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Wednesday 22 Nov 2017

स्वप्नलोक का गांव

 

सुरेन्द्र प्रबुद्ध
अक्षरा, तोषगांव- 493558, जिला- महामसुंद
मो. 9669274393

आजकल गांव के लोग
नहीं जाते गांव
ऐसा तो कभी नहीं होता था पहले
ससुराल जाना होता
तो कहते जा रहे हैं गांव
(मानो हर्ष के संपुट से फूटकर
बन जाता गांव एक संगीत लहरी)
बिटिया के यहां जाना होता
तो भी यही कहते
पर आजकल गांव के लोग
गांव नहीं जाते...

गांव- बावजूद कई नामों और चेहरों के
सचमुच हुआ करता था- एक गांव
सबमें सबके पास सबके साथ... एक सा
रंग रूप रस गंध और स्पर्श का
मदालस आस्वाद लिये
रहता था समूचा स्वप्नलोक वहां
अपनी तमाम निजी कमियों के बीच
एक गदगदाता गांव
अपनी सीमाओं में परिभाषित

ऐसा अब नहीं है कि
पीपल की फुनगियों पर चहकती गौरेया है
तरिया के नीलाभ पानी में मचलती मछलियां हैं
पता नहीं चलता कि
कब आती है ऋतु फूलों की
बरबस कचोट जाता है दिल दिमाग में
विद्रूप पतझड़ की सूखी पत्तियों का खरखर
यहां की गली-गली में अंदर बाहर

शायद अभिशापित से
स्वप्नलोक की दरार से
झांकते हैं लोग
दूर शहर की ओर
जिसके व्यामोह की कैद में
बंद हो रहा है
उसका वर्तमान और भविष्यत्
लेता है अतीत
बस
आजकल गांव के लोग
अपनी ही आत्मीय टूटन का
चश्मदीद गवाह बनकर
सिकुड़े जाते हैं बैठ
अपनी-अपनी स्वनिर्मित घेराबंदी में
जहां गांव से हटकर
कोई अलग गांव नहीं है
वजूद की प्रतिच्छाया भी नहीं है।