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Monday 20 Nov 2017

आत्मकथा की परंपरा और दलित आत्मकथा अपने-अपने पिंजरे

सुमित कुमार मीना
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
 बांदरसिंदरी, किशनगढ़ अजमेर; राज
मो. 9929362008
अपने चरित्र का विश्लेषण करना सरल नहीं है क्योंकि यदि लेखक अपने गुणों का वर्णन करता है तो आत्मप्रशंसक कहलाता है, यदि दोषों का उल्लेख करता है तो यह भय बना रहता है कि कहीं श्रद्धालुजनों की श्रद्धा ही न समाप्त हो जाये और यदि वह अपने दोषों का उल्लेख नहीं करता तो सच्चा आत्मकथा लेखक होने का अधिकारी नहीं है। जीवनी में रचनाकार और नायक अलग-अलग व्यक्ति हैं। आत्मकथा में रचनाकार और नायक की भूमिका एक ही व्यक्ति की होती है आत्मकथा में स्वयं के अनुभव को वर्णित करना होता है आत्मकथा में तटस्थ और निरपेक्ष रहने की बहुत बड़ी चुनौती है। आत्मकथा का उद्देश्य अपने जीवनानुभव से दूसरों को परिचय कराना होता है।
हिन्दी में इस वि़द्या का आरंभ बनारसीदास जैन की पद्यात्मक रचना अर्धकथानक(1641) से होता है। किंतु गद्य विधा के रूप में इसकी प्रतिष्ठा आधुनिक युग में ही हुई। स्वामी दयानन्द लिखित जीवनचरित्र (संवत् 1917 वि.), सत्यान्द अग्निहोत्री लिखित मुझ में देव जीवन का विकास (1910 वि.), भाई परमानन्द लिखित आप बीती (1921 वि.), रामविलास शुक्ल लिखित मैं क्रान्तिकारी कैसे बना (1933 ), भवानी दयाल संन्यासी कृत प्रवासी की कहानी(1939), डॉ. श्याम सुन्दरदास रचित मेरी आत्मकहानी (1941), राहुल सांकृत्यायन कृत मेरी जीवन यात्रा(1946), डा. राजेन्द्र प्रसाद रचित आत्मकथा (1947) वियोग हरि कृत मेरा जीवन प्रवाह (1948), सेठ गोविन्ददास कृत आत्मनिरीक्षण (तीन भाग 1958) पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्रÓ रचित अपनी खबर(1960) तथा आचार्य चतुंरसेन शास्त्री कृत मेरी आत्मकहानी (1963) इस विषय की महत्वपूर्ण कृतियां हैं। इसी क्रम में जीवन के चार अध्याय (1966) में प्रेमचन्द ने 'हंसÓ के आत्मकथांक में कुछ साहित्यकारों की संक्षिप्त आत्मकथाएं प्रकाशित की थीं।  
हिन्दी में महत्त्वपूर्ण आत्मकथाएं प्रकाशित हुई हैं इनमें क्या भूलूँ क्या याद करूॅं (1969), नीव का निर्माण फिर (1979), बसेरे से दूर (1978) और दशद्वार से सोपान तक (1985) (चार खण्डों में), हरिवंश राय बच्चन, अपनी कहानी(1990), वृन्दावन लाल वर्मा, मेरी फिल्मी आत्मकथा(1947), बलराज साहनी, यशपाल जैन की आत्मकथा मेरी जीवन धारा(1987), डॉ. नगेन्द्र की आत्मकथा अद्र्धकथा(1988),फणीश्वरनाथ 'रेणुÓ की आत्मकथा आत्मपरिचय (1988) सं. भारत यायावर, रामदरश मिश्र की आत्मकथा समय सहचर है(1990), गोपालप्रसाद व्यास  की आत्मकथा कहो व्यास, कैसी कही(1995) डॉ. रामविलास शर्मा की आत्मकथा अपनी धरती अपने लोग (1996), भगवतीचरण वर्मा की आत्मकथा कहि न जाये का कहिए, नरेश मेहता की आत्मकथा हम अनिकेतन(1995) कमलेश्वर की आत्मकथा जो मंैने जिया, यादों के चिराग (1997), जलती हुई नदी(1999) राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथा मुड़ मुड़ के देखता हूं (2001), अखिलेष की आत्मकथा और वह जो यथार्थ था (2001), भीष्म साहनी की आत्मकथा आज के अतीत (2003), विष्णु प्रभाकर की आत्मकथा पंखहीन, मुक्त गगन में और पंछी उड गया (तीन खण्ड, 2004) आदि हैं।
