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Saturday 18 Nov 2017

तम हरो रे

तम हरो रे,
प्राण का दीपक जलाकर
तम हरो रे!
इस अमा में पूर्णिमा का रंग भरो रे!
तम हरो रे!
देश का निर्माण करने
आज मानव बढ़ रहा है
तम हरो पथ और आलोकित करो रे!
तम हरो रे!
प्राण का दीपक जलाकर
तम हरो रे!
देश में फैली विषमता को मिटाने
और समता का नया साम्राज्य लाने
तम हरो पथ ज्ञान से ज्योतित करो रे!
तम हरो रे!
प्राण का दीपक जलाकर
तम हरो रे!
आज मानवता विकल है
क्योंकि मग में आ रही हैं
बाढ़ सी काली घटाएँ छा रही हैं
तम हरो रे,
तम हरो रे,
प्राण का दीपक जलाकर
तम हरो रे!
तम हरो, मंजिल भले ही दूर हो
पर पा सकोगे और नभ के सब सितारे
इस अमा को पूर्णिमा में रे बदलने
ला सकोगे श्रम करो रे!
तम हरो रे,
प्राण का दीपक जलाकर
तम हरो रे!