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Tuesday 21 Nov 2017

\'चिरंजीव\' मेरा दिल है, \'सात फेरे\' मेरी दुनिया- चंद्रकिशोर जायसवाल

अरुण अभिषेक
विवेकानंद कॉलोनी,
पूर्णिया- 854301
मो. 09852888589
आप सातवें दशक से निरंतर लिख रहे हैं। कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव के समय से आज तक कितने ही कथा-आंदोलन हुए हैं। आप इन कथा-आंदोलनों में अपनी रचनात्मकता के साथ कहां तक शामिल रहे हैं? या फिर इनके पीछे आपकी व्यक्तिगत अवधारणा क्या रही है?
- मुझे किसी कथा-आंदोलन में शरीक होने की जरूरत कभी महसूस नहीं हुई। मेरे पास लिखने के लिए अपना व्याकरण था। मेरी नजर आंदोलनों की बजाय विश्व के महान रचनाकारों पर रही।
 आपकी गद्य रचनाओं में कविताओं और लोकगीतों का समावेश रहा है और उनका पाठकीय आकर्षण भी। इन गद्य रचनाओं में कविताओं का समावेश आपकी रचनात्मक जरूरत रही है या फिर कुछ और?
- मेरी कहानियों या उपन्यासों में लोकगीत या कविता का प्रवेश कथा को आगे बढ़ाने के लिए हुआ है, न कि खाली जगह को भरने के लिए। यह कथा का हिस्सा है, और शायद इसीलिए पाठकीय आकर्षण का कारण भी।
 गद्य रचनाओं में आपकी कविताओं की संख्या काफी है; इसके बावजूद आप स्वतंत्र रूप से कविता विधा को फैलाव क्यों नहीं दे पाए?
- मैंने कविताएं लिखी हैं, कुछ कविताओं का उपयोग अपने उपन्यासों में किया भी है। मैंने लिखने पर ध्यान दिया, विधा चुनने पर नहीं। मेरे आसपास कवियों का अकाल रहा; किसी सम्पादक ने कभी कविताओं की मांग भी नहीं की; कहानियों और उपन्यासों से फुरसत ही नहीं मिल रही थी; शायद ये ही कारण रहे होंगे कि मैं कवि घोषित होने से रह गया और अपने कवि-हृदय को गद्य के सांचों में ढालता रहा।
 आप मुख्यत: कथाकार एवं उपन्यास हैं; साथ ही कवि एवं नाटककार का भी आपका व्यक्तित्व है। आप बताएं कि किस विधा में आप ज्यादा चर्चित रहे हैं या फिर अपने पाठकों के ज्यादा करीब रहे हैं?
-मेरी कहानियों के लिए यह संभव हुआ कि पत्रिकाओं के माध्यम से वे विशाल पाठक-वर्ग के पास पहुंच जाएं। मेरे उपन्यासों के लिए आगे बढऩे का रास्ता जरा संकरा रहा है। नाटककार के रूप में मैं नहीं जाना जाता मगर मेरी कितनी ही कहानियों के नाट्यरूपांतरण और मंचन हुए हैं।
अपनी रचनाओं को लेकर नाट्य-विधा के फैलाव पर कोई खास अनुभव बताएं।
-बचपन से ही नाट्य विधा के प्रति मेरा गहरा लगाव रहा है। मैंने कुछ नाटक लिखे होते, अगर मैं किसी संस्था से जुड़ा होता। मुझे लगता है कि साहित्य का भविष्य नाटक के हाथ में ही है।
 अब तक कितनी रचनाओं के नाट्य-मंचन हुए हैं और किन नाट्य मंचों द्वारा?
- 'विदाई कांडÓ मेरी पहली कहानी है जिसका मंचन मनोज सिन्हा के निर्देशन में 'अभिनवÓ, हजारीबाग  द्वारा किए गया था। कहानी 'जंगÓ का रूपांतरण और मंचन अभी मुंबई में रह रहे रंगकर्मी विजय पंडित ने किया था। 'डोम पहलवानÓ की प्रस्तुति रंगमंडल, जबलपुर के निर्देशक विवेक पांडे ने किया था। इसकी प्रस्तुति सम्यक नाट्य संस्थान, लखनऊ के संस्थापक और निदेशक श्याम कुमार ने भी की थी। 'श्याम कुमारÓ 'मानबोध बाबूÓ का मंचन जबलपुर की ही एक और नाट्य संस्था 'विवेचनाÓ द्वारा किया गया था और यह मंचन हिमांशु राय के निर्देशन में हुआ था। 'नकबेसर कागा ले भागाÓ की प्रस्तुति राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,दिल्ली द्वारा की गई थी।
आपके कुछ एकांकी नाटक भी हैं। कृपया उनके नाम बताएं। इन एकांकी नाटकों की सफल प्रस्तुति पर कुछ कहना चाहेंगे?
- मेरे कुल चार ही एकांकी हंै- आज कौन दिन है? शिकस्त, जबान की बंदिश और त्राहिमाम्। ये पुस्तकें बिकी तो हंै, मगर यह नहीं पता कि किसी एक का भी मंचन हुआ है या नहीं। एकांकी मुझे एक अच्छी कहानी का सुख दे जाता है। मैं कुछ और एकांकी लिखता, मगर इसके लिए कोई वातावरण नहीं बना।
 आपातकाल में तानाशाही और स्वेच्छाचारिता बढ़ गई थी। अतीत की इस छाया में आपकी ऐसी कोई कहानी जिसे पाठ कर महसूसा जा सके?
- ऐसी कोई रचना नहीं जो सीधे आपातकाल की उपज हो, मगर एक कहानी है 'जंगÓ जिससे कुछ महसूसा जा सकता है।
 साहित्य-जगत में बुद्धिजीवियों द्वारा राजनीति जिस तरह से हो रही है, उससे साहित्य का भविष्य कैसा होगा? क्या अपना वैचारिक दृष्टिकोण व्यक्त करेंगे?
