Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

3) फोन पर ही सब कुछ

नहीं, मैं तुम्हारे भतीजे के घर नहीं आ सकूंगा। बच्चों की पार्टियां मेरा मन अवसाद से भर देती हैं। तुम्हें शायद यह हास्यास्पद मालूम देगा। कल तुम्हारा चेहरा तन गया था क्योंकि मैंने तुम्हारी सिगरेट नहीं सुलगाई। सब कुछ परस्पर संबद्ध है। यों समझो मैं सनकी हूं। क्या मालूम? तुमसे कभी भी मिलना नहीं हो पायेगा, इसलिए सारी बातों का खुलासा फोन पर ही करूंगा। कौन सी बातें? मैचों के ब्योरे। मुझे फोन से नफरत है। लेकिन, हां, मुझे मालूम, तुम इसके दीवाने हो, जबकि ये सब मैं तुम्हें कार में बैठे बैठे, या किसी सिनेमाघर का गलियारा पार करते करते, या किसी होटल के भीतर चाय पीते पीते बतला सकता तो बेहतर होता। मुझे बचपन के गुजरे दिन याद आ रहे हैं।
''फरनांदो, दियासलाइयों से छेड़छाड़ ना करो, तुम घर को जला डालोगे,ÓÓ मां यों कहती, या शायद यों, ''पूरा का पूरा घर राख का ढेर जा बनेगा,ÓÓ या यों, ''हम सबके सब पटाखों समान उड़ जायेंगे।ÓÓ
अब बताओ, क्या ये मामूली बात है? सोचता तो मैं भी उसी तरह ही, तथापि वो सबकुछ मुझे माचिसों को छूने ही की, उन्हें सहलाने, सुलगाने का जतन करने ही की, उन्हीं के लिए जीने मरने ही की जानिब उकसाता। ठीक यही बात तुम्हारे और रबर के टुकड़ों के दरम्यान हुई। हालाँकि उनको छूना प्रतिबंधित नहीं किया गया। रबर के टुकड़े सुलगते नहीं। अलबत्ता उन्हें चबा लो। लेकिन वह दूसरी बात है। चार साल का रहा - उन दिनों की याद ज्वालाओं समान फरफराती हैं। जिस घर बचपन बिताया- जैसा कि पहले तुम्हें बताया-खूब बड़ा था: उसमें पाँच बेडरूम, दो एंटें्रस हाल, दो स्टडी रूम थे; वे भी ऐसे कि जिनकी छतों पर बादलों में घुमड़ते नन्हें फरिश्ते चित्रित थे। तुम समझते होगे कि मैं किसी राजा समान रहता होगा! नहीं; तुम्हारा आकलन सही नहीं है। नौकरों के बीच हमेशा लड़ाइयाँ होती रहतीं। वे दो दलों में बँटे थे: माँ के पक्षधर एक ओर तो दूसरी ओर निकोलस सिमोनेत्ति के अनुयायी। वह कौन? ये निकोलस सिमोनेत्ति रसोईया था: मैं उससे चिढ़ा हुआ था। वह मुझे धमकाता, झूठ मूठ, बड़ा सा चमकीला चाकू दिखाता, गोश्त के छोटे-छोटे टुकड़े और सलाद की पत्तियाँ खेलने के लिए देता, हथेली में शकर के दाने देता जिन्हें मैं मार्बल फर्श पर फैला देता। वह तो माँ की दियासलाइयों के प्रति मेरे आवेग को भड़काती, यों कि मैं उन्हें सुलगाऊँ। ताकि उन्हें भभका दूँ। माँ के-बेहद परिश्रमी रहे आये-पक्षकारों की वजह खाना कभी भी वक्त पर नहीं बन पाता या बेस्वाद या ठीक से पका हुआ ही नहीं होता। कहीं न कहीं से कोई हाथ आगे बढ़ तश्तरियों को इतना परे करता कि वे ठंडी पड़ जाती, उसकी उंगलियाँ नूडल पर टैलकम पावडर छिड़क देतीं, अंडों पर धूल उड़ा देती। व्यवधान की पराकाष्ठा राइस पुडिंग में बड़े लंबे से किसी बाल के गिरे होने तक पहुँची।
    ''यह बाल बेशक जूनिटा का है,ÓÓ पिता कहते।
    ''नहीं,ÓÓ चाची कहती, ''मेरी मानो तो यह उसका नहीं, लूइसा का लगता है।ÓÓ
