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Monday 20 Nov 2017

अक्टूबर का अक्षर पर्व बेहद आकर्षक है। रचना व छपाई दोनों दृष्टिकोण से। लेख, संस्मरण,ग़ज़लों पर बेबाक विवेचन सब मन को मोह लेते हैं।

अक्टूबर का अक्षर पर्व बेहद आकर्षक है। रचना व छपाई दोनों दृष्टिकोण से। लेख, संस्मरण,ग़ज़लों पर बेबाक विवेचन सब मन को मोह लेते हैं। इतनी अच्छी पत्रिका इस माने में छापने के लिए दिल-गुर्दे की बात है जबकि पत्रिकाएं धड़ाधड़ बंद होती जा रही हैं।   दिसम्बर अंक में कृश्नचंदर, नेहरूजी व रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर लिखे लेख धरोहर जैसे हैं। कृश्नचंदर की याद ताजा हो जाती है। जब मैं बांद्रा में रहता था, वे हुस्नाबाद लेन सांताक्रूज़ में रहते थे। मैं रचना पोस्ट करने के लिए न्यू टाकीज के पास बांद्रा पश्चिम डाक घर जाया करता था। संयोग से उनके आने और मेरे जाने का समय एक ही होता था। एक दिन मैंने देखा, एक आदमी कृश्नचंदर जी से बेहद खफा होकर कहने लगा कि आप ने जो कहानी लिखी है, वाहियात कहानी है। कृश्नचंदर जी ने धैर्यपूर्वक उसकी बातें सुनींऔर कहा, आइंदा मैं अच्छी कहानी लिखूंगा।
रतिलाल शाहीन, द्वारा- देवेश राजपूत,805/15, नम्रता टॉवर, लिंक रोड, शास्त्रीनगर, गोरेगांव पश्चिम, मुंबई-400104