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Monday 20 Nov 2017

बंद करो ये गीत प्रणय के

मैं वर्षों से कहती आई
बंद करो ये गीत प्रणय के।
आलोचक बन खुले हृदय से
लिखो ग्रंथ कुछ नाम कमाओ
काव्य लिखो कुछ राम कृष्ण पर
गीत लिखो ब्रजलाल लाल के
मैं वर्षों से कहती आई
बंद करो ये गीत प्रणय के।
हास और परिहास लिखो मत
करो बात तुम प्रगतिवाद से
खोज करो नित नई नवेली
ज्ञानी बन विज्ञान ज्ञान से
उठो, लिखो धरती के ऊपर
छंद नए तुम महाकाव्य के।
मैं वर्षों से कहती आई
बंद करो ये गीत प्रणय के।
हिंदी का उत्थान आज रे
पुरस्कार पाने जाता है
और तुम्हारा नन्हा मुन्ना
नहीं पेट भर खा पाता है
इसीलिए तो कहती प्यारे
गीत लिखो तुम मेरे जी के।
मैं वर्षों से कहती आई
बंद करो ये गीत प्रणय के।
प्रजातंत्र है करो प्रशंसा
मंत्री की रे खुले कंठ से
नई व्यवस्था सरकारी है
प्रथम पुरस्कृत होंगे हिय से
मिल जाएँगे दाम काम आएँगे
छोड़ो अनुराग राग ये जी के।
मैं वर्षों से कहती आई बंद करो ये गीत प्रणय के।
साहित्यिक बन गए भाट हैं
उनके अपने नए ठाट हैं
चाहो तो तुम भी बढ़ जाओ
राज्य सभा के खुले द्वार हैं
बार बार मैं कहती आई
लिखो न यूँ तुम छंद पिया के
मैं वर्षों से कहती आई
बंद करो ये गीत प्रणय के।