- साहित्य के महंतों और प्रथम पुरुषों की पद, पैसे और प्रतिष्ठा की भूख इतनी तीव्र हो गई है कि इस भूख के आगे वे साहित्य के भविष्य की चिंता नहीं करते। इसका भारी नुकसान भविष्य की साहित्यिक प्रतिभाओं को उठाना पड़ेगा। जैसे आज राजनेताओं के घर में एक के बाद एक नेता पैदा हो रहे हैं, उसी तरह ऐसा होगा कि केवल साहित्यिक महंतों के घर-परिवार में साहित्यिक प्रतिभाएं जन्म लेंगी।
 आप एक सौ से अधिक कहानियां लिख चुके हैं। उनमें 'उठ भाई पतुकी सलाम भाई चूल्हाÓ, 'मैट्रिमोनियल तसवीरÓ, 'गूदड़ पूजाÓ एवं 'के बोल कान्ह गोआला रेÓ कहानियों के सर्वश्रेष्ठ किरदारों की स्मृतियों सहेजते हुए आप कुछ कहना चाहेंगे?
- यह कैसा देश है जहां ऐसे भी देशभक्त हैं जो बाढ़ का हर साल स्वागत करते हैं और किसी साल बाढ़ न आए तो बहुत उदास हो जाते हैं? 'उठ भाई पतुकली सलाम भाई चूल्हाÓ के साथ मेरी एक और कहानी 'अगले साल फिर अगले सालÓ भी पढ़ी जानी चाहिए।
हम किस दुनिया में रह रहे हैं जहां बड़े-बड़े वकीलों को भ्रष्टाचारी और कातिल पैसे से खरीद लेते हैं? क्या यह सच नहीं कि किसी मुकदमे में कोई 'सत्यÓ नहीं जीतता, 'अच्छा वकीलÓ जीतता है? यह बहुत मुश्किल तो नहीं कि दूसरे सारे वकील भी 'गूदड़ पूजाÓ के वकील की तरह गूदड़ की पूजा करें। हमें लगातार पाश्चात्य संस्कृति से टकराना पड़ रहा है। इस टकराहट से खून-खराबा होता है। यह सोचने का समय है कि क्या हमें पाश्चात्य संस्कृति के आगे घुटने टेक देने चाहिए? या कि इसे बिलकुल नकार देना चाहिए? गंवारों के भीतर 'कान्हाÓ मिलते हैं, किसी को भी यह स्वीकार कर लेना चाहिए और किसी भी 'कान्हाÓ को उसकी उचित जगह मिलनी ही चाहिए।
 अपने दस उपन्यासों में आप किन्हें श्रेष्ठ कहेंगे? पाठकों ने किसे अधिक सराहा? ऐसा कोई अनुभव जिसे आप व्यक्त करना चाहेंगे?
- यह एक कठिन प्रश्न है। मैंने अपने किसी भी उपन्यास को जैसे-तैसे नहीं लिखा है। जिस उपन्यास को लिख रहा होता हूं, उसके सारे पात्र हर घड़ी मेरे साथ सकटे रहते थे, मेरे साथ उठते-बैठते थे, हाट-बाजार चलते थे और मेरे सो जाने पर मेरी नींद में आ बसते थे, सपनों में चले आते और मुझसे बतियाते थे। पर तब भी मैं कह सकता हूं कि 'चिरंजीवÓ मेरा दिल है और 'सात फेरेÓ मेरी दुनिया।
मेरे उपन्यासों के पाठकों की संख्या उतनी तो नहीं रही जितनी मेरी कहानियों की। मगर ऐसा कहने वाले कितने ही पाठक मिले कि जब उन्होंने पढऩा प्रारंभ किया तो फिर समाप्त कर लेने के बाद ही किसी और रचना को हाथ लगाया।
पाठकों के सबसे अधिक संवाद 'सात फेरेÓ पर आए हैं। गुवाहाटी के एक प्रकाशक इसका अनुवाद असमिया में करवा रहे हैं। बोंगाईगांव कॉलेज (असम) के प्रोफेसर शुभजित भद्र इसका बंगला में अनुवाद कर रहे हैं।
 आपके महत्वपूर्ण उपन्यासों या कहानियों पर केन्द्र में स्थापित समीक्षकों का क्या नजरिया रहा है? इस पर बेबाक कुछ कहना चाहेंगे?
- मैं सुदीप को याद करना चाहूंगा जिन्हें कहां से तो मेरा उपन्यास 'गवाह गैरहाजिरÓ मिल गया था और चिरागदीन के नाम से उन्होंने 'रविवारÓ में एक समीक्षा डाल दी थी, यह नहीं जानते हुए कि मैं कौन हूं और उम्र के किस पड़ाव पर हूं। अर्चना वर्मा और ज्योतिष जोशी ने मेरी रचनाओं को सराहा है। कोई तीसरा मेरी नजर में नहीं आ रहा।
मेरे लिए यह संभव नहीं हुआ कि मैं किसी बड़े समीक्षक का दरवाजा खटखटाऊं। मैंने भी मन को मना लिया कि जब मैं किसी को कुछ दे नहीं सकता, तो फिर किसी से कुछ मांगने किस मुंह से जाऊं। मेरी कहानियों के पाठक काफी संख्या में हैं; उपन्यास पर भी बहुतों के फोन आते रहे हैं। मैं नहीं कह सकता कि किसी बड़े समीक्षक की नजर मेरी किसी कहानी या किसी उपन्यास पर पड़ी है या नहीं। अपनी लम्बी कहानियां और मोटे उपन्यासों को पढऩे के लिए मैं उन 'व्यस्तÓ समीक्षकों से आग्रह कर भी तो नहीं सकता।
एक बड़े संस्थान के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत मेरे एक शुभेच्छु ने कभी मुझसे कहा था कि अपने नाम के साथ 'जायसवालÓ जोडऩा मेरे लिए बड़ा घातक रहा है।
उपन्यास 'चिरंजीवÓ वात्सल्य रस का उपन्यास है। कथानक की जीवंतता पर आपका कोई ऐसा अनुभव जिसे आप पाठकों से शेयर करना चाहेंगे?
