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Tuesday 21 Nov 2017

चैपलिन पर एक दृष्टि (अनुवाद तरूशिखा सुरजन)

 

पार्थो चटर्जी
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चाल्र्स स्पेंसर चैपलिन (1889-1977) सिनेमा के इतिहास में सबसे मशहूर हास्य अभिनेता और फिल्म निर्माता थे । उनकी मृत्यु के लगभग चालीस साल बाद भी उनके स्क्रीन नाम चार्ली से उन लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है जिन्होंने उनकी फि़ल्में सिनेमाघर के बड़े परदे पर देखी हैं और उन कम भाग्यशाली लोगों के चेहरे पर भी जो घर पर टेलीविजन और डीवीडी के माध्यम से उनसे परिचित हुए। उनकी कला और जीवन के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। आलोचकों और जीवनीकारों ने उनकी कला पर महारत को यथोचित बोधगम्य किया है परन्तु उनके जीवन को उस तरह नहीं समझा। हालांकि यह लेख पीटर ऐक्रोएड द्वारा लिखी गयी जीवनी, जिसका शीर्षक - चार्ली चैपलिन- है, से प्रेरित है, परन्तु निश्चित रूप से उसकी एक समीक्षा नहीं है।
ऐक्रोएड को जीवनी लिखने के लिए जानी-पहचानी भूमि पर चलना था और उनकी तुलना डेविड रॉबिन्सन द्वारा लिखी गयी जीवनी चैपलिन से होना स्वाभाविक था, जो कि शायद थोड़ी शोकाकुल थी लेकिन चैपलिन के काम के बारे में बहुत जानकारीपूर्ण थी। विभिन्न जीवनियों को पढऩे से और उनकी फिल्मों को बार-बार देखने से यह जरूरी नहीं है कि एक कलाकार और उसके मनोविज्ञान और आध्यात्मिक सोच के बारे में एक बोधगम्य समझ विकसित हो जाये। कोई यह अनुमान लगाने भर का खतरा उठा सकता है जो कि फिल्मों में दिखाए गए दृश्यों से, अथवा उन्हें अच्छी तरह जानने वाले लोगों की दृष्टि से अथवा उनसे अल्पावधि में मिले लोगों से मिल सकता है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को एक लम्बे समय से जानना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसकी कला और व्यक्तित्व को भी अच्छी तरह समझा गया हो। थोड़े आसान शब्दों में कहें तो चैपलिन एक व्यक्ति के रूप में और और चैपलिन एक हास्य अभिनेता-निर्देशक के रूप में जटिल व्यक्तित्व के थे ; जिन्हें उपेक्षित होने का डर सताता था एवं अपनी महान क्षमता को पहचानने के बावजूद मित्रों और अजनबियों द्वारा अपेक्षाकृत कम सराहे जाने का डर भी।
अपनी जवानी और प्रौढ़ावस्था में चाल्र्स चैपलिन एक अति सक्रिय कामेच्छुक व्यक्ति थे और महिलाओं के लिए अपनी लालसा को पूरा करने के लिए उनमें शक्ति थी। उन्होंने चार बार विवाह किया (मिल्ड्रेड हैरिस, लीटा ग्रे, पौलेट गोडार्ड और ऊना ओ नील);  कई महिलाओं से उनके सम्बन्ध थे, जिनमें अभिनेत्रियां एडना पूर्वीअन्स, पोला नेग्री शामिल थीं। पोला नेग्री मूक सिनेमा में एक बिजली की तरह थी, विशेष रूप से अन्स्र्ट लुबितश्च के साथ और हॉलीवुड में सवाक सिनेमा के आरम्भ होते ही संभवत: अपने पोलिश लहजे की वजह से फुस्स पटाखा साबित हुईं; और पैगी हॉपकिंस जॉइस, जो कि एक खूबसूरत कामुक सोशलाइट और स्पष्ट रुप से लालची महिला थी। उनमें किशोरियों के प्रति भी आकर्षण था।  