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Saturday 18 Nov 2017

दीप द्वय

दीप द्वय
दोनों का क्रम जलते रहना
अपनी-अपनी चाह में,
एक मिलन स्नेह लिए है
एक विरह की दाह में।
दोनों बने एक मिट्टी के
एक तिली का तेल है;
एक रुई की दोनों बाती
दोनों में क्या मेल है।
एक जलन में तृप्ति लिए है
एक जलन में डाह है;
एक प्रणय की ग्रंथि खोलता
एक देखता राह है।
दोनों पर तम का पहरा है
अंतर केवल एक है;
एक ज्योति को ज्योति दे रहा
एक ज्योति से दूर है।
एक चढ़ा पूजा की थाली
एक धरा की गोद में;
एक रूप को रूप दे रहा
एक रूप की टोह में।
दोनों का विश्वास एक है
बुझना प्रात:काल है;
एक देखता रात रंगीली
एक स्वप्न संसार है।
एक जला जलकर मुस्काया
एक जला रोया, पछताया
एक जला सुख वैभव पाया
एक जला दुख को सहलाया।
दोनों का क्रम जलते रहना
अपनी-अपनी चाह में;
एक मिलन स्नेह लिए है
एक विरह की दाह में।