    बेइंतिहा स्वाभिमानी माँ, खाना छोड़ मेज से हट, उंगलियों की पोरों बीच बाल दबा रसोई में घुसी। वह तो रसोइये की सूरत ही से खफा थी, भौंचक उसने उसे बाल नहीं काले धागे का टुकड़ा बताया। मुझे पता नहीं किस व्यंग्यात्मक या चोट-पहुंचाते फिकरे से आहत हो निकोलस सिमोनेत्ति एप्रन उतार किसी गेंद की शक्ल में यों तहाने लगा मानों फेंकेगा, फिर कहेगा काम छोड़ रहा हूँ। मैंने बाथरूम तक पीछा किया जहां वह रोजाना वस्त्र उतारता बदलता। लेकिन, मेरी ओर हमेशा ध्यान रखता आया वह, इस क्षण, अनमना ही बना रहा। हाथों लगे तेल के अवशेष सिर पर पोंछ उसने कंघा किया। उसके हाथ- जैसे मैंने कहीं नहीं देखे होंगे-कंघे ही के समान थे। फिर उसने रसोई में घुस, पूरे तेवर से, सांचे, लंबे लंबे चाकू, चपटे चपटे चम्म्च समेटे, उन्हें, सदा कंधे पर लटकते ब्रीफकेस में रखे और सिर पर हैट फंसा दरवाजे की जानिब कदम बढ़ा दिये। उसका ध्यान अपनी तरफ  खींचने के इरादे मैंने उसकी पिंडलियों पर एक लात जमा दी; वह, चर्बी से गंधा रहा अपना हाथ मेरे सिर पर रखते हुए बोला, ''खुदाहाफिज, मेरे बच्चे। अब कई अन्य लोग निकोलस का पकाया खाना- उंगलियां चाट चाट-सराहेंगे।ÓÓ
    आया न मजा! अपनी फेरहिस्त टटोलता हूं; हां, वहां दो स्टडी रूम थे। इतने क्यों? खुद ही से पूछता हूं; कोई भी तो पढ़ता लिखता नहीं था! आठ गलियारे, तीन गुस्लखाने (एक में दो वाशबेसिन)। दो क्यों? शायद वे चार हाथों से सफाई करते। दो भ_ियां(एक साधारण, दूसरी विद्युत चलित), कपड़े धोने और लोहा लगाने के लिए दो कक्ष (पिता कहते एक ऐसा जिसमें कपडों पर सल पड़ जाते), एक भण्डार डायनिंग रूम से सटा, एक प्रांगण, नौकरों की पांच खोलियां, एक कमरा संदूकों से अटा पड़ा। क्या हम खूब सफर करते? नहीं। वे संदूकें अन्य कई कामों में इस्तेमाल होतीं। एक कमरा दरवाजों से युक्त अलमारियों से भरा; वह ऐसे वैसे इस्तेमाल में आता जहां कुत्ता सोता और किसी तिपहिया सायकल पर मेरा गुड्डा, घोड़ा बैठा होता। वह घर अभी मौजूद है क्या? मेरी स्मृति में बसा है। वस्तुएं मील के पत्थरों समान दर्शाती हैं हम कितना आगे आ निकले हैं: घर में वे अनेक होंगे कि मेरी स्मृति उनकी संख्याओं से भर गयी हैं। बता सकता हूँ पहला सेब किस साल खाया या कुत्ते का कान कब काटा या कैंडी की तश्तरी में किस दिन मूत दिया होगा। तुम कहोगे मैं सुअर हूँ अपने खिलौनों की बनिस्बत मैं उस घर के कालीनों, झाड फानूसों, और शीशे की अलमारियों को तरजीह देता। मेरी सालगिरह पर माँ ने दावत रख ऐसे बीस-बीस लड़के लड़कियों को आमंत्रित किया जो मेरे लिए तोहफे ला सकें। मां दूरंदेशी थी। बेशक सहृदय थी! समारोह के लिए नौकरों ने कालीनें हटा दीं, और माँ ने, शीशेे की अलमारियों में रखी क्राकरी आदि निकाल उन्हें अजूबों, कचड़े की नन्हीं गाडिय़ों , झुनझुनों शंखों और वंशियों (ये सब लड़कों के लिए) तथा बाजूबंदों, अंगूठियों, रेजगारी के बटुओं और गुडिय़ाओं (ये लड़कियों के लिए) से सजा दिया। डायनिंग टेबल के मध्य सैंडविचों, और मिल्क चाकलेटों से घिरा चार कैंडल जड़ा एक केक विन्यस्त किया गया। कतिपय बच्चे आये (सभी के हाथों में तोहफे नहीं होंगे) जिनके संग दाई माँएँ या माँएं  या चाची , या दादी भी थीं। माँएं , चाचियां, दादियां गप्पे लगाने नीचे बैठ गयीं। उनकी बातें सुनते सुनते किसी कोने में खड़ा मैं शंख फूंकने लगा लेकिन कोई आवाज नहीं निकली।
