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Saturday 18 Nov 2017

गज़लें

हितेश व्यास
1, मारुति कॉलोनी, पंकज होटल के पीछे, नयापुरा, कोटा-324001 (राजस्थान), 9460853736
(1)
गिरते-गिरते संभल जाइयेगा
बस इसी तरहा निकल जाइयेगा

नंगे तारों का हुआ है इंतजाम
छूते-छूते ही उछल जाइयेगा।

राख भी है और यहां पानी भी है
बुझते-बुझते भी तो जल जाइयेगा।

इक अदद सूरज की खातिर कृपया
चांद तारो! अब तो ढल-जाइयेगा

देवता हो तुम तो पत्थर रहियेगा,
आदमी हो तो पिघल जाइयेगा।

(2)
जो अधूरी बात थी वो मन में
कुछ चुभो गई
इसीलिए तो कहते-कहते तुम
भी चुप सी हो गई

वो पूरी-पूरी बातों का जो चल रहा था सिलसिला
बस इक अधूरी बात ही से
सब अधूरी हो गई

बा$की अधूरी बात अब तुम कहो न कहो
पिछले पूरेपन में ये भी पूरी हो गई

तुम विस्तारती रही मैं समेटता रहा
सिमटी हुई-दूरियों में दूरी हो गई

स्वयं के कारणों से ही बढ़ गई थीं दूरियां
वो सारी दूरियां अब तो दूरियों
में खो गई।

हवा चली तो यूं लगा कि कुछ
घुटन ही कम हुई
मगर हवा तो ते थी वो नाव ही डुबो गई।

(3)
हवा में कोई भी सिक्का उछाल
और फिर देख
रगों में खून को पहले उबाल
और फिर देख

हमेशा कुछ अलग अंजाम होगा हालत का
रा मशीन में सिक्के डाल
और फिर देख

बहुत $करीब से ऐ दोस्त हमला होता है
जो हो सके तो तू इज्ज़त संभाल
और फिर देख

बहुत जरूरी है मजमा यहां पे जीने को
तू हाथ झोली से बाहर निकाल
और फिर देख

तुझे खुद अपनी ही सूरत से घिन सी आएगी
तू अपने सच को भी पत्थर में ढाल और फिर देख