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Thursday 23 Nov 2017

दिन में नाम लिखो


अनूप अशेष
द्वारा- अतुल मेडिकल स्टोर, हॉस्पिटल रोड
सतना-485001 (म.प्र.), मो. 09424934472
रातों के गीले सपने
दिन के नाम लिखो,
नंगी देह
भूख से पीली
रिन के नाम लिखो।।
मुसहर मरा खेत के भीतर
केवट तालों में,
काई इतनी गझिन
हो गई
उलझी बालों में।
लाखों के नीले सपने
घिन के नाम लिखो।।
रिन के ऊपर एक केकड़ा
पंजों को काटे,
पूंजी का इतिहास
गरीबी
बार-बार बांटे।
रोटी के छीले सपने
पिन के नाम लिखो।।
काटे गए अंधेर वन में
पैदल-पांवों वाले,
नाम बिना
पहचान बिना
फूटे ये छाले।
हत्या किए कबीले सपने
इनके नाम लिखो।।

छाया टूट गई

हमें बताया गया
हमारी छाया टूट गई।।
हम तो बजे-बजाए
खाली सूपों के टोटके,
आधी-रात
देबारी वाली
बड़े घरों के टोटके।

नई धान जैसे ओखली में
दुपहर कूट गई।।
मोटी-मोटी पीठ हमारी
नीची-नीची आंख,
चिडिय़ा जैसे
पंख छोड़ती
घूर-घुरहरे राख।
पानी बिना रेत की मछली
चढ़कर रेत गई।।
छोटे पांव बड़े दरवाजे
ढोलक से बजते,
बिन कजरौटे के
काजल-से
घुटनों में अंजते।
छोड़ी हुई डकार पहनकर
हम पर बूट गई।।
होलिका की रेड़ है चुप

पिता चुप हैं
चुप हैं अम्मा
बहन-भाई चुप।।
ओसारे का बांस पकड़े
बांस जैसे हाथ चुप,
खुरचती
नाखून से भीती
भीती टिका एक माथ चुप।
अन्न-पानी
नोन-मिर्ची
सब गए हैं छुप।।
हवा ओढ़े सांस है चुप
पेड़ हैं चुप,
आग मुट्ठी में
दबाए
होलिका की रेड़ है चुप।
देव-दानव
असुर साधू
में अंधेरे धुप।।

कैसी भीड़ लगी

कहो, तुम्हारे घर के बाहर कैसी भीड़ लगी
कहो, तुम्हारे मन के भीतर
कैसी भीड़ लगी।।
तुम तो एक गरीब आदमी
के चेहरे-से हो,
पीड़ा के मंगल-क्षण वाले
एक सेहरे-से हो,
नींद भरी जागी-जागी सी ये गीली आंखें
एक सपने के मरने पर
कैसी भीड़ लगी।।
उंगली तुम दे दिए पेड़ को
गए सभी काटे,
अपने हिस्से धूप रखे हो
प्यास और चांटे।
कभी सितारे चमके होंगे तन में भी मन में
आज सितारों के गिरने पर
कैसी भीड़ लगी।।
चमरौंधे-से फटे हुए हो
पूरे आदमकद,
खून निचोड़ी सूखी काया
में भी हो गद्गद्।
इस दलदल के भीतर एक छोटा-सा पत्थर है
इसको और धंसाने खातिर
कैसी भीड़ लगी।।