पिछले कुछ वर्षों में आत्मकथा लेखन की परम्परा में एक उल्लेखनीय बात यह हुई है कि अब लेखिकाएं भी मुक्त मन से आत्मकथाएं लिखने लगी हैं। कालक्रम से देखा जाय तो दस्तक जिन्दगी (1990) और मोड़ जिन्दगी का(1996) इन दो खण्डों में प्रकाशित प्रतिभा आग्रवाल की आत्मकथा सबसे पहले आती है। इसी क्रम में क्रमश: जो कहा नहीं गया(1996) कुसुम अंसल, लगता नहीं है दिल मेरा(1997) कृष्णा अग्निहोत्री, बूंद बावड़ी(1999) पद्या सचदेव, कस्तूरी कुण्डल बसै(2002)मैत्रेयी पुष्पा, हादसे (2005) रमणिका गुप्ता, एक कहानी यह भी(2007) मन्नू भण्डारी, अन्या से अनन्या (2007)प्रभा खेतान, गुडिय़ा भीतर गुडिय़ा (2008) मैत्रेयी पुष्पा, पिंजरे की मैना(2005) चन्द्रकिरण सौनरेक्सा तथा और-और औरत (2010) कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा प्रकाशित हुई हैं।
कुछ दलित लेखकों का ध्यान भी आत्मकथा लिखने की ओर गया है। अपने अपने पिंजरे (भाग-1;1995, भाग-2;200) मोहनदास नैमिशराय, जूठन (1969) ओमप्रकाश वाल्मीकि, तिरस्कृत (2002) तथा संतप्त (2006) डॉ. सूरजपाल चौहान, नागफनी (2007) रूपनारायण सोनकार, मेरा बचपन मेरे कन्धों पर (2009) श्यौराज सिंह बेचैन, मेरी पत्नी और भेडिय़ा (2010) डा. धर्मवीर, मुर्दहिया (2010) डा. तुलसीराम, शिंकजे का दर्द (2012) सुशील टाकभौरे  आदि की आत्मकथाओं ने हिन्दी जगत का ध्यान आकृष्ट किया है ।
दलित लेखकों द्वारा आत्मकथा लिखने में जोखिम भी बहुत हैं। जब शरण कुमार लिम्बाले की पत्नी यह प्रश्न करती हैं कि यह सब लिखने से क्या फायदा? तुम क्यों लिखते हो। कौन अपनाएगा हमारे बच्चों को? 1या ओमप्रकाश वाल्मीकि की पत्नी उनके सरनेम  को लेकर कहती है कि हमारे कोई बच्चा होता तो मैं इनका सरनेम जरूर बदलवा देती 2 तब यह समस्या कितनी गंभीर है, यह सोचने की जरूरत है। लिम्बाले जी कहते है फिर भी मैं लिखता हूं। यह सोचकर कि जो जीवन मैंने जिया यह सिर्फ  मेरा नहीें है मेरे जैसे हजारों,लाखों का जीवन हैै।
मुख्य प्रेरणा यहां मिलती है कि अमानवीय जीवन को जिया। लाखों यातनाओं का सामना करना पड़ा, फिर भी वे यहां तक पहुंचे। ये आत्मकथाएं दलित लेखकों के अदम्य जीवन संघर्ष के साथ आगे बढऩे का संदेश देती हंै। क्योंकि दलित आत्मकथाकार बताना चाहते हैं कि जो नारकीय और दासतापूर्ण जीवन हमें मिला उसमें व्यक्ति विशेष का अपराध नहीं है। दलित आत्मकथा व्यवस्था परिवर्तन की मांग भी करती है।
कवि, समीक्षक, कथाकार, नाटककार मोहनदास नैमिषराय ने जिदपूर्वक स्वतन्त्र लेखन को अपनाया और अपनी दलित संवेदनाओं के कारण लम्बे समय तक उपेक्षित और प्रताडि़त भी हुए। लेकिन हिन्दी दलित साहित्य को स्थापित करने में उनका संघर्ष बेमिसाल है। देशभर के स्तरीय पत्र एवं पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ छपती रही हैं। उनकी आत्मकथा अपने-अपने पिंजरे (दो भाग) किसी हिन्दी दलित लेखक की पहली आत्मकथा मानी जाती है।