- जब मैं 'चिरंजीवÓ लिख रहा था, तब श्रीपत जी (सम्पादक, 'कहानीÓ) मेरे साथ थे। 'चिरंजीवÓ मोटा उपन्यास है, लगभग नौ सौ पृष्ठों का, चार वर्षों में लिखा गया। मैं लिखता गया और वे उसे पढ़ते गये। उन्हें यह शक हो गया था कि मैं कभी पुत्र-शोक की पीड़ा तो नहीं झेल चुका हूं। उन्होंने बाद में मुझसे कहा था, 'यह माना जा सकता है कि बिना भोगे हुए भी कुछ लिखा जा सकता है।Ó
'चिरंजीवÓ को पढऩे के बाद कुछ ऐसी ही आशंका अर्चना वर्मा के मन में भी उपजी थी।
 वरीय रचनाकार ललित सुरजन व्यक्त करते हैं कि ''उपन्यास 'पलटनियाÓ पढ़ते वक्त मुझे प्रेमचंद याद आए तो कहीं सत्यजित राय की फिल्म 'जलसाघरÓ जीवित हो उठी या फिर विष्णु प्रभाकर का 'अद्र्धनारीश्वरÓ और शरतचंद स्मरण हो आए। क्या 'पलटनियाÓ की कथा-वस्तु का ऐसा विस्तार है जैसा ललित सुरजन ने व्यक्त किया है?
- 'पलटनियाÓ भी एक मोटा उपन्यास है, छह-सात सौ पृष्ठों का। ललित सुरजन जी किताबें खूब पढ़ते हैं, विश्व और भारतीय साहित्य को उन्होंने खूब पढ़ा है। मेरे सारे मोटे उपन्यास उन्होंने पढ़ डाले हैं; 'सात फेरेÓ को तो उन्होंने तीन दिनों के अंदर पढ़ डाला था।
'पलटनियाÓ में कथा का विस्तार तो है, एक टूटे हुए जमींदार की कथा है और एक मामूली बनिया की। एक बहुत बड़ा हिस्सा स्त्रियों का है। यह सब तो है, मगर यह तो सुरजन जी ही बता सकते हैं कि उपन्यास में कौन उन्हें कहां नजर आ गए और क्यों।
 भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उपन्यास 'सात फेरेÓ एक तिहाजू व्यक्ति की रोचक कथा है। इसमें आपने लोकगीतों, लोक-विश्वासों, किंवदंतियों, टोने-टोटकों, तंत्र-मंत्र का भरपूर उपयोग किया है। उपन्यास में कथा-रस प्रचुर मात्रा में है। मगर आज के पूंजीवादी समय में ऐसे कथानक का अपना यथार्थ कहां तक पैठ पाएगा? क्या यह जीवन का अनंत फंतासी स्रोत है?
-मैंने अपनी किसी भी रचना में जमीन नहीं छोड़ी है। मैं वही लिखता हूं जो देखता हूं। जम्मू के एक पाठक ने मुझसे पूछा था, क्या बिहार में सचमुच लड़कियां बिकती है? हरियाणा में कई घर ऐसे हैं जिनमें दो या तीन भाइयों के लिए सिर्फ एक पत्नी है। एक और 'पत्नीÓ को खरीद लाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। अगर कन्या-भ्रूण हत्या बंद नहीं होती है, तब यह समस्या अत्यंत विकराल होने वाली है।
लड़कियों के भारी अकाल को चीन ने उन्नीसवीं शताब्दी में देखा था जब वहां के पच्चीस प्रतिशत मर्द अनब्याहे रह गए थे। किसी समय पुर्तगाल की सरकार ने तो अनब्याहों की फौज तैयार की थी और उन्हें विजय-अभियान पर रवाना किया था नये-नये मुल्क जीतकर वहां उपनिवेश और जोड़ा बनाने के लिए। अमेरिका के अरिजोना में वहां के मॉरमोन समुदाय ने अपने चार सौ नाबालिगों को उनको अपने मुकाम से हटाकर आसपास के ऐसे शहरों में डाल दिया जहां वे टूअर औलादों की तरह बेघर होकर भूख-प्यास से तड़पते हुए इस एहसास के साथ मर-खप जाएं कि उनकी किस्मत में यही लिखा हुआ है। यह किया गया इसलिए कि अनब्याहे अधेड़ों को ब्याह के लिए युवतियां उपलब्ध हो जाए। कुछ समय पहले टेलिविजन पर यह समाचार आया है कि कुछ मतदाता इसी शर्त पर मतदान करेंगे कि उनका ब्याह करा दिया जाए। हरियाणा और उत्तरप्रदेश के अधेड़ 'दुलहिनÓ के लिए बिहार नहीं पहुंच रहे हैं क्या? 'सात फेरेÓ का तिहाजू तो किस्मत वाला है कि उसे एक 'लंगड़ीÓ मिल गई।
लोक-विश्वासों, किंवदंतियों, टोने-टोटकों और तंत्र-मंत्र का जमाना चला गया क्या? ऐसे कितने राजनेता होंगे जो चुनाव के समय पूजा-पाठ या यज्ञ-महायज्ञ का सहारा नहीं लेते या तांत्रिकों के चक्कर नहीं लगाते!
