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Saturday 18 Nov 2017

मंटो के खत\' : मंटो न मरा है न मरेगा

श्रीरंग
128, एम/1 आर, कुशवाहा मार्केट
भोला का पूरा, प्रीतम नगर
इलाहाबाद-11
मो. 9335133894
पिछले दिनों असलम परवेज के सम्पादन में प्रसिद्ध और हरदिल अजीज फनकार सआदत हसन मंटो के खतों का संग्रह प्रकाशित हुआ। इन खतों का उर्दू से हिन्दी में लिप्यान्तरण शाहनवाज आलम ने किया है। सभी जानते हैं कि मंटो अगर अपने समय में बहुत लोकप्रिय रहे और उन्हें खोज-खोजकर पढ़ा जाता रहा तो भी वे बड़े विवादास्पद ही रहे। लोगों की उनके बारे में अलग-अलग राय रही। कई विद्वान तो उन्हें बहुत हल्का और अश्लील लेखक कहने से भी गुरजे नहीं करते लेकिन बहुत से लोग उन्हें आला दर्जे का फनकार मानते हैं और उनकी बुराइयों और यथार्थ चित्रण के बीच से अच्छाई की खोज करते हैं। उनके अपने जमाने के लेखकों की राय भी अलग-अलग रही है। जाहिर है अभी तक जो भी अभिमत बने हैं वे उनकी रचनाओं के आधार पर ही बने हैं, कुछ उनके दोस्तों द्वारा प्रकट किए गए विचारों द्वारा। लेकिन इस पुस्तक में प्रकाशित खतों से मंटो की जो तस्वीर उभरती है वह बहुत अलहदा है।
कहते हैं किसी लेखक के व्यक्तित्व के गठन को समझने का एक बहुत बड़ा साधन उसके द्वारा लिखे गए पत्र हो सकते हंै क्योंकि यह बिना किसी काटछांट के लिखे गये होते हंै और किसी अपने से संवाद की तरह होतेहैं। इसमें तमाम निजी बातें होती हैं जो अन्यत्र दुर्लभ होती हंै। इसमें लेखक की मानसिक स्थिति, उसके विचार, उसकी दिलचस्पी सभी कुछ होता है। बहुत से लोग तो इसे किसी की निजी जिन्दगी में झांकना मानते हैं, लेकिन लेखक की भी क्या कोई निजी जिन्दगी हो पाती है?
इन खतों को पढ़कर मंटो की जिन्दगी के तमाम अनछुए पहलुओं और हकीकतों से वास्ता पड़ता है। ये खत मंटो ने अपने मित्र अहमद नदीम कासमी को लिखे थे। मंटो और कासमी के बीच खतो किताबत की शुरूआत पेन फ्रेंडशिप से शुरू हुई थी लेकिन जल्द ही यह सिलसिला जोर पकड़ता गया। मंटो ने कहीं उनकी कोई कहानी पढ़ी जो उन्हें बहुत अच्छी लगी और वे कासमी को पसंद करने लगे। उन्हें सलाह मशविरा भी देने लगे। दोनों अपने जीवन के सुख-दुख को शेयर करने लगे। मंटो ने बड़ी मोहब्बत, खुलूस और भाई-चारे के जज्बे के साथ ये खत लिखे हैं इनसे उनके बीच के रिश्तों की गहराई को समझा जा सकता है। कहते हैं दोनों के मिजाज बिलकुल अलहदा थे लेकिन दोनों का संवाद अभूतपूर्व है। मंटो के मन में जो भी आता वह लिख देते थे। बड़े तन्मय होकर कि जैसे वे खुद से बात कर रहे हों।
अहमद नदीम कासमी को लिखे मंटो के खतों को पढ़कर मंटो की एक बहुत जोरदार तस्वीर उभरती है और आज कह सकते हैं कि ये आदमी कभी मुखौटा लगाकर नहीं रहा। कभी कुछ छिपाने की कोशिश नहीं की। हकीकत से टकराता रहा और हमेशा अपनी स्थिति को स्वीकार किया। मंटो खुद अपने बारे में लिखते हैं- यह भी हो सकता है सआदत हसन मर जाए और मंटो न मरे...