ऊना को पाने के बाद ही, जो कि विवाह के समय 17 की थी और वे 54 के थे, किसी दैवीय प्रभाव से या ऐसा प्रतीत होता था, उन्हें शांति मिली। ऊना, प्रसिद्ध नाटककार यूजीन ओ नील की बेटी थी और उनके जीवन के दूसरे एवं अपेक्षाकृत शांत हिस्से का आधार थी। उनकी अति कामुक प्रवृत्ति उनकी कलात्मक प्रतिभा के लिए ईंधन थी। ऐसा लगता था मानो महिलाएं उनके जीवन में अपनी उपस्थिति से उन्हें और कलात्मक ऊंचाइयों को छूने के लिए प्रेरित करती थीं,  हालाँकि यह उपस्थिति भावनात्मक न होकर केवल यौन साहचर्य के लिए ही होती थी, जिनमें मात्र ऊना एक अपवाद थीं। उन्होंने जो कुछ भी अपने जीवन में दिया, वह सिर्फ अपने आप को, एक विदूषक और निर्देशक के रूप में अपनी कला को दिया। महिलाओं से सतर्कता या पुरुषों से भी सतर्कता बरतने का व्यवहार उनमें इंसानों के प्रति गहरे अविश्वास से आया था। एक बालक के रूप में वे विक्टोरिया युगीन लंदन में गरीबी में पिस रहे थे।  जब उन्होंने इंग्लिश म्यूजिक हॉल, जो कि अमेरिका स्थित वॉडविल मनोरंजन संस्था की तरह था, में काम करना शुरू किया तब जाकर तीन वक्त का खाना नसीब हुआ। उनकी माँ हैना एक प्रतिभाशाली गायिका और हास्य कलाकार थीं परंतु कंठनाल की सूजन से पीडि़त थीं,  सैनिकों के लिए आयोजित एक शोरगुल भरे कार्यक्रम में वे अपनी आवाज खो बैठी, तब 5 वर्षीय चार्ली को घबराये स्टेज मैनेजर ने  मंच पर धक्का देकर भेज दिया। उन्होंने अपनी माँ की आवाज की (अनजाने में) क्रूर नक़ल उतारी, पर पहले दर्शकों द्वारा खुद पर बरसाए गए सारे पैसे बटोरे।  
जल्द ही उनकी माँ पागल हो गयी तथा चार्ली और उनके सौतेले बड़े भाई सिडनी को थोड़े समय के लिए अनाथालय भेज दिया गया। उनके दुखों में इजाफा करते हुए हैना ने वर्कहाउस में भी कुछ समय काम किया था, जो कि उन दिनों आर्थिक दिवालियेपन की सबसे बड़ी निशानी थी। यह समझा जा सकता है कि चार्ली अपने आसपास के इंसानों से आर्थिक और सामाजिक सम्बन्ध बनाने में दिन-ब-दिन सतर्क होते गए। एकमात्र सिडनी ऐसे व्यक्ति थे जिन पर उन्हें पैसों के मामले में भरोसा था, वे उन्हें अपने साथ हॉलीवुड भी लाये और अपने कामकाज की जिम्मेदारी सौंपी। यह कहना शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अमेरिका की 1929 की भयंकर मंदी में, जिसने वहां की अर्थव्यवस्था की नीव हिला दी थी, चैपलिन की दौलत सुरक्षित रही और इसका श्रेय पूर्णत: सिडनी को जाता है जिसने अपने छोटे भाई की संपत्ति का असाधारण रूप से चतुर प्रबंधन किया।
यह बिलकुल सत्य है कि जिस मानवीय पीड़ा को चैपलिन ने अपनी कला में उभारा है, उसने उनकी कला को भी उभारा है। उनकी लघु एवं फीचर फिल्मों में ऐसे कई दृश्य हैं जो हँसाते-हँसाते रुला जाते हैं। उनकी लघु फिल्म द पिलग्रिम, जिसमें उन्होंने अभिनय और निर्देशन दोनों किया, जो कि मूक युग की एक फिल्म निर्माण कंपनी फस्र्ट नेशनल ने बनाई थी, का एक उदाहरण है। इस फिल्म में ट्रैम्प के किरदार के रूप में, जिसे उन्होंने अमर कर दिया, वे एक पुजारी के कपड़े चुराते हैं जो पास ही तैर रहा होता है, उसके कपड़े खुद पहनकर वे