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Tuesday 21 Nov 2017

उत्सव अंक के रूप में अक्षर पर्व का विशेषांक पाकर कृतार्थ हुआ।

 

उत्सव अंक के रूप में अक्षर पर्व का विशेषांक पाकर कृतार्थ हुआ। भारत ही विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जहां विविधता में एकता के दर्शन होते हैं। लोक संस्कृतियों और लोक साहित्यों का ऐसा सुभग समन्वय भू-पृष्ठ पर अन्यत्र दुर्लभ है। आपने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों पर विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा लिखे गए आलेखों को संचित, संकलित, संपादित व प्रकाशित करके अक्षर पर्व की कीर्ति में चार चांद लगा दिए हैं। यकीनन आपने इस श्रम साध्य भगीरथ कार्य को ग्रंथस्थ रूप में प्रकाशित करके लोक संस्कृति एवं लोक साहित्य विषय शोध करने वाले अनुसंधित्सुओं का मार्ग सरल व प्रशस्त कर दिया है।
लेखों में उद्धृत आंचलिक लोकभाषाओं की गीत-पंक्तियां और क्वचित् चित्र भी आह्लादक है। 'प्रस्तावनाÓ के रूप में पुनप्र्रकाशित आपके आलेख में आपने जिस दु:खद हकीकत का जिक्र (एक विश्वविद्यालय के संदर्भ में) किया है। यह विडंबना आज की बाजारवादी,भौतिकवादी संस्कृति (या कि अपसंस्कृति?) देश में अनेकत्र लक्षित हो रही है। 'उपसंहारÓ के स्थान पर इस बार लोकगीतों के विषय में लब्धप्रतिष्ठ कवयित्री  पद्मा सचदेव से हुए वार्तालाप के अंश बड़े ही दिलचस्प है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रस्तुत 'उत्सव अंकÓ अक्षर पर्व के अनेक पूर्ववर्ती विशेषांकों की श्रृंखला में एक हसीन इजाफा है। सर्वथा संग्रहणीय भी।
प्रो. भगवानदास जैन, अहमदाबाद-382445