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Wednesday 22 Nov 2017

आधुनिक मलयालम कविता के संक्रान्ति पुरुष : वैलोपिल्लि

डॉ.सी.जे.प्रसन्नाकुमारी
गुरुवरम, हाउस न.40
कैरली नगर
कुरावेन कोनम
केरल- 695003
आलोचकों की दृष्टि में मलयालम कविता के गजराज, अजेय शिल्पचातुरी के अधिकारी, केरल के ग्राम्य सौन्दर्य के पुजारी एवं समष्टि के वक्ता रहे श्री वैलोपिल्लि श्रीधर मेनोन। एक तूफान के रूप में अवतरित गन्धर्व गायक चङ्गम्पुषा, स्वानुभूति की संगीत लहरी में विचारण करने वाले पी. कुंजिरामन नायर एवं ज्ञानपीठ विजेता जी. शंकर कुरुप्प की काव्य प्रतिभा से अलंकृत मलयालम कविता में इन महानुभावों की काव्य प्रतिभा से टकराकर वैलोपिल्लि ने मानवीयता संपन्न कविताओं का प्रणयन करके, काव्य जगत में धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बना ली। रोमान्टिक काव्यधारा के सौन्दर्य एवं प्रगतिशील काव्यधारा के ग्रामीण यथार्थ के मणिकांचन योग के सन्तुलन से बनी उनकी कविता मां कैरली के कंठहार की अमूल्य मणियां हैं।
मलयालम काव्य जगत में ''श्रीÓÓ नाम से विख्यात श्री वैलोपिल्लि श्रीधर मेनोन का जन्म बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण यानि सन् 1911 मई को केरल के एरणाकुलम जिले के कलूर के कलप्पुरक्कल परिवार में कलपुरक्कल नाणिकुट्टी अम्मा और चेरानल्लूर कोच्चुकुट्टन कर्ताव के सुपुत्र के रूप में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कलूर के कारप्परम्ब सरकारी प्राइमरी स्कूल में सम्पन्न हुई। सन् 1927 में एरणाकुलम के सेन्ट एलबर्ट हाईस्कूल से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। महाराजास कॉलेज एराणाकुलम से भौतिक शास्त्र, वनस्पति विज्ञान और रसायन शास्त्र विषय लेकर उन्होंने इंटरमीडियेट परीक्षा पास की। आर्थिक अभाव के कारण डॉक्टर बनने की उनकी इच्छा अधूरी रही। फिर सन् 1931 में बी.ए. डिग्री और मद्रास से बी.टी. परीक्षा पास करने के बाद वे त्रिशूर जिला के कण्टशानकटव सरकारी स्कूल के अध्यापक बने। बच्चों से प्यार एवं अध्यापन वृत्ति ने उन्हें आत्मतृप्ति प्रदान की। दीर्घकालीन अधयापकीय जीवन के बाद त्रिशूर जिले के ओल्लूर सरकारी हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक के पद से सन् 1966 में वे सेवानिवृत्त हुए।
सन् 1955 में श्रीमती भानुमती अम्मा से उनका विवाह सम्पन्न हुआ। यद्यपि उनके वैवाहिक जीवन का प्रारंभ उल्लासमय रहा, बाद में उस दाम्पत्य जीवन में कांटे उगने लगे। परिणाम हुआ कि कवि त्रिशूर में किराए के घर में स्वयं खाना पकाकर एकान्त जीवन बिताते रहे। दिसम्बर 22 सन् 1985 को मस्तिष्काघात के कारण मित्र डॉक्टर टी.ए. राधाकृष्ण के घर में उनकी मृत्यु हुई।