चर्च पहुँचते हैं, जहाँ एक नए पुजारी का इंतजार हो रहा होता है। वहां वे छोटे डेविड (अच्छाई) की दैत्य गोलिअथ (बुराई) पर जीत के अपने प्रवचन से उपस्थित लोगों की आँखों में आंसू ले आते हैं। मूक फिल्मों में उनकी मिमिक्री उदात्त है। परन्तु एक दृश्य जिसमें गला रुंध जाता है, वह है फिल्म का अंतिम दृश्य, जिसमें बेघर( देशरहित भी) ट्रैम्प दर्शकों से दूर जाता हुआ नजर आता है, मैक्सिको-अमेरिका सीमा पर, और उसके दोनों पैर सीमा के एक-एक ओर हैं। चैपलिन की अपने विचारों को स्पर्शीय बनाकर, तरलता एवं भद्रता के साथ सिनेमा के माध्यम से व्यक्त करने की प्रतिभा इतनी महान थी कि उन्हें वोल्फग़ांग  ऐमेडुस मोजार्ट के समान माना जाता था , पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के एक महान संगीतकार, जिनके कार्य में भावनाओं की गहराई और विचारों की समृद्धि जितनी थी, उतनी ही सरलता से वे उन्हें प्रस्तुत करते थे। चैपलिन के एकमात्र असली प्रतिद्वंद्वी बस्टर कीटन थे, चेहरे से शोकाकुल परन्तु जबरदस्त अच्छे एथलीट, और उनका हास्य चैपलिन के हास्य से विपरीत था; उन्होंने कभी भी दर्शकों के दिल के तारों के साथ छेडख़ानी नहीं की बल्कि हमेशा उन्हें अपने खतरनाक कारनामों और शरीर की विदूषकी भाव भंगिमाओं से रोमांचित और प्रसन्न किया। उनकी फिल्मों में - खास तौर पर बेहतरीन फिल्मों में- एक शैली अथवा संरचना का सहज भाव था। कुछ फिल्म आलोचकों ने कीटन को सिनेमा का बाख बताया, संभवत: इसलिए कि रूखे हास्य के ठहाकों के नीचे उन्हें एक भव्यता, अनजाने में ही, अन्तर्निहित लगती थी। जोहन सेबेस्टियन बाख मोजार्ट के सीनियर थे और उनके समान विएना के ही वासी थे। उनकी संगीत रचनाएँ भव्य, तपी हुई एवं यादगार थीं।
चैपलिन और कीटन क्रमश: इंग्लिश म्यूजिक हॉल और अमेरिकी वॉडविल से निकले थे। दोनों संस्थान विशाल और उत्साही दर्शकों के लिए थे, जो कि उकसाने पर दुव्र्यवहार और क्रूरता पर भी उतर आते थे। प्रस्तुतकर्ता को अत्यंत कम समय में दर्शकों की नब्ज पकडऩी होती थी और अपने प्रदर्शन के अंत तक पकड़ बनाकर रखनी होती थी। सिनेमा में आने से पहले चैपलिन और कीटन दोनों ही इस मंच के सितारे थे। चैपलिन अपने अभिनय के माध्यम से दर्शकों का दिल पिघलाने में लगातार बढ़ती हुई सफलता  प्राप्त करते रहे, उनका अभिनय इंग्लिश फूहड़ हास्य कलाकारों और फ्रांसिसी विदूषकों के सिद्धांत पर आधारित था। पहले से उन्होंने हास्य संवादों में निरंतरता बनाये रखना सीखा तो दूसरे से मूकाभिनय की सर्वोच्च कला को आत्मसात किया। जब वे सिनेमा में आये तो मूक सिनेमा का दौर था, उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं थी परन्तु मूकाभिनय में उनके प्रशिक्षण और कला ने उन्हें बहुत अच्छी शुरुआत दी। कीटन का वॉडविल में प्रदर्शन ऐक्रोबैटिक पर आधारित था जो कि काफी मुश्किल से और समय के सही संयोजन के साथ किया जाता था। वे इस कला को सिनेमा में लेकर आये और उसमें हंसी-ठहाकों को अपने कौशल से जोड़ा, यह कार्य प्रवीणता के साथ किया गया और विशेष प्रभाव उत्पन्न किया।  चैपलिन का दुनिया को देखने का नजरिया शेक्स्पीरियन था, कीटन का सारे रोमांटिसिज्म के बावजूद काफी क्रूर लगभग बेकेटियन। उनकी अंतिम फिल्म जो कि आधे घंटे की एक मूक फिल्म थी, एब्सर्ड के मास्टर सैमुएल बैकेट द्वारा ही लिखी गयी थे और जिसका शीर्षक था 'फिल्मÓ।
