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Saturday 18 Nov 2017

आँख बुरी है

एक बात है
सुनो ध्यान से;
सब कहते हैं-
नई नहीं है।
एक बात है
सुनो ध्यान से,
सब कहते हैं-
अनसुनी नहीं है।
आँख बुरी है
अगर लगी तो
गहरा घाव
बना देती है;
आँख बुरी है
अगर लगी तो
सौ-सौ तीर,
चुभा देती है;
अगर आँख से
आँख लगी तो
आँख नहीं
लगने पाती है;
अगर आँख से
आँख लगी तो
आँख नहीं
छिपने पाती है।
आँख बुरी है
नहीं लगाना,
कभी आँख से
आँख-आँख से
लगी आँख में
चढ़ जाती है;
आँख-आँख से
लगी आँख में
गड़ जाती है।
आँख गड़ी तो
प्यार किसी का
पा जाती है;
आँख गड़ी तो
गड़ी आँख को
भा जाती है।
आँख बुरी है
भा जाती है,
और आँख में
छा जाती है;
पा जाती है
स्नेह आँख का,
और हृदय के
तार-तार को
अपने-आप
बजा जाती है।
आँख बुरी है,
भले बुरे का
ज्ञान कराती;
ध्यान कराती,
मान और
अपमान कराती
आँख बुरी है
क्योंकि आँख से
डर जाती है;
डरकर प्यारे
झुक जाती है।
झुकना नहीं
आँख का अच्छा,
क्योंकि हार का
भान कराती
शर्माती है नहीं
शर्म का स्वांग बनाती।
आँख बुरी है,
नहीं देखना
कभी आँख से;
माया का
विकराल रूप है
फँस जाओगे।
फँसकर नहीं
निकल पाओगे
क्योंकि आँख का
सागर गहरा
नहीं थाह
मिलने पाएगी;
और थाह मिल गईं
अगर तो
नहीं चाह
मिटने पाएगी।
आँख बुरी है
नहीं देखना
विष का सागर-
लहराता है;
और आँख से
उठकर ऊपर
अरे आँख पर
छा जाता है।
आँख बुरी है
क्योंकि आँख का
विष विषधर से
कहीं अधिक है;
विषधर काटे
बच जाते हैं
आँख लगी तो
बड़ा कठिन है;
मर जाते हैं।
मरकर चैन
नहीं पाते हैं।
आँख बुरी है
नहीं चढ़ाना
तीर नजर का,
छूट गया तो
प्राण किसी के
छिद जाएँगे;
और आँख से
चले आँख में
आ जाएँगे।
उस दिन अपनी
आँख न अपनी
रह पाएगी;
जिस दिन अपनी
आँख-आँख को
पा जाएगी।
आँख बुरी है
अगर गई तो
दिन को रात
बना जाएगी;
और रात-दिन
के अंतर को
अपने आप मिटा जाएगी।
आँख बुरी है
अगर गई तो
सूरदास को
जीना मरना
एक बराबर;
आँख बुरी है
क्योंकि धर्म को
और कर्म को
आदि काल से
अरे नष्ट
करते आई है।
आँख बुरी है
क्योंकि ज्ञान को
और ध्यान को
आदि काल से
अरे पुष्ट
करते आई है;
आँख बुरी है
अगर लगी तो
अरे, प्रलय
पल में होता है।
और आँख से
लगी आँख तो
साम्राज्य क्षण में
खोता है।
आँख बुरी है
अगर लगी तो
रावण जैसे
गिर जाते हैं;
और आँख से आँख
लगी तो
कौरव जैसे
मिट जाते हैं।
आँख बुरी है
क्योंकि लगाना
और फेरना
मानव का
पुरुषार्थ नहीं है;
आँख-आँख में
रहने वाला
भिखमंगा
लाचार नहीं है।
आँख बुरी है
नहीं देखना
अरे आँख से,
दया-धर्म का
पाप-पुण्य का
इन कर्मों से
स्वारथ का
सच्चा रिश्ता है।
आँख बुरी है
क्योंकि देखना
उसकी अपनी
लाचारी है;
और आँख की
लाचारी को
नहीं देखना
कभी आँख से
आँख बुरी है।