इन खतों के माध्यम से मंटो की जो तस्वीर बनती है वह उनकी कहानियों, नाटकों, लेखों और शब्दचित्रों से बनी तस्वीर से बिल्कुल अलग है। इन खतों में मंटो की उदासी और उसकी बेचैनियां जाहिर होती है। खुशदिल, खुशमिजाज और हंसमुख इंसान की भीतरी बेचैनियां। यह उनके भीतर की उदासी और उसकी संवेदनशीलता और बेताबी का इजहार करते हैं। वे लिखते हैं- ''मेरी जिन्दगी एक दीवार है, जिसका पलस्तर मैं नाखूनों से उखड़ता रहता हूं। कभी चाहता हूं कि उसकी तमाम र्इंटे गिरा दूं। कभी जी चाहता है इसके जरिये एक नई इमारत खड़ी कर दूं। इस उधेड़बुन में लगा रहता हूं। दिमाग हर वक्त काम करने की वजह से तपता रहता है, मेरा नार्मल दर्ज-ए-हरारत एक डिग्री ज्यादा है, जिसे आप मेरी अंदरुनी तपिश का अंदाजा लगा सकते हैं।ÓÓ वे फिर कहीं लिखते हैं ''कुछ भी हो मुझे, इत्मेनान नसीब नहीं। मैं किसी से मुतमइन नहीं हूं। हर राय में कमी महसूस होती है। मैं खुद अपने आपको नामुकम्मल समझता हूं। मुझे अपने से कभी तस्कीन नहीं होती। ऐसा महसूस होता है कि मैं जो कुछ हूं, जो कुछ मेरे अंदर है वह नहीं होना चाहिए। इसके बजाय कुछ और होना चाहिए।ÓÓ
जिन्दगी की बाहरी दुनिया में खुशमिजाज मंटो की निजी दुनिया की पीड़ा इन खतों में झलकती है। वे लिखते हैं- ''बाज औकात ऐसा महसूस होता है कि दुनिया सारी की सारी मुट्ठी में चली आई है और बाज औकात यह ख्याल पैदा होता है कि हम हाथी के जिस्म पर चींटियों की तरह रेंग रहे हैं। यह एक ऐसा जज्बा है जो लफ्जों में बयान नहीं हो सकता, इससे रूह और दिमाग को सख्त तकलीफ पहुंच रही है, समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए। मैं यह चाहता हूं कि मेरे पास एक स्विचबोर्ड आ जाए जिसे मैं हस्ब ख्वाहिश रोशनियां पैदा कर सकूं।ÓÓ असलम परवेज बताते हैं कि मंटो की उदासी और बेचैनियों की वजह उनकी सेहत भी थी। वे बीमार भी रहे। वे जिन्दगी भर पैसों के हाथों परेशान रहे। एक मजदूर की तरह काम करने और अपनी मेहनत और प्रतिभा के अनुसार फल न पाने का दुख भी उन्हें रहा जिसका जिक्र उन्होंने अपने खतों में किया है। मंटो ने जो जिन्दगी जी वह उन्हें स्वीकार नहीं थी। गैर रचनात्मक माहौल से समझौता और अपनी रचनात्मकता की हिफाजत उनके जीवन में चैलेंज रहा। मंटो के बारे में प्रसिद्ध है कि उनके दोस्तों का ख्याल था कि वे अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते थे और दूसरों पर रौब गांठते थे। किन्तु उनके खतों से लगता कि उनके लिखे किसी खत की कोई लाइन अकड़ी या ऐंठी हुई नहीं और ना ही मंटो किसी पर्सनालिटी प्राब्लम में लुप्त नजर आते हैं। इस तरह देखें तो लगता है मंटो को हमेशा गलत समझा गया। वे दोस्तों का ख्याल रखते थे उन्हें सही राय मशविरा भी देते थे। अहमद नदीम कासमी को लिखे पत्रों से तो यही लगता है।
इन खतों से पता चलता है कि आल इंडिया रेडियो दिल्ली की नौकरी के दौरान मंटो अपने दोस्तों से खुश नहीं थे। वे उपेन्द्रनाथ अश्क से काफी खफा थे जो उनकी बुराई भलाई कर रहे थे। यह भी पता चलता है कि मंटो वास्तविक जीवन में बहुत संवेदनशील थे। स्वाभिमानी थे, खुद्दार थे। आम लोगों से उनका रिश्ता बहुत सहज और सरल था। वे अपने जज्बों को दबाते छुपाते नहीं थे।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मंटो के खत को पढ़कर उन पत्रों की रचनात्मकता ही नहीं मंटो के जीवन की रचनात्मक वारदातों और उनकी मौलिक प्रतिभा से रूबरू हुआ जा सकता है। एक बड़े और प्रतिभाशाली लेखक के जीवन की भीतरी बुनावट को समझने में इससे मदद मिलती है।
मंटो के व्यक्तित्व की आंतरिक गुत्थियों को सुलझाने के लिहाज से भी ये पत्र मायने रखते हैं। 'मंटो के खतÓ पुस्तक बेमिसाल है, इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। शाहनवाज आलम के लिप्यांतरण का परिश्रम कुछ ऐसा है कि लगता है ये खत खड़ी बोली में ही लिखे गए हैं।