अपनी भावुकता के बावजूद चैपलिन ने फि़ल्में इंसान की मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में बनाई जैसे सम्मान के साथ जीविकोपार्जन करने की जरूरत और अधिकार, भोजन और सिर पर छत, अविवाहित मातृत्व का गम, दैनिक जीवन में अत्यधिक मशीनरी का वर्चस्व और मानवीय गरिमा का निषेध इत्यादि कुछ ऐसे विषय थे जिन को उन्होंने अत्याधिक संवेदना के साथ उठाया। उनके द्वारा दमित जन की आवाज उठाये जाने पर, जिनके श्रम के बिना अमेरिका की समृद्धि संभव ही नहीं थी, वे सरकार की नजर में खटकने लगे। बाद में द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात उन्हें कम्युनिस्टों के हमदर्द के रूप में तंग किया गया, उस देश में जिसने बार-बार वैध हड़तालों को कुचला और मजदूर आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी क्योंकि उद्योगपतियों, जिनका उद्देश्य किसी भी कीमत पर मुनाफा कमाना था, की नजऱों में ये आंदोलन एक अनावश्यक बाधा थे। 1929 की आर्थिक मंदी में जिसने अमेरिका और बाकी विश्व की जड़ें हिला दी, पूंजीपतियों को अधिक लालची और अपने हितों के प्रति ज्यादा सावधान बना दिया। उन्हें लगता था कि चैपलिन एक चालक व्यक्ति है जो तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक परेशानियों को भुनाकर बहुत पैसा बना रहा है।
यह सही है कि उनके मूक सिनेमा के दौर की फिल्में प्रवीणता से बनाई गई हास्य फि़ल्में हैं परन्तु वे मुख्य मुद्दों को उठाती रही हैं। द इमिग्रैंट, आइडल क्लास, द पिलग्रिम, ईज़ी स्ट्रीट, द पॉन शॉप आदि नयी दुनिया में लोगों के रोजमर्रा के संघर्ष के बारे में थीं, जहाँ अधिकांश गरीब थे परन्तु बेहतरी की उम्मीद में जीते थे। द किड और उसके पहले शोल्डर आम्र्स ने उन्हें कलात्मक और व्यावसायिक ऊंचाइयां प्रदान की, जिससे वे पूर्णत: स्वतंत्र रूप से काम कर सके, उन्होंने अपना स्टूडियो बनाया और रचनात्मक स्तर पर पूरी तरह स्वतंत्र हो गए।  फिर उन्होंने अपने अच्छे मित्रों, डगलस फेयरबैंक्स और उनकी पत्नी मैरी पिकफोर्ड, जो कि मूक दौर के बड़े सितारे थे, तथा डी.डब्लू.ग्रिफ्फिथ, जो कि फि़ल्मी भाषा के जनक और बेहतरीन निर्देशक थे , के साथ मिलकर यूनाइटेड आर्टिस्ट्स बनाई। इस कंपनी के माध्यम से चैपलिन ने अपनी बेहद सफल फिल्मों का वितरण किया, अपवादस्वरूप एक ही फिल्म थी अ वूमन ऑफ़ पेरिस , जिसने बस ठीक-ठाक बिजऩेस किया था।