 श्रीपत जी ने अपने प्रकाशन 'सरस्वती प्रेसÓ से आपकी दो पुस्तकों का प्रकाशन किया था। ये कौन-सी पुस्तकें हैं? उन स्मृतियों से गुजरते आज के दिनों में कैसा महसूस कर रहे हैं?
- सरस्वती प्रेम से मेरी दो पुस्तकों का प्रकाशन हुआ था, 'गवाह गैरहाजिरÓ (उपन्यास) और 'मैं नहिं माखन खायोÓ (कहानी संग्रह) का।
'कहानीÓ (मासिक) के बंद हो जाने पर श्रीपत जी ने पत्र लिखा था, ''कहानी तो मैंने बंद कर  दी, मगर तुम जो भी लिखो मेरे पास अवश्य भेजो।ÓÓ मैंने उसी समय 'गवाह गैरहाजिरÓ पूरा किया था, पांडुलिपि उनके पास भेज दी। एक पखवाड़े के भीतर उनका पत्र आया कि मैं उन्हें उपन्यास छापने की अनुमति भेज दूं। जितनी खुशी मुझे हुई थी अनुमति भेजकर उतनी ही खुशी उन्हें हुई थी 'गवाह गैरहाजिरÓ छापकर। उसके बाद उन्होंने मेरा कहानी संग्रह छापा था। अगर सरस्वती प्रेस बंद नहीं हुआ होता और श्रीपत जी का अचानक जाना नहीं होता, तो शायद मेरी सारी किताबें सरस्वती प्रेस से ही छपतीं। उनका जाना मेरे लिए वज्रपात की तरह था।
मैं कहानियां लिखता चला जा रहा था, मगर मेरे लिए यह संभव नहीं था कि संग्रह के प्रकाशन के लिए किसी प्रकाशक की चिरौरी करूं। मदद के लिए साहित्य के किसी महंत के पास जाना भी मुझे नागवार गुजरा। तब श्री भारत भारद्वाज मेरी मदद में आए और उन्होंने एक प्रतिष्ठित प्रकाशक से बात कर ली। मैंने एक पांडुलिपि उस प्रकाशक के पास भिजवा तो दी, मगर सालभर बाद तक जब पांडुलिपि यों ही पड़ी रह गई, तब मैंने पांडुलिपि वापस मंगवा ली। मुझे श्रीपत जी याद आते रहे और मैंने अपनी पुस्तकों के प्रकाशन की अपनी व्यवस्था कर लेने का निर्णय लिया।
श्री ज्योतिष जोशी के बहुत जोर देने पर मैं 'सात फेरेÓ की पांडुलिपि लेकर भारतीय ज्ञानपीठ गया था। मैं आभारी हूं श्री रवीन्द्र कालिया का कि उन्होंने तत्काल मुझे आश्वास्त किया था कि वे इसे छापेंगे।
आज साहित्यिक पुस्तकों के अधिकांश प्रकाशक साहित्य के पारखी तो हैं नहीं; उनके लिए जो 'बिकाऊÓ है वही साहित्य है और वही 'प्रतिभाÓ है। आज के प्रतिभाशाली लेखकों की परेशानियां मेरी समझ में आती हैं और मैं उनके कष्ट को महसूस करता हूं।
 आप अपनी रचनाओं के खास किरदारों में किस हद तक अपनी संवेदनाओं से घनीभूत होते हैं?
- मैं अपने किसी भी पात्र को अपनी रचना में ला खड़ा करता हूं और उसे अपने पीछे आने को कहता हूं, मगर कुछ दूर तक ही चलना हो पाता है कि वह अपनी राह पकड़ लेता है और मुझे अपने पीछे आने का आदेश दे देता है। ऐसा कैसे होता है कि अपने इस पात्र के पीछे चलते हुए मैं 'हींग लगे न फिटकिरीÓ वाली कहावत चरितार्थ करते हुए एक लम्बी यात्रा तय कर लेता हूं। ऐसा होता तो है कि कोई पात्र हंसा जाता है, बार-बार हंसाता है, और किसी पात्र के दुख में आंखों से आंसू ढुलक पड़ते हैं, बार-बार आंखें भींग जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? स्याही के अक्षरों में सांसे कहां से आ जाती हैं?
 आज के साहित्यिक परिदृश्य पर आपकी कोई प्रतिक्रिया?
- जब से पूर्णिया में बंद हुआ हूं, मेरी नजर दूर तक देखने लायक नहीं रही। हां, किसी हवा के बहने का अहसास तो हो रहा है और लग रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं।
 विवाहेतर संबंध या 'लिव-इन-रिलेशनशिपÓ सेक्स के प्रति नई दृष्टि का आगाज है। साहित्य-जगत में भी इन दृष्टियों से सहमत/असहमत होती ढेरों रचनाएं आ रही हैं। विमर्श किए जा रहे हैं। आप इस तरह की रचनाओं से कहां तक सहमत हैं? आपकी ऐसी कोई रचनाएं?
-नई दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं है अब इस दुनिया में। सारे विमर्श दो हजार साल पहले ही समाप्त हो गए। हां, कोई पुरानी बात किसी नये ढंग से कही जा सकती है। राधा और कृष्ण की प्रेम-लीला से आप सहमत हैं या असहमत? झूठ से असहमत हुआ जा सकता है; रचनाओं से असहमत क्यों होना?
