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Tuesday 21 Nov 2017

पेशावर-1

 

सच्चिदानंद जोशी
कुलपति निवास, साइंस कॉलेज कॉम्प्लेक्स, एनआईटी के सामने जी ई रोड रायपुर(छग)
मो. 9425507715
पेशावर-1
सुबह स्कूल भेजते समय
रखना भूल गई थी वो
बेटे के बस्ते में सिविक्स की किताब
क्योंकि पिछली रात ही वह
पढ़ा रही थी बेटे को सबक
सच्चाई, नेकी और इंसानियत के
और ढेर सारे अच्छे लफ्जों की
पोटली बांधे बच्चा सो गया था
किताब टेबल पर छोड़कर।
भागकर गई थी वो स्टॉप पर
छूटी हुई किताब बस्ते में डालने
ताकि छूट न जाए नया सबक
जो टीचर आज पढ़ाने वाले थे
अमन, चैन और भाईचारे का।
शाम को स्कूल से बच्चा नहीं
बस्ता लौटा है
कुछ गोलियां बस्ते को भी लगी हैं,
और सिविक्स की किताब
बस्ते से बाहर निकाले
उसे चिढ़ा रही है।

पेशावर-2

रफीक की इस बस में
सुबह कितना शोर था
हल्ला-गुल्ला, चीख पुकार
आपस में खींचतान,धींगा मस्ती
मारामारी, नोंचा नोंची
एक-दूसरे से शरारत और
फिर एक-दूसरे की शिकायत
रोज की तरह।
तंग आकर रफीक चिल्लाया था
''चुप हो जाओ शैतानों
खुदा के वास्ते चुप हो जाओ।ÓÓ
रोज की तरह।
लेकिन आज खुदा ये बात सुन लेगा
रफीक को पता न था।
अब रफीक की बस में
बच्चे नहीं सिर्फ बस्ते हैं
और बस्ते शोर नहीं
किया करते।

कोकराझार-1

फिर उड़े खून के छींटे,
फिर मचा हाहाकार,
फिर थोड़ी हलचल जंगल में
फिर थोड़ी चीख पुकार
फिर अधनंगी देह को छलनी करती गोलियां
फिर तिरंगे में लिपटे कुछ शव
फिर चौराहे पर जली मोमबत्तियां
फिर कुछ मौन और शोर मचाती रैलियां।
फिर बेतुके बयानों का दौर
फिर लिजलिजी चेतावनियों का सिलसिला।
फिर कई दिनों तक जांच करते आयोग
फिर कुछ दिनों तक चिल्लाता मीडिया।
और फिर... और फिर...
और फिर शहर के कोलाहल से दूर
नये साल के जश्न से बेखबर
जंगल के किसी कोने में
अपने झोपड़े में, दुधमुंहे बच्चे के लिए
चावल की पेज पकाती वह
सोच रही है
कल के खाने का इंतजाम
कैसे होगा?

कोकराझार-2
अभी भारत की अर्थ नीति के
प्रश्न से ही नहीं उबर पाया था कि
दूसरा प्रश्न दनदनाता आ पहुंचा साक्षात्कार में,
''कोकराझारÓÓ कहां है?
असहज हो गया मैं
सचमुच ही नहीं पता था मुझे
कि ससुरी यह जगह है कहां,
कभी सुना ही नहीं था इसके बारे में।
''नक्शे में देखकर बताओगेÓÓ
दूसरी ओर से आवाज आई और
मैं नक्शे में उलझ गया।
नक्शा देखता भी तो कैसे समझ पाता
कहां है कोकराझार
उत्तर में या दक्षिण में
पूरब में या पश्चिम में
भारत में या...।
नक्शे के सामने थोड़ी देर
चहल कदमी करने के बाद
बैठ गया कुर्सी पर
अगले प्रश्न की प्रतीक्षा में।
प्रशासनिक सेवा के माध्यम से
जनता की सेवा करने का मेरा सपना
कोकराझार के कारण चूर-चूर होता दीखता था।
उसके बाद कई प्रश्न आए,
राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय,
कुछ के जवाब दिये
कुछ खाली गए।
घर आकर सब भूल चुका था
लेकिन कोकराझार मन में
बैठा रहा।
तंग होकर ढूंढने लगा नक्शे में
लगातार
लगातार दो घंटे तक।
लेकिन तब तक बहुत से
लोग जान चुके थे
कहां है कोकराझार,
क्योंकि खून से सना वह स्थान
अब सभी को साफ दिख रहा था।
कोकराझार
लाशों का अम्बार बन चुका था,
लेकिन मेरे लिए
अब भी सिर्फ
सामान्य ज्ञान का एक
प्रश्न ही था।