              अपने-अपने पिंजरे के प्रथम भाग का प्रकाशन 1995 में हुआ तथा दूसरा खण्ड 2001 में प्रकाशित हुआ था। यह हिन्दी की पहली आत्मकथा है जिसमें भारतीय समाज की वर्ण-व्यवस्था तले दबे दलितों के उपेक्षित जीवन उनकी महत्त्वाकांक्षा, समस्या और संघर्ष को मार्मिकता के साथ चित्रित किया गया है। आत्मकथा में दलितों की गरीबी, अशिक्षा, दलित स्त्रियों के यौन शोषण और बलात्कार आदि की खूब चर्चा की गयी है। दलितों के प्रति हिन्दू सवर्णों के साथ-साथ भारतीय मुसलमानों के कुलीन तन्त्र की भेदवादी दृष्टि का भी रेखांकन हुआ है जो भारतीय समाज का यथार्थ है। दलितों के साथ समाज की मुख्यधारा के सम्बन्ध और व्यवहार का चित्रण आत्मकथा में जगह-जगह देखा जा सकता है। लेखक शहर के जिस गली मोहल्ले में रहता है। वह मुसलमानों का मोहल्ला है पर मुस्लिम समाज भी गुलामों जैसा व्यवहार करता है। इसका उदाहरण आत्मकथा की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है -खतना के अवसर पर बकरे को काटा जाता था। ऐसे अवसरों पर रंडियो को भी बुलाया जाता था। वे रात भर नाचती। इस जश्न में मुसलमान रातभर पान खाते, हुक्के, गुडग़ुड़ाते रंग-बिरंगे, खुशबूदार फूलों के गजरे संूघते वाह वाह करते। उनकी पर्दानशीन औरतें दूर से ही यह सब देखती थी और हमारी जाति के लोग घड़ी घड़ी उनके हुक्के भरते थे। उगलदान अपने अपने हाथों में पकड़े सामने खड़े होते। वे कब थूके पता नहीं। जब भी वे थूकते झट से उगलदान आगे कर देते थे, पर पान को हाथ न लगाते थे। जो चीज वे खाएं, उसे छूने का अधिकार नही था। पान खाना उन दिनों बड़ी बात समझी जाती थी, जिसे तथाकथित बड़े लोग ही खाते थे हमें सार्वजनिक रूप से पान खाने की मनाही थी। 3
अपने-अपने पिंजरे में लेखक के जन्म स्थान मेरठ शहर में चमारों की बस्ती और उनके जीवन के कटु मधु अनुभवों का अंकन हुआ है। इसके माध्यम से लेखक ने यह दिखलाना चाहा है कि चाहे गांव हो या शहर सवर्णों की बस्ती हो या मुस्लिमों की। दलित हर जगह अपमानित होता है उसका जीवन देश के हर कोने में शोषित, पीडि़त, अपमानित और प्रताडि़त है। भारतीय समाज की विषम संरचना और मनुवादी व्यवस्था ने उसे हर जगह छटपटाने के लिए छोड़ दिया है।
आत्मकथा का केन्द्र लेखक का शहर मेरठ है इसके दूसरे भाग में लेखक ने दिल्ली और कोलकाता सहित उन तमाम स्थानों के अनुभवों को समेटा हैं जहां उन्हें रहने का मौका मिला है। मेरठ के चमार गेट में जन्मे,पले-बढ़े लेखक को चमार गेट की दिनचर्या खूब मालूम है। यहां के चमारों की विभिन्न आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, बेगारी और शोषण के अन्य प्रकारों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया गया है। लेखक का परिवार अपनी छोटी जातियों में अपेक्षाकृत सम्पन्न अवश्य है, किन्तु जाति के कारण उन्हें पग-पग पर अपमानित प्रताडि़त और पीडि़त होना पड़ता है। जातिजनित अपमान बोध उनका हर जगह पीछा करता है। अपनी पीड़ा को लेखक ने इन शब्दों में व्यक्त किया है -पीढ़ी दर पीढ़ी हम गुलाम थे। इधर मां बच्चा जनती और उधर पैदा होने वाले बच्चे के माथे पर उसकी जाति लिख दी जाती। उसे उसकी जात की पहचान से रूबरू करा दिया जाताÓÓ। 4
