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Tuesday 21 Nov 2017

पता तो...

गफूर तायर
बजरिया-2
दमोह (म.प्र.) 470661
मो. 9826986919
पता तो...
पता तो चल ही जाता है
बेतरतीब रखे सामान से
टेबिल पर
छोड़े गए तौलिए से
उल्टी-सीधी पड़ी चप्पलों जूतों से
बाद नाश्ते के बिस्तर पर
छूट गई प्लेट से
कि सुख
हमारे जीवन में ठहरा है
खिड़की से आती
सुबह की धूप की तरह।
पता तो
यह भी चल जाता है
कि बिस्तर जमे हैं करीने से
चप्पलें जूते ठीक अपनी जगह
बिलकुल स्कूली बच्चों की तरह पंक्तिबद्ध
मक्खियों के घर से
अचानक गायब होने से
वाशरूम दरपन से भी अधिक
साफ और उजला-खुश्बूतर
सभी तौलिये
अपनी जगह तैनात
झाड़ू छुपा होता
किसी गुह्यï गुफा में
ठहरी रहती है
तमाम चिंताओं के बावजूद
रेडीमेड मुस्कान
धुले पर्दों को लहराती
हल्के-हल्के हवा भी जानती है
कोई आने वाला है!
लाख छुपाओ दुनिया-जहान से
पता तो
घर के चूहे तक को
चल ही जाता है
-बस कि
पता यही नहीं चलता
घर की औरतों का
कहां-क्या
दुख रहा है!

सुनना था...

सुनना था गीत
आता जो
घने जंगलों से छनकर
और झोपडिय़ों के झुरमुट से
उठती धुएं की तरह तान
होती जिसमें
आजाद होने की खुशी सच्ची-सच्ची।
सोंधी रोटी की
खुश्बू की तरह
होती जिसकी मनभावन लय।
सुनना था धन्यवाद
भरे पूरे घर को
बेटे की नौकरी
सहज सरल रूप से
मिलने की किलकभरी हंसी के साथ।
ठीक वैसे ही
जैसे आले में जमे
भगवान जी को
देती है रोज धन्यवाद
सांध्य बेला में मां!
सुनना था
कि कहीं भी जाए बेटी
रहेगी सुरक्षित
कहेगी फोन पर हुलास से
सब हैं यहां अपने सगे से
और नहीं है कोई भी कांटा
जो पांव में चुभे
करे लहूलुहान।
सुनना थी
निश्चित होने की
पक्की विश्वासभरी उलाहना
चिंतित पिता के लिए।
सुनना था फिर से
कि रम्मू कक्का और रहीम चाचा की
एक ललकार ने
कर दिये पस्त
छुपे भेडिय़ों की उआंस और इरादों को।
सुनना था सचमुच में
विज्ञापनी दुनिया से नहीं
हर कंठ से
कि हम अलग थे ही कब
सुनना थी इस
बेआवाज तमाचे की गूंज
फित्नागर के गाल पर झन्नाती।
सुनना थी सचमुच की हंसी
हर गली चौराहे चौपाल से
कम से कम-वैसी तो जैसी
पहले थी।
आजादी के पहले पहले तक
और वैसी
जैसी हम सब-चाहते थे/हैं सुनना।