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Friday 24 Nov 2017

एक लेखक की मौत

सर्वमित्रा सुरजन
निया में इस वक्त अभिव्यक्ति की आजादी पर नये तरह की एकजुटता दिख रही है। फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली एब्दो पर हमले के बाद यह विमर्श तेज हो गया कि किसी के डर के आगे अपने विचार प्रकट न करना, कलम को विराम देना सही नहींहोगा। शो मस्ट गो आन की तर्ज पर हमले के अगले हफ्ते ही पत्रिका का अगला अंक निकला और उसके मुखपृष्ठ पर फिर पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून छपा। उसमें उनकी आंखों से आंसू निकल रहे हैं और वे कह रहे हैं मैं भी शार्ली हूं। शार्ली एब्दो के संपादक व उनके सहयोगियों के जज्बे की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है, भारत में भी। लेकिन इस वक्त भारत में अभिव्यक्ति की इस आजादी की जैसी धज्जियां उड़ रही हैं, उसका संज्ञान बहुत कम लिया जा रहा है। यूं तो संविधानप्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार का भरपूर उपयोग करते हुए इन दिनों कई किस्म की अनर्गल टिप्पणियां सामने आ रही हैं, जिनसे व्यापक हित नहीं, व्यापक स्वार्थ जुड़े हैं। ऐसी टिप्पणियों को टीवी चैनलों पर भरपूर कवरेज दिया जा रहा है, उन पर अतार्किक और बेनतीजा बहसें हो रही हैं। विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता के इस शोर-शराबे में एक लेखक फेसबुक वाल पर अपने लेखन को हमेशा के लिए विराम देते हुए अपनी मौत की घोषणा करता है। प्रकाशकों से आग्रह करता है उसकी किताबें न छापें और पाठकों से उसका आग्रह है कि जिनके पास उसकी किताबें हैं, वे उसे जला दें। उसके ऐसा करने के पीछे किसी का डर नहींहै, बल्कि हताशा है, कुंठा है, कि वह ऐसे समाज का नागरिक है जहां विरोधी, विवादास्पद विचारों के लिए कोई स्थान नहींहै। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था- हिंसा की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि न्याय की उपस्थिति को शांति कहा जा सकता है। तमिल लेखक पेरूमल मुरुगन ने उन्हींके उद्धरण को लेते हुए कहा कि- नमक्कल में शांति है, लेकिन न्याय नहीं। गौरतलब है कि तमिलनाडु के नमक्कल जिले का जिक्र मुरुगन के एक उपन्यास माथोरुभगन में आया है। इसमें एक बेऔलाद दंपती काली और पोन्ना की कहानी है। जिसमें संतानप्राप्ति के लिए पोन्ना को मंदिर की पूजा में शामिल करवाया जाता है, जहां किसी अजनबी से संबंध होने के बाद वह गर्भवती होती है। इस चित्रण पर यहां के गुंडर समुदाय को आपत्ति थी। उन्होंने इसे अपना अपमान माना। पिछले साल इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद सामने आया, जिसके बाद से इसका विरोध हो रहा है। श्री मुरुगन विगत 17 बरसों से तमिलभाषा के प्रोफेसर हैं। तमिल की महान रचनाओं के साथ-साथ कोंगू लोककथाओं पर उनका काफी अध्ययन है। कई मंदिरों वाले शहर तिरूचेन्गोदू पर इंडिया फाउंडेशन आफ आटर््स, बैंगलोर की ओर से उन्होंने शोध कार्य भी किया। यहां की पहाडिय़ों में कई मूर्तियां हैं, हरेक की अपनी कहानी। इन्हींमें से एक है अद्र्धनारीश्वर की मूर्ति। जिसमें शिव अपने शरीर का बायां अंग अपनी पत्नी पार्वती को देते हैं। श्री मुरुगन ने इस इलाके के कई पुरुषों से बातचीत की, जिनकी उम्र 50 से ऊपर है। इन्हें अद्र्धनारी या सामीपिल्लै (ईश्वरप्रदत्त संतान) कहा जाता है। इन लोगों से गहन, विस्तृत चर्चा के बाद उन्हें पता लगा कि 50 साल पहले तक यहां यह प्रथा थी कि साल में एक बार अद्र्धनारीश्वर के मंदिर में रथ लाया जाता था, इस पूजा के दिन निसंतान महिलाएं यहां आती थीं। इस दौरान किसी भी अजनबी से वह संबंध स्थापित कर सकती थी और इससे अगर उसे संतान प्राप्ति होती, तो वह ईश्वरप्रदत्त संतान मानी जाती। महिला का पति व उसके तमाम संबंधी उसे इसी रूप में स्वीकार करते। दरअसल कृषि से आजीविका कमाने वाले गुंडर समुदाय में संतान का होना अतिआवश्यक माना जाता है। किसी गुंडर परिवार के पुरुष द्वारा किए गए कठिन कार्य का फल भोगने के लिए अगर उसका पुत्र नहींहै, तो उसका जीवन व्यर्थ माना जाता है। श्री मुरुगन के उपन्यास माथोरुभगन, अंग्रेजी में वन पार्ट वुमन, में इसी सामाजिक प्रथा के इर्द-गिर्द कथा बुनी गई है। इस उपन्यास का कोंगू वेल्लाला गुंडर समुदाय द्वारा लगातार विरोध किया जा रहा है। उनका आरोप है कि उपन्यास में उनकी जाति की महिलाओं और हिंदू देवताओं का अपमान किया गया है। हिंदुत्ववादी, जातिवादी संगठनों के निशाने पर आए पेरूमल मुरुगन इससे क्षुब्ध हैं, आहत हैं। उन्होंने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि- लेखक पेरूमल मुरुगन मर चुका है। वह ईश्वर नहींहै, इसलिए वह फिर अवतरित नहींहोने वाला। इसके बाद एक अध्यापक पी.मुरुगन जीवित रहेगा। उनकी इस टिप्पणी से उनकी मनोदशा का अहसास होता है। भारत में पहले भी लेखकों, कलाकारों पर हमले होते रहे हैं। किसी ने बाहर पनाह लेना मंजूर किया, तो किसी ने बाहर जाने की इच्छा जतलाई। अब यह नया प्रकरण सामने है जिसमें एक लेखक शांति के लिए अपनी कलम को नीचे रखना ही उचित समझता है। बहरहाल अब यह भारत के लोगों को, बहुविध संस्कृति वाले समाज को तय करना है कि वे शांति किसे मानते हैं, डर के चुप बैठने को या न्याय की उपस्थिति को, जिसके लिए आवाज उठाना जरूरी है।