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Sunday 19 Nov 2017

लोक संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को संस्पर्शित करता हुआ उत्सव अंक नसीब हुआ। प्रस्तावना में तकरीबन वे सारे मुद्दे उठाए गए हैं,

लोक संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को संस्पर्शित करता हुआ उत्सव अंक नसीब हुआ। प्रस्तावना में तकरीबन वे सारे मुद्दे उठाए गए हैं, जिनसे हमारी लोक संस्कृति को आघात पहुंच रहा है। इस अंक से विभिन्न अंचलों की लोक अस्मिता की जानकारी तो मिलती ही है, हमारी सामासिक संस्कृति भी गुणात्मक होती है। रामनाथ शिवेन्द्र ने अपने पत्र में आत्मकथा लेखन को आत्ममुग्धता का लेखन, बिल्कुल सही कहा है। आत्मकथा आज अपने को महिमामंडित करने का माध्यम बन कर रह गई है। उपसंहार में सर्वमित्रा सुरजन ने पद्मा सचदेव से उनकी जिंदगी के अनछुए पहलुओं को अपनी प्राश्निक परिधि में कहलवा लेने का उपक्रम किया है। कविताएं पद्मा की तरह लिखनी चाहिए, रामधारी सिंह दिनकर की यह टिप्पणी एक सदाशयी वरिष्ठ कवि की टिप्पणी है। विवेकपूर्ण सोच तो पद्माजी की है, जो उन्होंने कहा कि मैं उस तारीफ को अपना भाग्य तो मानती थी, लेकिन यह भी सोचती थी कि यह बच्चे को झुनझुना पकड़ाने की तरह है।
डा. मधुर नज्मी
गोहना मुहम्दाबाद, जिला मऊ 276403, उप्र
मो.9369973494