थिति में भी अगर साहित्यकार की आत्मा उसे नहीं झकझोरती तो यह किसी भी देश के साहित्य के लिए चिंता का विषय है।
कविता के पाठ और पाठांतर का अंतर- इस विषय पर भी कई तर्क दिए जा सकते हैं क्योंकि प्रत्येक आलोचक बने बनाये प्रतिमानों के खांचे के अन्दर बैठकर आलोचना नहीं करता उसके कुछ अपने वैचारिक प्रतिमान हो सकते हैं। रचना को खोलते हुए उसका रचनात्मक व्यक्तित्व रचनाकार के रचनात्मक व्यक्तित्व से मिलता है। चूँकि आलोचक भी सर्वप्रथम एक पाठक ही होता है अत: इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि रचना पर भिन्न-भिन्न आलोचकों की भिन्न-भिन्न राय हमें देखने को मिले। वे सभी राय चाहे जैसी भी हों लेकिन समग्रता में वे रचना की कसौटी बनाती हैं और एक रचना के पक्ष या प्रतिपक्ष को निर्धारित करती हैं। कविता की विभिन्न पाठ प्रविधियों के दौरान अन्य कवियों के साथ तुलनात्मक विवेचना किये जाने का मैं विरोधी हूं। लोग यह क्यों नहीं समझते कि नागार्जुन निराला नहीं हो सकते, अज्ञेय शमशेर नहीं हो सकते, मुक्तिबोध त्रिलोचन नहीं हो सकते और निराला प्रसाद नहीं हो सकते, नरेश सक्सेना केदारनाथ सिंह नहीं हो सकते, जैसे कि कहा जाता है कि हर एक बच्चा विशेष होता है ठीक उसी तरह हरेक कवि की कविता अपने आप में विशिष्ट होती है।
नए कवियों का हमेशा स्वागत किया जाना चाहिए। कोंपलों को देखकर संभावनाओं का आकलन सहज ही किया जा सकता है। नए कवियों को भी थोड़ा सावधान रहकर कुंठित और ईष्र्यालु साहित्यकारों के साथ और उनकी सलाहों से बचते हुए अपना रचनाकर्म करते जाने की आवश्यकता है। हालाँकि कई बार नयेपन की आड़ में कुछ लोग कविता के साथ खेलते भी नजऱ आ जाते हैं लेकिन इसमें कोई ख़ास चिंता की बात नहीं है क्योंकि कविता के साथ यह व्यवहार बहुत समय पहले से होता चला आ रहा है। समय के साथ-साथ ऐसे लोग स्वयमेव परिदृश्य से ऐसे अदृश्य हो जाते हैं जैसे जलने के बाद कपूर। विनयशीलता एक अच्छे और सच्चे कवि का मूलभूत गुण है। मैं कई बार ऐसे तथाकथित कवियों से मिला जो अपने ज्ञान के अपूर्व घमंड में चूर थे। बस जो कुछ हूँ सब मैं ही मैं हूँ। ऐसे लोगों से यथासंभव बचना चाहिए क्योंकि जिस दिशा में भटक रहे होते हैं उस पर अंतत: कुछ भी शेष नहीं रहता। साहित्य जगत में कुछेक वरिष्ठ कवियों का दंभपूर्ण व्यवहार भी देखने को मिलता है। अगर कोई उनकी कविताओं की प्रशंसा करता हुआ उनसे मिले तो वे बहुत खुश होते हैं लेकिन अगर कोई उनके रचनाकर्म पर कोई भी निगेटिव टिप्पणी कर दे तो फ़ौरन उनका कोपभाजन बन जाता है। इसी कारण से कई बार युवा आलोचक सीमाओं में बंधकर आलोचना करने पर मजबूर हो जाते हैं क्योंकि वे स्वयं स्थापित होने की प्रक्रिया में होते हैं ऐसी स्थिति में वे वरिष्ठ जनों से अपने व्यक्तिगत संबंधों को बिगाडऩा नहीं चाहते। इसीलिए आज कविता की आलोचना में भी सुलझी हुई दृष्टि और विवेक का अभाव दिखता है।