कुछ ऐसी रचनाएं तो हैं मेरी, जिनमें हैं कोई जो 'इसÓ संबंध के लिए छटपटाते हैं, मगर यह उनका दुर्भाग्य कि वे मेरे हिस्से में आ गए और मैं उन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचा नहीं सका।
 श्रीपत जी ने ढेर सारी भाषाएं सीखी थीं। वे भाषाओं के ज्ञान पर जोर देते थे और बंगला उन्होंने घर पर शिक्षक रखकर सीखी थी। क्या हिन्दी के रचनाकारों को भी 'मैसेजÓ मिल सके।
-एक 'टेढ़ेÓ साहित्यकार, जिन्हें वे पसंद नहीं करते थे, के यह पूछने पर कि आजकल क्या कर रहे हैं, श्रीपत जी ने बड़ा टेढ़ा जवाब दिया था, 'करना क्या है! ऐश कर रहा हूं।Ó ऐश किया हो उन्होंने, पर मैं जानता हूं कि वे जीवनभर घोर परिश्रम करते रहे।
श्रीपतजी ने ढेर सारी भाषाएं सीखी थीं। वे भाषाओं के ज्ञान पर जोर देते थे और बंगला उन्होंने घर पर शिक्षक रखकर सीखी थी। मैं तो हिन्दी के रचनाकारों से कहना चाहूंगा कि वे कम से कम बंगला और उर्दू अवश्यक सीखें। उनके अपने लेखन पर इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ेगा। वे भयंकर पढ़ाकू थे। विश्व साहित्य का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया था। पाठक हो तो उनके जैसा। 'कहानीÓ पत्रिका के पास प्रकाशनार्थ आई सारी कहानियों को वे स्वयं पढ़ते थे। उन्होंने ई.एम. फॉस्र्टर की किताब 'आस्पेक्ट्स ऑफ द नोबेलÓ को इक्कीस बार पढ़ा था। किसी भी रचनाकार को एक अच्छा पाठक भी होना चाहिए। वे कहा करते थे कि अपने समकालीनों को अवश्य पढ़ो। उन्होंने अपना समय चित्रकारी में भी लगाया था। वे एक अच्छे चित्रकार थे और मैंने उनसे जाना कि चित्रकार एम.एफ. हुसैन ही उन्हें इलाहाबाद से उठाकर दिल्ली ले गए थे।
 श्रीपत जी कहानी की गुणवत्ता के प्रति काफी संवेदनशील रहे थे। उनके साथ आपका कोई ऐसा विमर्श जो आज भी सामयिक हो? क्या विस्तार से बताएंगे?
-जब श्रीपत जी ने 'कहानीÓ बंद करने का निर्णय लिया, तब मैंने ऐसा नहीं करने का उनसे आग्रह किया था। उनका जवाब था कि अब उनके लिए संभव नहीं हो रहा है 'कहानीÓ के लिए आई सारी कहानियों को पढऩा और उनमें से कहानियों का चयन करना। दूसरों पर इस चयन का भार उन्होंने कभी सौंपा था और उन्हें घोर निराशा हुई थी। उनके पास कहानी की अपनी पहचान थी और वे उस पहचान के अनुसार पत्रिका में छापने के लिए कहानियों का चयन करते थे। उनका कहना था कि चूंकि दूसरों पर भार डालकर वे 'कहानीÓ की गरिमा को सुरक्षित नहीं रख सकते, इसलिए पत्रिका बंद करना उनकी मजबूरी हो गई है।
कमलेश्वर ने अपने एक लेख 'साहित्य का धर्मकांटाÓ में लिखा है, ''...श्रीपत जी निजी अनुभव की बात करते थे और उस पर जोर देते थे। नई कहानी की शब्दावली में यही  'भोगा हुआ यथार्थÓ और 'अनुभव की प्रामाणिकताÓ का आधार बना। ...श्रीपत जी 'पारदर्शी सौंदर्यÓ की बात बार-बार करते थे। वे कहते थे, पारदर्शी सौन्दर्य का होना साहित्य का अधिकार है। इसी से निसृत हुआ था नई कहानी का वामपंथी मानवतावाद, क्योंकि उन्होंने कहानी के लिए तीव्र अनुभूति की बात उठाई थी और 'मर्म तक पहुंचने वाली सहृदय दृष्टिÓ को रेखांकित किया था- कहानी में इसी 'सहृदय दृष्टिÓ की 'तीव्र अनुभूतिÓ ने अन्याय, रुढि़, अत्याचार, अनाचार के विरुद्ध संवेदना का विराट फलक तैयार किया था।ÓÓ
आज कही कहानियों में जो दोष उन्हें नजर आ रहे थे, उसके लिए उन्होंने कहानीकारों को नहीं, सम्पादकों को दोषी माना था। एक सम्पादक को वे बुरी तरह इसलिए कोसते थे कि उसने कहानी विधा ही खराब कर दी थी। एक समय मैंने यह पाया था कि मेरी जान-पहचान के ढेर सारे कथाकार शायद संपादकों की पसंद और मांग को ध्यान में रखकर लगातार अश्लील कहानियां लिख रहे थे।
 'धर्मयुगÓ में पहली बार जब आपकी कहानी प्रकाशित हुई थी, तो वह काफी चर्चित भी हुई थी। संपादक के नाम पाठकों के ढेरों पत्र आए थे। इस संदर्भ में संपादक धर्मवीर भारती के साथ ऐसी कोई स्मृतियां या संवाद जिन्हें आप व्यक्त करना चाहेंगे?