कवि वैलोपिल्लि बचपन से अल्पभाषी और आत्मसीमित रहे। अपने काव्य जीवन के श्रीगणेश के संबंध में कवि ने स्वयं लिखा है- ''कविता के प्रति मेरे आंतरिक नेत्र खोलने का अपूर्व अनुभव बचपन में हुआ। स्कूल में सीधे सड़क से होकर जाने के बदले छोटी-छोटी पगडंडियों से होकर चलते थे ताकि जल्दी स्कूल पहुंच जाए। उस समय का साथी था हरेक कक्षा में दो-तीन साल बैठने वाले पत्तू अम्मावन (पद्मनाभन) जो पड़ोसी थे। इस यात्रा के बीच पत्तू अम्मावन केरल पाणिनी नाम से विख्यात मलयालम के प्रतिभावान कवि एवं वैयाकरण ए.आर. राजराजवर्मा द्वारा अनूदित 'कामदहनमÓ नामक कविता ताल लय के साथ जोर से गाया करते थे।ÓÓ1 इस कविता की वैलोपिल्ली में ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि वे किसी स्वप्नलोक में पहुंच जाते। कालिदास की प्रतिभा से मातृभाषा के माध्यम से इस प्रकार अवगत बने कवि के लिए कवितापाठ मनोरंजन का विषय बन गया। केरलवर्मा कवलियकोयि तंपुरान द्वारा अनूदित 'शाकुन्तलम्Ó और मलयालम के जनप्रिय कवि कुञ्चन नंपियार के 'कृष्ण चरितम्Ó ने कवि को ओज प्रदान किया। कवि के शब्दों में- ''शाकुन्तलम के अनुकरण में पहले मिट्टी में, बाद में कॉपी में लिखकर मैंने फाड़कर फेंका। यह श्लोक नाटक ही मेरी पहली कृति है।ÓÓ2 महाराजास कॉलेज के माहौल ने उन्हें मलयालम काव्य जगत की ओर मोड़ लिया। वैलोपिल्ली श्रीधर मेनोन जैसे महाकवि को मलयालम काव्य संसार के लिए प्रदान करने का श्रेय महाराजास कॉलेज के प्राध्यापक कुट्टिप्रुरत्तु केशवन नायर को है।
कवि ने स्वयं स्वीकार किया है कि ''काव्य सर्जना के लिए वटक्कन 'पाट्टुकलÓ ने मुझे मां का दूध पिलाया।ÓÓ3 कवि वैलोपिल्लि की विशेषता रही कि वे कभी अहंग्रस्त नहीं रहे। अपने दीर्घकालीन काव्य जीवन में उन्होंने कैरली के लिए कई काव्य संकलनों का समर्पण किया। प्रथम काव्य संकलन 'कन्नि कोइत्तÓ (भ्राद्रमास की फसल कटाई) से अंतिम काव्य संकलन 'मकर कोइत्तÓ की (पूस की फसल कटाई)  तक कृतियों में विभिन्न भावभूतियों का अंकन करने वाली 440 से ज्य़ादा कविताएं संकलित हैं। उनके अन्य काव्य संकलन हैं- वित्तुम कैकोट्टुम (बीज और कुदाल 1956), कडल काक्ककल (1958, सागर के कौए), विडा (बिदा), श्रीरेखा (1950), कय्प वल्लरी (करेले की बेल 1968), ओणप्पाट्टुकार (ओणगायक 1952), परिणाम गाथा, कृष्णमृगङल (कृष्णमग), कन्निमण्णिकल (चावल की पहली मणि 1954), कुरुविकल (गौरये 1961) और वैलोपिल्ली कवितकल (वैलोपिल्ली की कविताएं) (1952)। 'कुडियोषिक्कल (बेदखली) वैलोपिल्ली द्वारा प्रणीत खंडकाव्य है। उन्होंने 'मृत संजीवनीÓ नामक एक काव्य नाटक, ऋषिश्रुंगनु अलक्सान्डरुम् (ऋष्यश्रृंग और सिकन्दर) नामक एक नाटक, काव्यलोक स्त्रणकल (काव्यलोक की स्मृतियां) नामक आत्मकथा जैसे अपूर्व फूलों से देवी कैरली की अर्चना की। श्री वैलोपिल्लि श्रीधर मेनोन ने बाल साहित्य कृतियां रचकर इस आक्षेप को तोडऩे का सफल प्रयास किया कि वे वात्सल्यहीन पिता रहे। 'कुन्निमणिकलÓ (गुजा फल, 1954), सन् 1981 में लिखित पच्चेकुतिरा (टिड्डी), मुकुलमाला (1984) और मिन्नामिन्नी (1984) (जुगनू) उनकी बाल साहित्य कृतियां हैं। शिशुओं की भाषा से अलंकृत इन काव्य संकलनों में काव्य देवता नृत्य कर रहे हंै। ऊर्जा, ईष्र्या, जिज्ञासा, कौतुहल जो बच्चों का जन्मजात गुण है, कवि में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। बुजुर्ग होकर, जीवन का कडुवापन पीकर भी कवि अपना बालपन बनाए रखने में सफल हुए जो उनकी बाल कविताओं का प्रेरक रहा। ये बाल कविताएं असल में मातृ-पितृ वात्सल्य के जीवन्त होने का प्रमाण हैं।
