Monthly Magzine
Friday 24 Nov 2017

स्व. महेश प्रसाद भारती की कविताएं


प्रस्तुति
ओम भारती
221/9 बी साकेत नगर
भोपाल- 462024
मो. 9425678579
लगभग अद्र्धशती पहले की इन रचनाओं से गुज़रना स्मृतियों के संसार में वापसी के मानिन्द है। यादों में कूचागर्दी करती इन कविताओं में उस बीते काव्य-युग की धड़कनें आसानी से सुनी जा सकती हैं। इनकी संवेदना मूलत: प्रगीतात्मक है: ''दोनों का क्रम जलते रहना/अपनी-अपनी चाह में एक मिलन का स्नेह लिए है/ एक विरह की दाह में ÓÓ। प्रगीतात्मक संवेदनाओं के रूमानी मायालोक में स्वच्छन्द विहार के साथ वास्तविकता की यथार्थवादी चेतना के जागृत स्वर भी यहां सुने जा सकते हैं:  ''काल के आघात से जैसे मनुजता/सहमकर औंधी पड़ी है।ÓÓ अपने सोच-विचार को सीधे-सीधे वक्तव्य में पेश कर देने का यह लहजा तब खासा आम था: ''हास और परिहास लिखो मत/करो बात तुम प्रगतिवाद सेÓÓ। अपनी छोटी-सुबुक-सी बहर में प्रचलित मुहावरों को बुनती, श्लेष और वक्रोक्ति के सहारे शब्दलीला रचती कविता 'आंख बुरी हैÓ विशेष रूप से उल्लेखनीय है:  ''यहां आंख लगती और चढ़ती है, गढ़ती और छा जाती है, झुकती और गहराती है!ÓÓ  साहित्य और बौद्धिक परिदृश्य को उघाड़ती और व्यंग्य की प्रखर धार से चोट करती ये पंक्तियां आज भी कितनी प्रासंगिक हैं:  ''हिन्दी का उत्थान आज रे/पुरस्कार पाने जाता है/और तुम्हारा नन्हा मुन्ना/नहीं पेट भर खा पाता है।ÓÓ या, ''साहित्यिक बन गये भाट हैं/उनके अपने नये ठाठ हैं/चाहो तो तुम भी बढ़ जाओ/ राज्यसभा के खुले द्वार हैं।...ÓÓ इन्हें पढ़ते हुए मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता 'अंधेरे मेंÓ के इस हिस्से की बेसा$ख्ता याद आ जाती है: 'सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्, चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं, उनके $खयाल से यह सब गप है, मात्र किंवदन्ती!, रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध ये सब लोग, नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे...Ó
अपनी सहजता और सरलता में आसानी से सम्प्रेषित होती इन कविताओं में $गमे जानां के साथ $गमे-दौरां की ज़बान देने की कोशिश ही इन्हें आज भी पठनीय बनाती है।
                             धनंजय वर्मा                                 एम-433/ई-7, अरेरा कॉलोनी, भोपाल- 462016