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Tuesday 16 Jan 2018

ग्रहों का चक्कर

विनोदिनी गोयनका
गोविन्द हांफते हुए दौड़े-दौड़े अपने ग्राहक के ऑफिस पहुंचे। सीधे उनके चेम्बर में घुसकर देर के लिए क्षमा मांगने लगे। सुबह दस बजे मिलने का समय था। वे कहने लगे- ''दस बजे जब राहू काल समाप्त हुआ तब घर से मैं निकला। आज सड़कों पर इतनी अधिक भीड़ है कि कोई भी सवारी ही नहीं मिल रही थी। बड़ी मुश्किल से एक टैक्सी पकड़कर किसी प्रकार अब साढ़े ग्यारह बजे आपके पास पहुंच पाया हूं।ÓÓ मैंने उन्हें पहले तो पानी पिलाया और फिर पांच मिनट शांति से बैठने के लिए कहा। फिर मेरा ध्यान उनकी उंगलियों पर गया, जिसमें वे कागज पकड़े हुए थे। उनकी सभी उंगलियों में चांदी-सोने में तरह-तरह के पत्थरों की अंगूठियां थीं।  मैंने हंसकर उनसे पूछा- ''ये सब इतनी सारी विभिन्न प्रकार की अंगूठियां आपने महिलाओं की तरह क्यों पहन रखी हैं?ÓÓ तब गोविन्द जी ने बड़े जतन से समझाना आरंभ किया- ''देखिये ये अनामिका उंगली में मूंगा है, जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए पहनी है। बीच की उंगली में पुखराज है, जो बृहस्पति ग्रह के लिए है। तीसरी उंगली में नीलम है, जो शनि देव की साढ़े साती लगी है, उसका निदान है। इस कनिष्का उंगली में रूबी की अंगूठी मेरे जन्म की राशि का पत्थर है और इसे पहनना तो जीवन की समस्त सुख-सुविधाओं के लिए नितान्त आवश्यक है।ÓÓ मैंने उनसे हंसकर कहा कि- ''हम व्यापारी आपके साथ समझौता कैसे कर सकते हैं, जब आप इतने ग्रहों के चक्कर में फंसे हुए हैं।ÓÓ   

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