आजीवन अकेलेपन के शिकार बने वैलोपिल्लि श्रीधर मेनोन की कविताएं, उनके तटस्थ आलोचक प्रो. एम.एन. विजयन के शब्दों में 'एक अधूरे मनुष्य की पूर्ण कविता है।Ó1मलयालम के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि जी. शंकर कुरुप, गंधर्व गायक चङम्प्पुषा कृष्णपिल्लै तथा इडापल्ली राघवन पिल्लै जैसे कवियों के भौतिक तथा ऐतिहासिक सामीप्य से अनुग्रहित वैलोपिल्लि मलयालम कविता के संक्रांति पुरुष रहे। रोमांटिसिज्म एवं यथार्थवाद का संगम स्थल है उनकी कविता। जहां एक ओर उनकी कविता में स्वानुभूति का सुन्दर परिवेश है,भावना का स्वर्ग है, दूसरी ओर मिट्टी की गंध एवं ग्रामीण जिन्दगी से प्राप्त समग्रता का दर्शन है। वैलोपिल्ली क्लासिक परंपरा से आकृष्ट रहे इसलिए रोमांटिक-यथार्थवादी काव्य प्रवृत्तियों का संघर्ष उनकी कविता में दिखाई देता है। उनके 'कन्नि कोयत्तुÓ (1947) की एक कविता ''आयिरत्तोन्नु रावुकलÓÓ (एक हजार एक रातें) की पंक्तियां देखें-
'आ मट्टु यौवन पल्लवत्तिल
पूविट्ट नालवन् पाट्टु पाटी
प्रणयसरित्तिन् तडत्तिल मेवुम्
तृणभुवि ञानुमेन्नोमलालुम्
ओरु तृण तंडिनालोमनक्कैय
मरतकमोतिरम्    ञानोरुक्कुमÓ
(इस प्रकार यौवन के पल्लव में कली आ गई तो वह गाने लगे। मैं और प्रेयसी प्रणय सरिता के तट में उगे तृण के समान हैं। एक तृण से अपनी प्रेयसी के लिए मैं मरतक की अंगूठी बनाऊंगा।)
काल्पनिक कवि वैलोपिल्ली का प्रिय विषय रहा प्रणय। यथार्थवादी काव्य दृष्टि ने उन्हें सपने बुनने वाली कृषक युवती और अपने पट्टेधारी की सांवली बेटी से प्रणय संबंध स्थापित करते हुए कविता लिखने की प्रेरणा दी। यहां मध्यवर्ग का प्रतिनिधि कवि मजदूर के साथ है कवि का प्रेम भी ग्रामीण है-
'ताणवर्गत्तिलाकिलुम स्वच्छ
मानस ग्रामपुष्पम निन्ने
मोतिर कैपिडिच्चु ञानेट्टुम्
मे दुरप्रेममेन्ट नाकत्तिल्
मरुमादर्श शुद्धितन् मुन्निल्
मानवक्केडु नीतिकलेल्लाम्Ó
(निम्न वर्ग पर जन्म लेने पर भी हे स्वच्छ मानस वाली ग्रामीण पुष्प! तुम्हें मैं हाथ पकड़कर अपने प्रेम स्वर्ग पर ले आऊंगा। इस आदर्श शुद्धि के सामने मनुष्य निर्मित निचली नीति जरूर बदल जाएगी।)
यहां सांवली निम्न वर्ग की युवती से प्रणय संबंध स्थापित कर उसे पत्नी बनाने की कवि की प्रबल इच्छा एवं समाज की प्रचलित जाति नीति के प्रति कवि का वैमनस्य साकार हो उठा है।
'कन्निकोइतÓ में संकलित कविता है मांपषम (आम)। यह वैलोपिल्लि की कवितावल्लरी में अंकुरित अद्भुत कलाशिल्प का पका फल है। 'वित्तुम कैकोट्टुमÓ (बीज और कुदाल) की अधिकांश कविताएं यथार्थवादी चेतना से सम्पन्न हैं। ''श्रीरेखाÓÓ संकलन की 'कृष्णपरुन्तÓ (कृष्ण बाज) शीर्षक कविता का कवि रोमन्टिसिज्म और यथार्थवाद के संघर्ष से ग्रस्त है। युक्तिवाद की धूप एवं काव्य भावना की चांदनी के बीच के संघर्ष से अभिभूत है 'कट्टल काक्ककलÓ (समुद्र के कौए) का कवि। ऐसे संदर्भों में रोमांस और यथार्थवाद के बीच कवि का व्यक्तित्व पूरी तरह निखर उठता है। 'विटाÓ (बिदा) शीर्षक काव्य संकलन में मानव चेतना की ऊर्जा एक सायंकालीन दीप्ति की ओर प्रयाण करती दिखाई देती है। अत: वैलोपिल्लि कविता का सायंकालीन विश्वास है ''विटाÓÓ। ''कन्निकोइतÓÓ, (भाद्र की फसल कटाई) ऊंञाल (झूला), मलतुरक्कल (टीले में सुरंग) में आशावादी दृष्टिकोण के साथ मृत्यु की पिटाई करके दूर फेंकने वाला कवि यहां मृत्यु के पक्ष में बोलता है। 'विटाÓ तो कवि के उतार का प्रथम चरण है। 'मकर कोइतÓ में आपातकाल में लिखी कई कविताएं संकलित हैं। 'परिणामदाथाÓ काव्य संकलन की उसी शीर्षक की कविता केरल के नकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की ओर इशारा करती है। पी.ए. वारियर ने 'कटल काक्ककलÓ के कवि को हड्डीबल रखनेवाला कवि बताया है।Ó5
