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Saturday 18 Nov 2017

गजल

 

ज़ाहिर कुरैशी
108, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने
गुरुबक्श की तलैया, पो.ऑ. जीपीओ,
भोपाल- 462001 (म.प्र.)
मो. 09425790565
 (1)
एकजुटता को माने मिले,
जब भी ताने से बाने मिले।

उनकी यादों की बारात में
दोस्त... बरसों पुराने मिले!

रात भर जश्न चलता रहा,
भोर तक नाच-गाने मिले।

पंछी लालच में फंसने लगे,
जिस जगह चार दाने मिले।

मुक्त औरत के मन में भी आज,
अनगिनत $कैदखाने मिले।

देखते ही बहुत खुश हुआ,
तीर को जब निशाने मिले।

गहरे सागर के पाताल में,
डूब कर ही ख•ााने मिले!

(2)
पेड़ आंगन के काम आ गया,
प्यार जीवन के काम आ गया।

देह नर्तन के काम आ गई,
कंठ गायन के काम आ गया।

उसमें सर्जन की प्रतिभा न थी,
वो प्रबंधन के काम आ गया!

लक्ष्य तक ले गया तीर को,
जोश युव-जन के काम आ गया।

उससे ऐसी न उम्मीद थी,
दोस्त दुश्मन के काम आ गया!

रस्मी संकोच करने के बाद,
हाथ कंगन के काम आ गया।

सोच जिसका पुराना न था,
वो नयेपन के काम आ गया।
(3)
शीरीं-फरहाद को डर हुआ,
प्यार जब भी उजागर हुआ!

तो चिपकने लगीं चींटियां,
आदमी जब भी शक्कर हुआ।

पहले, निन्दा हुई सत्य की,
बाद में, उसका आदर हुआ।

साम्प्रदायिक समारोह में,
सांस लेना भी दूभर हुआ!

सारी बस्ती है इसकी गवाह,
जो तमाशा सड़क पर हुआ।

बीवी-बच्चों के मुख देखकर,
दिन-ब-दिन वो भी कायर हुआ।

उस सदी में, 'सिताराÓ था वो,
इस सदी में, 'धरोहरÓ हुआ!

(4)
वे जो मित्रों में शामिल रहे,
शक के घेरों में शामिल रहे!

शब्द से भी अधिक कुछ विचार,
भावनाओं में शामिल रहे।

चित्रकारी में चेहरे तमाम,
कुछ लकीरों में शामिल रहे।

छिंगलियों को कटाने के बाद,
वे शहीदों में शामिल रहे!

जो थे दिन भर उजालों के साथ,
रात.. अंधेरों में शामिल रहे।

लक्ष्य को बेधने के लिए,
लोग तीरों में शामिल रहे।

आज भी सूत्र विश्वास के,
सात फेरों में शामिल रहे!