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Tuesday 21 Nov 2017

एक स्त्री और दो बुद्ध


(1)
क्षितिज था कोरा
अनंत तक दूर दिगन्त फैला हुआ
अवनि और अंबर के रतनार ओठों के बीच
एक निस्तब्ध मौन था
सिवाय इसके कि अभी-अभी
एक चिडिय़ा गुजरी बीचों बीच
उसकी उड़ान की कमसिन लिपि में
उसी के कंठ स्वर का मद्धिम राग
वहां विद्यमान था
थी टपकती शनै: शनै:
अकरन्द की बूंदे
विशालता के सिरे में एक मासूम छाया...
सूर्य क्या चमका... खड़ी हुई वामा...

(2)
था पुरुष ही
जो बुद्ध हुआ
जानता था
उसे उसके आखिर में
ईश्वर बनाए जाने का खतरा था
इसलिए क्रुद्ध था
क्योंकि करुण धरा पर
वह बुद्ध था

(3)
हम जाते हैं
करते हैं प्रार्थनाएं
बुद्ध के सामने

बार-बार फेरे लगाते
करते हैं किसम किसम के
अनुनय विनय
खासकर तब और ज्यादा
जब वह ईश्वर बन गया होता है

लेकिन बुद्ध भी
प्रार्थनाएं किया करता था
किसकी
कम से कम ईश्वर की नहीं

बच्चा

बच्चा ज्यों-त्यों दौड़ता
दूर-दूर हवा में लहराकर
त्यों-त्यों उसकी पीठ पर
चिपकी कमीज का रंग
आसमानी से चांदनी में घुलता जाता
बस्ते में बंद किताबों की रोशनी
खिलखिलाहट की तितली जाती उड़ती
आगे-आगे
घिसता आकाश
मथा जाता सतरंग
और बच्चा कभी
पीछे मुडऩा/लौटना नहीं चाहता
होता है ऐसा ही
वह लगातार आगे ही आगे बढ़ता जाता
बहुत कम पीछे पलटता
बच्चा जो ठहरा
हममें हमेशा रहता
बार-बार याद आता

बड़बड़ाहट

पहले लोग बहुत देखते थे
(देखते अब भी हैं)
पहले लोग बहुत सुनते थे
(सुनते अब भी हैं)
पहले लोग बहुत बोलते थे
(बोलते अब भी हैं)
ऐसा वस्तुत: नहीं है
वक्त जरूरत से ज्यादा बदल रहा है
देखते हुए लोग कम होते हैं
सुनते हुए लोग कम दिखते हैं
बोलते हुए लोग कम मिलते हैं
जबकि हो भी रहा है आजकल
देखना-सुनना-बोलना
पलटा खा गया है
कि लोग कब से गुनना भूल गए हैं
अब इतना बोलते हैं
कि बोल फट जाता है
इतना सुनते हैं
कि झोल पड़ जाता है
और देखना इतना इतना
कि समझ में नहीं आता
क्या देख सुन बोल रहे हैं।

अंतिम करुणा का रूपक

चिंता- जीवन बचाने की
होती है यद्यपि
सबसे बड़ी व असाधारण
लेकिन देखा जाय तो
वाकई होती ही नहीं चिंता
वरन्
सृजन और संघर्ष की अजित पराक्रमिता होती है
जो-    हर प्राणी में
खासकर इस पुराने देश में
आदतन पाई जाती है    
आजकल
अलग अंदाज व तेवर में
वह आदमी- जो जीता है,
घसीट-घसीटकर गली कूचों में
अंधेरे के भयावह शिकंजों में
एक रीढ़हीन प्राणी की तरह
आखिरी कोशिश करता है
दो-चार पल आगे ठेलने समय को
उसी आदमी की बात हो रही है
अंतिम करुणा का रूपक
क्या बनता है अभी
बोलो बोलो बोधि

प्याज की महंगाई

साठ वर्षों के पके बालों का अनुभव
और मद्धिम रोशनी का समूचा आवेश
अपनी आंखों से बाहर निकालकर
वह सयाना
उन सड़ी प्याजों के ढेर से
कुछ कम सड़ी
छांटने में झोंक रहा था
कम से कम पांच रुपयों की बचत
करनी थी उसे
जिन्दा रहने के एवज में
वह भुला देना चाहता था
सडऩ की तीखी बू
जो रह-रह कर चिपक रही थी
उसके झुर्रीदार चेहरे पर
पसीने से भीतर बाहर होती हुई
देशभर भर में कहीं भी