'मृत संजीवनीÓ नामक काव्य नाटक में कवि ने साधना के बल पर दर्शन को भावी मानव के लिए आशा के किरण के रूप में विकसित किया। सप्तति तक पहुंचे कवि द्वारा मनुष्य मन की शुद्धि करके बनाए समाज के लिए हितकारी उत्कृष्ट फल है यह कृति।
वैलोपिल्लि ने अपने गीतों को डायरी कहा है। लघुता में भी सम्पूर्णता से सम्पन्न उत्तम रचनाएं हैं उनके गीत। इन गीतों की पूर्णता के भीतर जीवन सत्य की धड़कन सुनाई देती है। कवि ने लिखा है- 'छोटी-छोटी चीजो के प्रति मेरा चिरकालिक मोह, बातों को ध्वनित करके संक्षिप्त बनाने का कौतुहल, सब गीत जैसी रचना विशेष की ओर मुझे ले गया।Ó6
वैलोपिल्ली कविता का शिल्पपक्ष अजेय है। एक हिरण के भोलेपन का सौन्दर्य वैलोपिल्ली की कविता में है।
अपने जीवनकाल में ही वैलोपिल्लि श्रीधरन मेनोन अनेक पुरस्कारों से पुरस्कृत हुए। सन् 1947 में प्रकाशित 'कन्निकोयत्तÓ के लिए उसी साल मद्रास सरकार का पुरस्कार प्राप्त हुआ। सन् 1951 में काव्य संकलन 'श्रीरेखाÓ के लिए एम.पी. पॉल अवार्ड मिला। उनका काव्य संकलन 'कय्पÓ वल्लरीÓ सन् 1965 में केरल साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुआ। उनका महत्वपूर्ण खंडकाव्य 'कुडियोषिक्कलÓ सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से पुरस्कृत हुआ। 'विडाÓ नामक काव्य संकलन के लिए सन् 1971 में 'ओडक्कुषल अवार्डÓ और 1972 में  साहित्य अकादमी अवार्ड प्राप्त हुआ। यह काव्य कृति सन् 1977 में एस.पी.एस. अवार्ड से सम्मानित हुई। उनका अंतिम काव्य संकलन 'मकर कोइतÓ के लिए सन् 1981 का 'वयलार अवार्डÓ मिला। सन् 1981 दिसंबर बीस को केरल साहित्य अकादमी ने महाकवि वैलोपिल्लि श्रीधर मेनोन का अभिनंदन और सम्मान किया।
संक्षेप में रोमान्टिक काव्यधारा की दुर्बलता एवं यथार्थवादी काव्यधारा की अकाव्यात्मकता के बीच संक्रांति सौन्दर्य की अपूर्व शोभा बिखेरकर वैलोपिल्लि मलयालम काव्यजगत में उदित हुए। महिमामय सृजन में आत्मांश के साथ बौद्धिकता का मिश्रण आवश्यक है। भावना विचारात्मकता की ओर प्रयाण करके सच्ची कविता को जन्म देती है। इसलिए तो वैलोपिल्लि मलयालम के शीर्षस्थ कवियों के आसन में आसीन हैं। वैलोपिल्लि की कविता का सौन्दर्य उसकी शीतलता नहीं, बल्कि गर्मी है। वे प्रकाश के कवि हैं, अंधकार को प्रकाश में बदलने की क्षमता उनकी कविता में है। मिट्टी के फूल और आकाश के प्रिय नक्षत्र के रूप में अपने काव्यजीवन को परमोन्नति तक पहुंचाने वाले कवि वैलोपिल्लि मां कैरली के वरद् पुत्र हैं।
संदर्भ
1. एम.एल. कुरुप वैलोपिल्ली की जिन्दगी- एक झांकी (कन्निकोइत्त से मकरकोईत तक)
2. वही
3. वित्तुम कैकोट्टुम- भूमिका- मेरी कविता।
4. वैलोपिल्लि, ओख्कुम्पोल (जब वैलोपिल्लि की याद आती है)- अकम्- 1986 मार्च
5. कटल काक्ककल - भूमिका
6. कुरुविकल - भूमिका