कविता कुछ लोगों के लिए पार्टटाइम जॉब की तरह है ऐसे लोग शौकिया कवि बने हुए हैं। कुछ लोग जिनके अन्दर कविता की आग ही नहीं है। ऐसे तथाकथित कवियों की विचारधारा संकेंद्रित नहीं है। कविताओं में साहित्यिक अंतर्दृष्टि का नितांत अभाव परिलक्षित होता है। जीवन में कष्ट कभी सहे नहीं, आत्मसंघर्ष की अनुपस्थिति। फिर कविता में दम कहां से आ पायेगा। इसीलिए आज वर्तमान कविता की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है। कारण एसी कमरों में बैठकर पसीने और आह की कविताएं लिखी जा रही हैं। एक कवि के जीवनानुभवों को जिये बिना सच्ची कविता नहीं उपजती। प्रतिबद्धता है नहीं। बस तुरत-फुरत प्रसिद्धी और पुरस्कार मिल जाएं, यही जीवन का लक्ष्य है। साहित्यिक कंसेप्ट क्लियर नहीं। आधा दर्जन कविता संग्रह छप चुके हैं। जहां बोलना चाहिए वहां तटस्थता की चादर ओढ़कर चुप हो जाते हैं। प्रतिरोध की बात करिए तो सुरक्षित रास्ता तलाशने लगते हैं। संवेदना है नहीं, लय गायब है। जीवन कुछ है, कविता कुछ है। दोनों में कोई तालमेल नहीं। इधर-उधर से लीप-पोतकर कृत्रिम भाषा के सहारे टेढ़े-मेढ़े शिल्प में जैसे-तैसे कविता की इमारत खड़ी करते हैं। वे यह नहीं समझते कि बगैर नींव के यह इमारत कब तक खड़ी रहेगी, इसे तो एक न एक दिन भरभराकर गिरना ही है। फिर कहेंगें कविता के पाठक कम हैं आप बताइए ऐसी दशा में बेचारा पाठक आपकी महानतम कविता ; जिसका वहम सिर्फ  आपको है, से कैसे जुड़ेगा?
कविता: सामाजिक दायित्व के निर्वहन का साधन या आत्मसंतुष्टि का साधन या फिर दोनों ही? इस प्रश्न पर मैं सिर्फ दो उदाहरण दूंगा- वास्तव में कविता लिखना एक विशिष्ट सामाजिक कार्य है। केदारनाथ अग्रवाल अपनी एक पुस्तक में कहते हैं कि, कवि-लेखकों का सामाजिक दायित्व व्यक्ति की मानसिकता को बदलकर एक नयी जीवनदृष्टि की मानसिकता प्रदान करना है। कवि वास्तविकता और यथार्थ से दूसरे नागरिकों की तरह जीवन जीने के लिए संघर्ष और द्वन्द्व करने के बाद अपनी वह मानसिकता बनाता है जो अन्य नागरिक नहीं बना पाते, हाँ परन्तु कवि की कविताएं पढ़कर शायद वे इसमें समर्थ हो सकते हैं। हाँ इसमें तात्कालिकता की अपेक्षा करना गलत होगा। कविता तो जीवन को प्रेरणा देती है कि कर्म करो, संसार को सुन्दर बनाओ, विरूपताओं को मिटाओ, समता से जीवनयापन करो। कविता शांति व सहअस्तित्व के सिद्धांत से मानवता का सृजन करती है। वहींकवि अशोक बाजपेयी कहते हैं-कविता का काम है आत्मपरकता के एहसास को सामुदायिकता के बोध से जोडऩा। एक सच्चे कवि की रचनाप्रक्रिया में इस विकासक्रम को सहज ही लक्षित किया जा सकता है।
तो कुल मिलाकर यही सब कुछ बातें हैं जिन पर हमें गहन चिंतन किये जाने की आवश्यकता है ताकि हम कविता के भविष्य को उत्तरोत्तर बेहतरी की तरफ  ले जा सकें।