-'नकबेसर कागा ले भागाÓ के छपने के वर्षों बाद मुझे कई ऐसे पाठक मिले जिन्हें कहानी तो अच्छी तरह याद थी, मगर मेरा नाम बिलकुल भूल गए थे? यह कहानी 'धर्मयुगÓ के नववर्षांक में छपी थी। इस कहानी की प्रस्तुति से मुझे ऐसा लगा था कि भारती जी ने मुझे भरपूर प्रश्रय और प्रोत्साहन दिया है। मैंने भारती जी से मिलने का मन बनाया। मेरे भैया उन दिनों मुंबई में ही थे। मेरा वहां अचानक जाना हुआ था और मुझे भारती जी से मिलने का अवसर मिला था।
वहीं बाल्मीकि चौधरी (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पूर्व सचिव) को मैंने किसी से यह कहते सुना कि वे भारती जी से मिलने के लिए लगातार तीन दिनों से प्रयास कर रहे हैं, पर वे मिलने का समय ही नहीं दे रहे हैं। तब भी मैंने 'नकबेसर कागा ले भागाÓ के बल पर उन्हें फोन किया। फोन नम्बर उनके घर का था। मुझसे कहा गया था कि मैं रात के बारह बजे फोन करूं। मैं ढीला पड़ गया, यह कोई मजाक तो नहीं!
मैंने रात के बारह बजे फोन किया। भारती जी ने ही फोन उठाया था और अगले ही दिन मिलने का समय दे दिया। उन्होंने यह तक बता दिया कि बिल्डिंग के किस तल्ले पर मुझे पहुंचना है और उनका कक्ष किधर है। यह टीस अभी तक बनी हुई है कि मैं उनसे नहीं मिल सका। मेरी भाभी के ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ था और वे नहीं बचीं। दुर्भाग्य ने मुझे उनके पास जाने से रोक लिया था। मेरी कहानियां 'धर्मयुगÓ में लगातार छपती रहीं, तब तक छपती रहीं जब तक भारती जी सम्पादक रहे। इस बात का गर्व हुआ था मुझे कि 'धर्मयुगÓ ने पत्र लिखकर मुझसे कहानी की मांग भी की थी।
मैं यह भूलता नहीं हूं कि भारती जी 'धर्मयुगÓ कार्यालय से रात के ग्यारह बजे तक घर आते थे। उनका कठोर परिश्रम मुझे लगातार ऊर्जा प्रदान करता रहा है।
ग्रामीण परिवेश और चरित्रों को लेकर आपकी कई कहानियां और उपन्यास हैं। आपके खुद के गांव का ऐसा कोई पाठक जिन्हें आप याद करना चाहेंगे? या फिर ऐसा कोई संदर्भ?
-अगर मेरी किसी कहानी में कोई परिवार हुआ करता था, तो पथिक कुमार पाल झट पता लगाने बैठ जाता था कि मैंने गांव के किस परिवार की कहानी लिखी है और पता लगा भी लेता था। मेरे इन्कार करने पर भी वह अपनी बात पर अड़ा रह जाता था। वह कितने ही साल गांव से राहत सामग्री लेकर बाढग़्रस्त क्षेत्रों में जाता रहा और मुझे वहां के अनुभव सुनाया करता था। उसके अनुभवों का मैंने अपनी रचनाओं में अच्छा उपयोग किया है।
शाल्हीन के साथ मेरे अंतरंग संबंध रहे हैं। मैं यह तो नहीं कह सकता कि उसने मेरी कहानियां कभी पढ़ी या नहीं, पर उसकी अंतरंगता ने मेरी कई कहानियों को जन्म दिया है। उसके पास विरल अनुभव थे और ऐसे अनुभव वह सिर्फ मुझे सुना सकता था। उसका देहांत हुआ तो मुझे लगा कि मेरे हाथ से मेरा गांव निकल गया।
एक बार मैंने उससे कहा था, ''शाल्हीन, तुमने मुझे करामत का जो किस्सा सुनाया था, उसका उपयोग मैंने अपनी एक कहानी में किया है।ÓÓ उसने कुछ कुछ खतरा महसूस करते हुए घबराहट भरे स्वर में मुझसे पूछा था, ''उसका नाम तो नहीं डाला है न कहानी में?ÓÓ ''नहीं,ÓÓ मैंने खुश होकर जवाब दिया था, ''नाम बदल दिया है; करामत की जगह सलामत कसाई लिखा है।ÓÓ मेरा जवाब सुनकर वह चिहुंक उठा था, ''अरे बाप, सलामत तो उसके बाप का नाम है!ÓÓ
तपन कुमार पाल और रामप्रवेश साह भी मुझे याद आते हैं जो मेरी उपलब्ध रचनाओं को अवश्य पढ़ जाते थे। वे मेरी हर रचना पढऩा चाहते हैं, मगर बिहारीगंज में मेरी रचनाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं।
25. आज का गांव उपभोक्तावादी संस्कृति से अछूता नहीं है। ठस देहातीपन गायब है। इन बदलावों को महसूसती हुई आपकी कौन-सी कहानियां आई हैं?
-उपभोक्तावादी संस्कृति ने हर तरफ अपने पांव पसार लिए हैं। गांवों से गरीबी अभी भी दूर नहीं हुई है, मगर देहातीपन अब धुर गांवों में भी नहीं मिलेगा। इसकी झलक मेरी कितनी ही कहानियां में मिलेगी। मैंने जो देखा, वह लिखा। अभी मुझे अपनी दो कहानियां याद आ रही हैं- खट्टे नहीं अंगूर और बाघिन की सवारी।
समाज और राजनीति के संदर्भ में एक लेखक का क्या दायित्व हो सकता है? इस दिशा में आपकी व्यक्तिगत और रचनात्मक पहल क्या है?