अ वूमन ऑफ़ पेरिस में एडना परविआन्स तथा एडोल्फ मेंजो मुख्य भूमिकाओं में थे, चैपलिन एक छोटे रेलवे स्टेशन के कुली की अत्यंत छोटी भूमिका में थे। यह फिल्म एक परिष्कृत वयस्क कॉमेडी थी जो अपने समय से बहुत आगे थी। दर्शक जो कि चैपलिन को ट्रैम्प जैसे किरदारों में अपने जर्जर कपड़ों, ढीली पतलून, बटन लगे कसे से कोट, सिर पर टोप, एक छड़ी, पैरों से बड़े जूतों, ऊपर उठे हुए पंजे, काली गहरी आँखों, और छोटी मूंछों में देखने के आदी थे और इन सबसे उनका हास्य किरदार उभरता था, समझ नहीं पाये कि चैपलिन ने यह फिल्म आखिर बनाई ही क्यों।  पलटकर देखने पर यह एक जबरदस्त फिल्म थी। गांव की एक धोखा खाई लड़की के रूप में एडना परविआन्स जो पेरिस आकर एक कामुक आदमी(भूमिका- एडोल्फ मेंजो)  की रखैल बन जाती है, ने खूबसूरत अदाकारी की। मेंजो अपनी भूमिका में बिलकुल रच बस गए थे।
 उस समय के दर्शकों के लिए ये एक गहरे आघात के रूप में आयी थी, जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनकी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। परन्तु बाकी निर्देशकों ने उसे तुरंत समझ लिया। अन्स्र्ट  लुबितश्च तथा माइकल पॉवेल ने बताया कि वे उस अनुभव से अभिभूत थे और जल्द ही अपने अंदाज में उन्होंने वैसी ही फि़ल्में बनानी शुरू कर दी। पॉवेल की टिप्पणी थी कि अचानक एक परिपक्व फिल्म आयी जिसमें लोग वैसा ही बर्ताव कर रहे थे जैसा वे अपने निजी जीवन में करते हैं। (पृष्ठ 143)
अ वूमन ऑफ़ पेरिस ने एडना परविआन्स को एक सफल कलाकार के रूप में स्थापित नहीं किया जैसा कि चैपलिन ने चाहा था। वे बहुत ही जल्द न सिर्फ सिनेमा से बल्कि चैपलिन की जि़न्दगी से भी दूर हो गयीं। जल्द ही वे एक नयी और महत्वाकांक्षी अभिनेत्री लीटा ग्रे से मिले और शादी भी की। महिलाओं के साथ संबंधों  में उनकी दुरुहता, जो कि पहली पत्नी मिल्ड्रेड हैरिस से शुरू हुई थी जो कि खुद भी कमउम्र, नयी और महत्वाकांक्षी कलाकार थी, एक लम्बे समय तक बनी रही। उन्हें भावनात्मक स्थिरता मशहूर नाटककार यूजीन ओ नील की अ_ारह वर्षीय बेटी ऊना से शादी करने के बाद ही मिली।  इसके पहले उनके असफल सम्बन्ध एक महत्वकांक्षी अभिनेत्री जोआन बेरी से थे, जो कि भावनात्मक रूप से अस्थिर थी। वे उसे अपनी एक फिल्म शैडो और सब्सटैंस में मुख्य भूमिका देना चाहते थे। चैपलिन और बेरी  प्रेमी बन गए। जब बेरी गर्भवती हो गयी तो संबंधों में खटास आ गयी। कैलिफ़ोर्निया की एक अदालत ने ब्लड टेस्ट के आधार पर जोआन बेरी का केस ख़ारिज कर दिया कि उनकी नवजात बेटी कैरोल ऐन के पिता चैपलिन नहीं थे। परन्तु बेरी के वकील जोसेफ स्कॉट ने निर्णय के खिलाफ विज्ञापन चलाकर जूरी को प्रभावित करने की ठानी। उसने चैपलिन को कई खऱाब नामों से पुकारते हुए उनकी छवि खऱाब करने की मुहिम चलाई. . ...इस अनुचित अपील का जूरी सदस्यों की भावनाओं पर कोई असर नहीं हुआ और केस एक गतिरोध में फंस गया। अगले साल के वसंत में एक सुनवाई और रखी गयी परन्तु चैपलिन ने एक गवाह के रूप में उपस्थित होने से इंकार कर दिया। इस अवसर पर डॉक्टरों द्वारा ये साबित कर दिए जाने पर कि वे बच्ची के पिता नहीं हैं, फिर भी 10 जूरी सदस्यों ने उन्हें ही जिम्मेदार माना। अमेरिका में उनकी प्रतिष्ठा गिर गयी जिससे वे अपने अंतिम समय तक उबर नहीं पाये। (पृ 210-211)
