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Saturday 18 Nov 2017

दुख में तुम्हारी हँसी

अशोक सिंह
जनमत शोध संस्थान
पुराना दुमका, केवटपाड़ा
दुमका- 814101 (झारखण्ड)
मो. 9431339804

जब-जब मेरी फटेहाली
फटे जूते में ठुकी कील-सी
पाँव में चुभती थी

तब-तब
मोतियों से चमकते
तुम्हारे दाँतों की दुधिया-हँसी
मुझे अंधेरे में
आगे का रास्ता दिखाती थी।

एक पेड़ की तरह थी तुम मेरे लिए

मेरी कितनी जरूरत थी तुम्हें
या फिर तुम्हारी मुझे
इन सब बातों को लेकर अब
कोई हिसाब-किताब नहीं करना चाहता मैं

वैसे भी क्या रखा है अब
इन घिसी-पिटी पुरानी बातों की बतकही में

हाँ इतना भर जरूर कह सकता हूँ
एक लम्बे अंतराल के बाद
तुमसे अलग रहते हुए
 
घर से काम पर जाने
और काम से घर लौटने के रास्ते में
एक पेड़ की तरह थी वह मेरे लिए

एक पेड़ की तरह
जहाँ कभी कभार थोड़ा रूक कर
सुस्ता लिया करता था मैं
जिन्दगी की भाग-दौड़ से थक-हार कर !