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Tuesday 22 Jan 2019

चांदनी : कुछ कविताएं

आनंद स्वरूप श्रीवास्तव
कवितांगन, एम-2/85, जवाहरविहार
रायबरेली (उ.प्र.)-229010
मो. 09305702051


(1)
चांदनी में एक साथ
क्या-क्या है
यह जानना भी बेहद जरूरी है।
चांदनी की आभा में
उसकी भौतिक कारा तो है ही
आत्मबोध का विस्तार भी है
अर्थों की पगडंडियां खोजती
जब चांदनी धरती पर उतरती है
और कहीं बीहड़ों में भटक जाती है
तो क्लान्त, उद्विग्न हो
छटपटाती भी है
चांदी के गान में
स्पन्दन भी है उद्वेलन भी है
उसकी रातों में
सपनों का सजना भी है
मिटना भी है
उसके अनुपम मायाजाल में
मदिरालय की प्याली भी है
खेतों की हरियाली भी है
चांदनी में एक साथ
और क्या-क्या है
यह जानना बेहद जरूरी है।

(2)
तारों भरा थाल
तुम्हारे पास है
क्षितिज का फैला साम्राज्य
भी तुम्हारे पास है
दूर-दूर तक रंग बदलते बादल
और सुहानी हवाओं की रफ्तार
तुम्हारे पास है
इतना ही नहीं
एक खूबसूरत हंसता हुआ चांद भी
तुम्हारे पास है
फिर इन सबका साथ छोड़
हर वक्त क्यों भागने की जुगत में
रहती हो चांदनी?

क्या तुम सुदूर देशों में
बस जाना चाहती हो
एक समान अमीर-गरीब से
जा मिलना चाहती हो
और समतावादी होने का
लहराना चाहती हो कोई परचम।

(3)

दूर यूक्लिप्टस के पेड़ थे
मैं देख रहा था
उसकी लम्बी और पतली
टहनियों के बीच
क्षितिज का चांद उलझ गया था

पेड़ के पत्ते
फडफ़ड़ा रहे थे
और उधर जैसे
चांद से आती चांदनी
किसी भयभीत लड़की की तरह
थरथरा रही थी।

(4)

चांदनी जहां थी
वहां समुद्र की तरह थी

वह जहां से चली
वहां समुद्र की तरह थी

आकाश और धरती के बीच
जहां कुछ नहीं था
वहां वह समुद्र की तरह थी

और जब मैंने सचमुच एक दिन
समुद्र में जाकर देखा
तो अचंभित हुआ
वह पूरी की पूरी
समुद्र में थी।

(5)
तुम्हारे आगमन से
बरसती है
एक पारदर्शिता

रच उठते हैं-
खुशी के अन्त क्षण
कामना से भरे जीवन के
फूट पड़ते हैं
असंख्य बुलबुले

देवलोक से
से आती
एक श्वेतदेवी की तरह
आनंद से खिली
तुम भिगो देती हो
हमारी आकांक्षाओं को
हमारी मन-मुद्राओं को
हमारी आत्माओं को।

(6)
तुम बहुत दूर हो
चांदनी
लेकिन यहां आज एक चांदनी बेटी की
सगाई हो रही है
जयमाला की तैयारी हो रही है
मंगल गीत गाए जा रहे हैं

संगीत की विविध स्वर लहरियां
चारों ओर गूंज रही हैं
बारात की भीड़ उसे घूर रही है

सोलहों श्रृंगार किए चांदनी
बहुत गमगीन है,
वह अपने भविष्य के
अंधेरे-उजाले बिसूर रही है

आज इस गमगीन चांदनी को
भरपूर उजाले से भर सको
तो उतर आओ चांदनी।