आत्मकथा में उठाया गया संस्कृति का सवाल अत्यन्त महत्वपूर्ण है। असल में नैमिषराय जी यही प्रबोधन अपनी कौम और तमाम दलित समाज को देना चाहते हैं कि अपने आपको पहचानो अपनी संस्कृति की खोज करो। हिन्दू समाज की वर्ण-व्यवस्था ने सम्पूर्ण भारतीय समाज को वर्ण और जातियों में विभक्त कर दिया है। शाम को मंदिर में आरती होने के बाद पुजारी मंदिर के आंगन में आकर प्रसाद बांटता था... वह हमेशा ऊपर हाथकर प्रसाद बांटता... एक दिन प्रसाद देते हुए पुजारी की अंगुलियां मेरे हाथ से छू गई। बस पुजारी का पारा चढ़ गया। नाराज होते हुए वह झल्लाया। तू चमार का है ना सब कुछ भरस्ट कर दिया कितनी बार कहा तुम ढारो से प्रसाद दूर से लिया करोÓÓ। 5
अपने-अपने पिंजरे की कथावस्तु में उन्होंने दलित जीवन की एक महत्वपूर्ण समस्या को उठाया है कि जाति के कारण ही अपमानसूचक शब्द जो कल तक गांव और कस्बों में ही कहे जाते थे अब महानगरों में भी कहे जाने लगे।
प्रमुख दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन में चूहड़ों की बस्ती के ऐसे परिवार का वर्णन है जिसमें पांच भाई, एक बहिन, दो चाचा और एक ताऊ थे। घर में बच्चे-बूढ़े सभी कोई ना कोई काम करते थे फिर भी दो जून की रोटी किसी प्रकार ही जुटा पाते थे। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने मुजफ्फर नगर के बरला नामक गाँव के दलितों के शोषण को व्यक्त किया है ।
खान-पान बहिष्कार की परम्पराएं शहरों की अपेक्षा गांवों में वर्तमान में भी अपने पुरातन रूप में कायम है। बहन को उसके गांव से बुलाने गये तो भाई के साथ आते समय रास्तें में तेज प्यास से गला भी सूख रहा था। भाई ने पड़ोस के गांव के एक घर से पानी मांगा। जाति का पता चलने पर जानवरों की भांति भगा दिया फिर मजबूरन गंदे जोहड़ (गड्ढे) में भरे हुए पानी को पीकर प्यास बुझानी पड़ीÓÓ। 6
गैर दलित जातियों की तरह भारतीय दलित भी विभिन्न जातियों व समुदायों में विभक्त हंै। इनकी विभिन्न उपजातियों की पीड़ाएं भी बहुरूपी हैं। चतुर्थ वर्ण से बाहर की अस्पृश्य जातियों में अस्पृश्यता के साथ-साथ अर्थाभाव  मुख्य समस्या रही है। सामाजिक स्थिति समान होते हुए भी वैयक्तिक व पारिवारिक स्तर पर एक आत्मकथा दूसरी आत्मकथा से एकदम भिन्न है। अत: दलित आत्मकथाओं को दलित समाज के दस्तावेज कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अपने-अपने पिंजरे की भाषा शैली उपन्यासात्मक है। लेखक ने पूरे मेरठ के चमारों की पीड़ा का विस्तार से यथार्थ शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है। नैमिशराय जी अपने वर्गीय यंत्रणा को लेकर पूरी आत्मकथा में चिंतित दिखाई पड़ते हैं ।
संदर्भ:-                         1. ओमप्रकाश वाल्मीकि, जूठन, पृ. 151
2.शरण कुमार लिंबाले, अक्करमाशी पृ.9
 3.अपने अपने पिंजरे, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 20
 4.वही पृष्ठ 17
 5.वही पृष्ठ 31
 6.वही पृष्ठ  53।  ठ्ठ