उनकी कामेच्छा उनकी निजी जीवन में भले ही परेशानी लेकर आयी, परन्तु उनकी सिनेमैटिक रचनात्मकता के लिए शायद ईंधन का भी काम किया। सिनेमा के इतिहास में किसी भी और निर्देशक ने इतने विस्तृत और व्यापक विचारों पर इतनी सफलता के साथ फि़ल्में नहीं बनाई, वह भी हास्य का रूप देकर।  मूल भावनाओं के विभिन्न रूपों जैसे प्रेम, वासना, परिवार, सामाजिक लालच, अकेलापन, रोजमर्रा के जीवन में हताशा, के अलावा उन्होंने अनेक बहुत ही महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को भी उठाया जैसे अत्यधिक औद्योगीकरण के नतीजे (मॉडर्न टाइम्स), आर्थिक मंदी में दिवालिया हुए व्यक्ति का अकेलापन, अमीर महिलाओं से शादी करने के बाद उनकी हत्या करने वाला (मॉन्सिएर वेर्दो)। 1938 के जर्मनी में यहूदी विरोधी भयानक और जहरीली भावनाओं पर बनी फिल्म 'द ग्रेट डिक्टेटरÓ सिर्फ हास्य के लिए सराही गयी, अपनी मानवता और विवेक के सन्देश के लिए नहीं। उन्हें अपनी फिल्म में एक काल्पनिक देश तोमनिया दिखाना पड़ा, जिस पर एक तानाशाह ऐडेनोइड हेंकेल का शासन है और जो सभी यहूदियों को ख़त्म कर देना चाहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि  अमेरिका में ऐसे जर्मन काफी संख्या में थे जो यहूदी विरोधी भावनाएं रखते थे। इसलिए भी क्योंकि अमेरिका के नाजी जर्मनी से उन दिनों मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे, जिसका शासक अडोल्फ़ हिटलर था, जो जल्द ही इतिहास का क्रूरतम यहूदी विनाशक बनने जा रहा था।
 चैपलिन के समय में हॉलीवुड अपनी बेजोड़ पहुँच के कारण दबदबा रखता था इसलिए मुनाफा कमाने में वह पूरे विश्व के राष्ट्रीय सिनेमा को मिलाकर भी सबसे आगे था। अमेरिका और बाहर दोनों जगह चैपलिन की फि़ल्में सबसे ज्यादा मुनाफा देती थीं। उनकी विषयवस्तु चाहे सिटी लाइट (1931) हो या मॉन्सिएर वेर्दो (1947), हॉलीवुड की सफल विषयवस्तु झूठी उम्मीदों और खुशनुमा भविष्य से अलग होती थीं। हॉलीवुड के अमीर और निंदक निवासी सोचते थे कि चैपलिन अपने आप को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। बस्टर कीटन - असफल प्रतिभा - एक खऱाब व्यापारी था, जिसने अपनी स्वतंत्रता और रचनात्मकता एमजीएम स्टूडियो के हवाले कर दी थी जो कि सवाक फिल्मों का अग्रणी स्टूडियो था। कीटन अपने मित्र चैपलिन की घोषणाओं पर दंग थे।  एक अवसर पर जब चैपलिन और कीटन, कीटन के घर में बैठकर शराब पी रहे थे, चैपलिन ने कहा मैं चाहता हूँ कि हर बच्चे को पेट भर खाना मिले, पहनने को जूता और सिर पर छत मिले! कीटन ने जवाब दिया, तुम किसी को जानते हो जो ऐसा नहीं चाहता? (पृष्ठ 195)
यदि न्यायसंगत समाज की चाह में चैपलिन उस अवसर पर कुछ अति कर रहे थे, तो कीटन की प्रतिक्रिया थोड़ी भोली थी, क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए भलाई की चाह को कार्यान्वित करना संभव नहीं था/है, जब तक कि उनके सामने अस्तित्व का संकट न हो। इसका विपरीत जरूर किसी भी वक्त संभव है। जब सीनेटर जोसेफ मैक्कार्थी और उनके अनाड़ी साथियों ने अमेरिका में कम्युनिस्टों के खिलाफ यह कहकर मुहिम छेड़ी कि कम्युनिस्ट अमेरिकी जनता के जीवन के हर पहलू में दखल दे रहे हैं तो हॉलीवुड में हड़कम्प मच गया। अभिनेता, निर्देशक, पटकथा लेखक सभी सरकार