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Thursday 23 Nov 2017

अक्षर पर्वÓ दिसम्बर-2014 पढ़ा। बद्रीनारायण की पुस्तक \'कांशीराम : लीडर ऑफ द दलित्सÓ पर ललित सुरजन की गंभीर और पारदर्शी टिप्पणी, उक्त किताब को पढऩे के लिए प्रेरित करती है।

 

अक्षर पर्वÓ दिसम्बर-2014 पढ़ा। बद्रीनारायण की पुस्तक 'कांशीराम : लीडर ऑफ द दलित्सÓ पर ललित सुरजन की गंभीर और पारदर्शी टिप्पणी, उक्त किताब को पढऩे के लिए प्रेरित करती है। यूं ललित जी गंभीर पाठक है, यह जानकारी अपने वरीय कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल से मिली है।  इला कुमार की रचना 'कठघडिय़ाÓ में स्त्री छवि  बड़ी गहराई और तल्लीनता से संवेदित की गई है। आज के समय में भी यशुनीरा जैसा चरित्र लुभाता है। संकल्प को नई ताकत देता है। कहानी 'एक्सीडेंटÓ के मनोविज्ञान को पाठक नये आयाम में महसूस करते हैं। और वहीं 'थैंक्स! अंकलÓ स्त्री के साहसी होने और अपने हक में एक खास निर्णायक अस्तित्व को स्थापित करती है। रूसी कहानी 'नींदÓ भी अच्छी लगी। मणिमोहन, अरविन्द मिश्र की कविता बहुत अच्छी लगी। खासकर 'जश्नÓ कविता।  रामनाथ शिवेन्द्र का आलेख भी सामयिक दृष्टि के साथ गंभीर विमर्श है। आखिर, बाजारवाद का प्रदूषण/अपसंस्कृति की सीमा, संवेदनात्मक (मानवीय) स्तर पर कब तय होगी। इस दिशा में 'स्त्री अधिकारÓ, 'स्त्री अधिकार हनन की निरंतरताÓ का संकट भी हमें आज भी विचलित करती है।  'हिन्दी की पहली कहानी पर कुछ विचारÓ भी पढ़ा। लेकिन ऐतिहासिक विकास क्रम की दृष्टि से पहली महत्वपूर्ण कथा-रचना मुंशी इंशा अल्ला खां कृत 'रानी केतकी की कहानीÓ है। यह कहानी 1808 ई. के आसपास प्रकाशित हुई थी।
अरुण अभिषेक
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