-एक लेखक का दायित्व है लोक-कल्याण के लिए कलम चलाना। उसका काम है नदी पार करने के लिए किनारे खड़े व्यक्ति और समाज को नाव दिखाना, उन्हें नावों तक पहुंचाना। राजनीति भी महज एक नाव ही है। अगर इस नाव में छेद हो गए हैं, तो लेखकों का काम है इन छेदों को भरसक भरना। 'स्वान्त: सुखायÓ की बात आती है, पर यह सुख भी तो तभी मिलता है जब सारे लोग सुखी हों।
मेरी एक कहानी 'दुखिया दास कबीरÓ का एक पात्र है नकछेदी दास। वह उम्र के आखिरी पड़ाव पर है और नि:संतान है। उसने किसी देवी-देवता से अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा, कभी एक बेटा भी नहीं, मगर उसे देश-दुनिया की ऐसी चिंता थी कि वह चिथडिय़ापीर जा पहुंचा था चिथड़ा चढ़ाने और वहां बुदबुदाया था, ''हे पीर बाबा, इतनी विनती है, कोई राजा कभी पागल न हो।ÓÓ सिर्फ बुदबुदाहट ही नहीं सुनी दीना मास्टर ने, यह भी देख लिया कि चिथड़े की तरह अपनी आत्मा को लटका दिया नकछेदी दास ने पीपल के गाछ से। नकछेदी दास की आत्मा को मैंने पीपल गाछ से उतारकर अपने अंदर डाल लिया है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया से लेखकों को कहां तक प्रभावित होना चाहिए? पाठकों को इन दोनों मीडिया-स्रोतों से उपलब्ध साहित्य पर आप क्या कहेंगे? क्या इन दोनों के भविष्य की संभावना पर गौर किया गया है?
-लेखकों या पाठकों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास सूचनाओं के लिए अवश्य जाना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पाठकों का चिपकना संभव नहीं होगा। उन्हें प्रिंट मीडिया के पास ही जाना होगा। अभी जो वैज्ञानिक शोध हुए हैं मैं उनके आधार पर ही ऐसा कह रहा हूं। दोनों के भविष्य सुरक्षित हैं,बिलकुल सुरक्षित।
कहा जाता है कि फिल्म-जगत के एक कैमरामैन को कबाड़-विक्रेता के यहां आपका पहला उपन्यास 'गवाह गैरहाजिरÓ  मिला जिसे पढ़कर वे इतना अभिभूत हुए कि फिल्म 'रुई का बोझÓ बनाई। फिल्म चर्चित भी हुई। क्या आप पाठकों के साथ अपनी इस सुखद रचनात्मक उपलब्धि को महसूसते हुए कुछ खास शेयर कर सकते हैं।
-फिल्म 'रुई का बोझÓ का निर्माण एनएफडीसी एवं दूरदर्शन ने संयुक्त रूप से किया था। पंकज कपूर ने एक बूढ़े का किरदार निभाया है और उनका स्वयं का मानना है कि यह उनके जीवन की सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है, और इसीलिए उन्होंने काफी कम बजट की इस फिल्म में नगण्य पारिश्रमिक पर काम करना स्वीकार कर लिया। रघुबीर यादव, रीमा लागू और कुछ बच्चों ने भी यादगार अभिनय किया है। यह फिल्म इंडियन पैनोरमा (ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ क्कड्डठ्ठड्डशह्म्ड्डद्वड्ड) के लिए चुनी गई जो भारत के अंतरर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का एक प्रमुख हिस्सा था। इस फिल्म की मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के अखबारों में खूब चर्चा हुई। क्या मैं मान लूं कि साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़े किसी भी फिल्म समीक्षक की नजर इस पर आज तक नहीं पड़ी? कितनी ही साहित्यिक पत्रिकाओं के फिल्म विशेषांक प्रकाशित हुए हैं, साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों की चर्चाएं हुई हैं, पर 'रुई का बोझÓ और 'चन्द्रकिशोर जायसवालÓ कहीं नजर नहीं आए। स्वर्गीय बच्चा यादव ने बिहार के एक नामी फिल्म समीक्षक के पास 'रुई का बोझÓ पर एक पूरा आलेख ही लिख भेजा था, पर, पता नहीं क्यों, उन्होंने इस आलेख या सूचना को अनदेखा करना ही बहुत उचित या 'बहुत जरूरीÓ माना।
क्या आपकी रचनाओं पर कोई अन्य फिल्म या टेलीफिल्म बनी है?
-'हिंगवाघाट में पानी रे!Ó पर दूरदर्शन ने एक टेलीफिल्म बनाई थी। श्री हेमंत ने सूचित किया है कि मेरी एक और कहानी पर फिल्म बन रही है। फिल्मकारों के सम्पर्क में श्री हेमंत ही हैं; मैं सम्पर्क नहीं साध पाया हूं। कुछ गंभीर लोगों ने 'सिपाहीÓ (कहानी) और 'सात फेरेÓ (उपन्यास) के फिल्मांकन के लिए मुझसे अनुमति ले रखी है, पर मैं नहीं जानता, वे अभी कितने गंभीर हैं।
आपको कुछ सम्मान भी मिले हैं। उन सुखद क्षणों की आत्मानुभूति में आप पाठकों को कहां तक शामिल करेंगे?
-'सम्मानÓ अब कुछ-कुछ 'अपमानÓ के बराबर हो गया है। लोग तुरंत पता लगाने लगते हैं कि लेखक ने किस तरह 'सम्मानÓ का जुगाड़ बैठा लिया।
एक बार 'सम्मानÓ मिलने पर किसी ने मुझसे 'सम्मान-सुखÓ के बारे में पूछा था और मैंने उनसे कहा था, 'सम्मान देने वाले मेरे परिचित रहे हैं; उन्हें मुझ पर दया आई होगी और उन्होंने सम्मानित कर दिया।Ó सम्मान का सुख मुझे पाठकों के पत्रों और उनके साथ फोन पर हुई बातचीत से मिलता रहा है। यह सुख मेरे पाठकों को पहले मिला, मुझे बाद में।
पुस्तक-संस्कृति के वर्तमान और भविष्य की अवधारणाओं पर कुछ कहना चाहेंगे?