के सामने अपने-आप को और अपने सफल करियर को बचाने के लिए एक-दूसरे की निंदा करने में लग गए। चैपलिन, ऊना और बच्चों ने अमेरिका हमेशा के लिए छोड़ दिया। वे स्विट्जऱलैंड जाकर वेवे नामक स्थान में बस गए। उनके जीवन का अंतिम चरण ऊना और बच्चों के साथ खुशनुमा था हालाँकि उनके किशोरवय बच्चे उन्हें बहुत सख्त समझते थे। अपने अंतिम चरण में 1950-65 तक उन्होंने तीन फि़ल्में लाइमलाइट, अ किंग इन न्यूयॉर्क और अ काउंटेस फ्रॉम हांगकांग बनाई।
लाइमलाइट जो कि एक असफल संगीतकार कैल्वेरो की कहानी है, दरअसल उनकी आत्मकथा थी। पेरिस में प्रीमियर के बाद वे पिकासो से उनके स्टूडियो में मिलने गए। बाद में पिकासो ने चैपलिन से इस मुलाकात के बारे में लिखा-  समय ने उन्हें हरा दिया और एक दूसरा ही इंसान बना दिया। अब वे सिर्फ अपनी पहचान खोजते एक आम अभिनेता हैं जो अब किसी को हंसा नहीं पाते हैं। (पृष्ठ 228)
पिकासो के लिए चैपलिन उनकी कल्पना में ट्रैम्प ही थे, एक ऐसा विदूषक जो अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिए द्वद्बद्वद्ग करने की अनूठी क्षमता रखता था। अब वे वैसे कवि-कलाबाज नहीं हो सकते थे जो भावनाओं के ज्वार को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत करता था। यह सत्य है कि समय ने इस महान कलाकार को भी नहीं बख्शा और उनके लिए अब अपने मूक फिल्मों के दौर की हास्य भाव-भंगिमाओं को वैसे निभाना संभव नहीं रह गया था। आवाज़ आने के साथ ही सिनेमा का माध्यम भी बदल गया। लाइमलाइट म्यूजिक हॉल के सुनहरे दिनों की याद में बनी एक उदास फिल्म है, परन्तु एक सौम्य, संवेदनशील और काव्यात्मक फिल्म भी है। फिल्म का मुख्य आकर्षण क्लाइमैक्स में चार्ली चैपलिन और बस्टर कीटन द्वारा बेडौल संगीतकारों की जोड़ी के रूप में किया गया अभिनय है। अ किंग इन न्यूयॉर्क मैक्कार्थीज़्म पर एक तीखा व्यंग्य है जिसमें एक बालक उत्तराधिकारी को अपने राजनैतिक रूप से प्रगतिशील माता-पिता को धोखा देने के लिए फंसाया जाता है, जिसके फलस्वरूप उनकी मौत हो जाती है।
उनकी अंतिम फिल्म अ काउंटेस फ्रॉम हांगकांग 30 के दशक के एक परिदृश्य पर आधारित थी। यह फिल्म नहीं चली क्योंकि मर्लोन ब्रांडो एक रोमांटिक और हंसोड़ अमेरिकी राजदूत की भूमिका में नहीं जमे, हालाँकि सोफिय़ा लॉरेन एक गोरी रुसी काउंटेस जो कि डांस हॉल की मुख्य नर्तकी होती है, और ब्रांडो के जहाज के केबिन में छुप कर सफर करती है, की भूमिका में आकर्षक और मजेदार लगी। फिल्म को बचाने वाली बस एक ही चीज थी एक गीत- दिस इस माय सांग, जो कि चैपलिन द्वारा तैयार किया गया था और बहुत हिट हुआ था।
एक फि़ल्मकार के रूप में चार्ली चैपलिन सफलतम रहे। एक विदूषक के रूप में उनका अभिनय हास्य और करुणा का नायाब मिश्रण रहा। वे सिनेमा की सर्वप्रथम महान और मूल हस्ती थे, एवं अपने विचारों की स्पष्टता के कारण जटिल विचारों के निष्पादन को सरल बनाकर प्रस्तुत करने में बेजोड़ थे। ये सही है कि उनका जीवन भावनात्मक रूप से समस्याग्रस्त था परन्तु ऊना के रूप में अनजाने में सही खुशियां भी आई और वह भी जल्द ही।