-मेरा तो मानना है कि पुस्तकों का भविष्य सुरक्षित है और पुस्तक पढऩे वाले कभी कम नहीं होंगे।
आप चर्चित कथाकार के साथ अच्छे पाठक भी हैं। कुछ कहानियां और उपन्यास आपको बेहद अच्छे लगे होंगे। उन कृतियों पर कुछ चर्चा करना चाहेंगे?
-मैंने उतना नहीं पढ़ा है जितना आप सोच रहे हैं। जितना पढ़ा है उतना भी अब मुझे याद नहीं आ रहा। हां, मुझे मोपासां, डिकेन्स, खलील जिब्रान वगैरह रचनाकार काफी अच्छे लगे थे। मैं मानता हूं कि सार्वेन्टिस का 'डॉन क्विक्सोटÓ विश्व की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति है। कुछ समय पहले एक सर्वे हुआ था जिसमें विश्व के सौ साहित्यिक महारथियों ने हिस्सा लिया था। इस सर्वे से यह निष्कर्ष आया था कि टॉलस्टाय और शेक्सपियर जैसे रचनाकारों को भी बहुत पीछे छोड़ गए हैं सार्वेन्टिस।
मेरे लिए दूसरी सबसे बड़ी कृति है सतीनाथ भादुड़ी का उपन्यास 'जागोरीÓ। मैं जब-जब सोचता रहा हूं कि वह 'व्यक्तिÓ अपनी 'कृतिÓ से बड़ा है या उसकी 'कृतिÓ अपने कृतिकार से बड़ी है।
साहित्य के मूल में रचनाओं के पाठकीय आनंद का अपना आकाश है जिनकी अपनी संवेदनाएं हैं। इस संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?
- पाठक का आकाश उसकी ग्रहणशीलता और संवेदनाओं के अनुसार घटता-बढ़ता है। यहां उसे समीक्षक की जरूरत पड़ती है। समीक्षक उसे बताता है कि किसी रचना में सौन्दर्य कहां-कहां छिपा है। यह तभी हो सकता है जब समीक्षक पाठकों से अधिक 'गुणीÓ हो। हमारा सौभाग्य है कि हमारे पास प्रबुद्ध और गुणी पाठकों की भारी संख्या है और वे समीक्षकों को मात देते आए हैं।
कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव जी आपकी कहानियों और उपन्यासों के गहरे-पैठ पाठक रहे हैं। इनके द्वारा पठित रचनाओं पर आपकी अनुभूतियां क्या रही हैं?
-राजेन्द्र यादव जी सिर्फ 'हंसÓ के लिए भेजी गई मेरी कहानियां ही नहीं पढ़ते थे, अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरी कहानियां भी अवश्य पढ़ते थे। 'नकबेसर कागा ले भागाÓ उन्होंने मुझसे मंगवाकर पढ़ी थी।
एक बार दिल्ली में एक साधारण गोष्ठी विजय जी (कथाकार)के आवास पर हुई थी। जोगिन्दर पॉल जी आए हुए थे और मुझे अपनीएक कहानी का पाठ करना था मैं तब भौचक रह गया जब देखा कि बिना किसी सूचना के राजेन्द्र जी मैत्रेयी पुष्पा के साथ आ धमके हैं। वे मेरे अच्छे प्रशंसक रहे हैं। एक पत्र में उन्होंने लिखा था, 'आघातपुष्पÓ कहानी के लिए बधाई। बेहद जटिल कथ्य को उठाया है, इस बार। फूलों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बारे में सचमुच इतना जानते हैं आप?ÓÓ यह मुझे मानना पड़ रहा है कि मेरी रचनाओं में उनकी रुचि थी। 'जंगÓ कहानी पढ़कर उन्होंने पत्र लिखा था, ''इधर मैं देख रहा हूं कि आप एक के बाद एक अच्छी कहानी लिख रहे हैं विश्वास है अपनी इस छवि को बनाए रखेंगे और अत्यधिक आत्म-विश्वास में अपने हर लिखे को महान मनवाने की जिद्द के शिकार नहीं होंगे- मेरी शुभकामनाएं हैं।ÓÓ
राजेन्द्र जी का प्रोत्साहन मुझे बराबर मिलता रहा था। एक और पत्र, ''आपके द्वारा की गई दीपनाथ की हत्या की चारों तरफ जो प्रशंसा हो रही है उससे मुझे लगता है कि निश्चय ही आप धर्मसंकट में पड़ गए होंगे। क्योंकि इससे अच्छी कहानी लिख सकने की क्षमता या संभावना मुझे फिलहाल आप में नहीं दिखाई देती और कमजोर कहानी छापकर मैं 'हंसÓ के पाठकों को निराश नहीं करना चाहता। इस धर्मसंकट से निकलने का रास्ता बनाएं।ÓÓ
कमलेश्वर जी से मेरा मिलना नहीं के बराबर हुआ और पत्राचार भी बहुत थोड़ा, मगर मैं जान रहा था कि उनकी नजर मुझ पर है। साहित्य अकादमी में 'चिरंजीवÓ पर आयोजित एक चर्चा-गोष्ठी में उन्होंने कहा था, ''मेरी मेज पर कोई भी किताब दो या तीन दिनों से अधिक नहीं टिकती, पर 'चिरंजीवÓ वहां से हट ही नहीं रहा है।ÓÓ
साहित्य अकादमी के लिए कमलेश्वरजी को सौ श्रेष्ठ कहानियों का चयन करना था। उन्होंने अत्यंत चर्चित 'मर गया दीपनाथÓ या 'हिंगवा घाट में पानी रेÓ की बजाय 'आघातपुष्पÓ का चयन किया था। तब मुझे लगा था कि उन्होंने मेरी ढेर सारी कहानियों को पढ़ लेने के बाद ही इस कहानी का चयन किया है।