    ''आज कितनी जबरदस्त लग रही हो, बोखिताÓÓ माँ ने मेरी किसी सखी की माँ से पूछा; ''शायद अभी अभी देहात से लौटी हों।ÓÓ
    ''साल का ये मौसम ऐसा जब थोड़ा बहुत बहुत तपना चाहो लेकिन दिन बीते विकट सूरत उभर आती हैÓÓ, बोखिता ने जवाब दिया।
    मुझे लगा वह सूरज की बजाय आग की ज्वालाओं बाबत् कह रही है। मैं उसे चाहता? किसे? बोखिता को ? नहीं। वह भयावनी थी; छोटा सा चेहरा उसका जिसमें ओंठ नदारत; लेकिन माँ कहती: खूबसूरतों की बनिस्बत बदसूरतों की तारीफ करना शालीन माना गया है: कहती कि सुन्दरता आत्मा की होती है, चेहरे की नहीं; बोखिता भले भयावनी हो लेकिन उसके भीतर 'कुछ है।Ó और फिर बात यह कि माँ कदापि झूठ नहीं बोलती: वह प्राय: किन्हीं श्लेष लफ्ज़ों के चयन का ऐसा प्रबंध कर ही लेती मानों जुबान अटक गयी हो, तभी तो बोली, ''कितनी  जबरदस्त लग रही हो, बोखिता,ÓÓ जो अपनी दोस्त की मजबूत शख्सियत के प्रति श्लाघनीय वचन भी माना जा सकता था। उन्होंने सियासत , नाना भांति टोपियों, और परिधानों, आर्थिक समस्याओं, जलसे में न आये लोगों बाबत् चर्चाएं की: यकीन करिये, मैं उन्हीं शब्दों को हू-ब-हू दोहरा रहा हूं जिन्हें उन्होंने बोला। गुब्बारे उड़ा देने के बाद, कठपुतलियों के नाच (जिनमें लिटिल रेड राइडिंग हुड ने मुझे उतना ही डराया जितना कि  'भेडिय़ेÓ ने दादी को, कि जिनमें ब्यूटी मुझे बीस्ट के समान ही भयावह लगी) के बाद, बर्थडे केक पर जड़े कैंडल फूंकफूंक बुझाने के बाद, मैं घर के अत्यंत गोपनीय कक्ष के भीतर बंद होती मां के पीछे पीछे चला जहां वह अलंकृत तकियों बीच बैठे अपने मित्रों से जा घिरी। मैं येन केन किसी आरामकुर्सी और किसी स्त्री की हैट पर मुंह बनाता, सिमटा हुआ, दीवाल से (ताकि संतुलन बनाये रखूं) टिका रहा। अब सुनो मैं कोई बेबकूफ नहीं हूं। स्त्रियां इस कदर हंस रहीें थीं कि मुझे जरा पल्ले नहीं पड़ा वे क्या कर रही हैं। उनके बीच चोलियों की चर्चा इस हद चल पड़ी कि किसी एक ने कमर तक ब्लाउस खोल अपनी चोली दिखायी जो क्रिसमस स्टाकिंग की तरह पारदर्शी थी; मैंने सोचा उसके भीतर जरूर कोई खिलौना होगा, लोभी लालसा हुई उसमें अपना हाथ घुसा दूँ। उन्होंने अपनी ऊँचाइयों की चर्चा की, जो किसी मसखरी की जानिब जा घूमी। वे एक के बाद एक खड़ी हुईं। किसी बड़े भारी शिशु समान लग रही एलविरा ने रहस्यात्मक ढंग से अपनी पाकेटबुक खोल एक मेजरिंग टेप निकाली।
    ''अपनी पॉकेटबुक में हमेशा ही नेलकटर और मेज़रिंग टेप रखती हूँ ; क्या मालूम कब जरूरत आन पड़े,ÓÓ उसने कहा।
    ''एकदम पगली हो,ÓÓ भारी आवाज निकालती बोखिता चिल्ला पड़ी, ''पूरी दरजिन लग रही हो।ÓÓ
    उन्होंने अपनी कमर, छातियां, और नितम्ब नापे।
    ''नाप लो! मेरी तुम्हारी से कम निकलेगी।ÓÓ
    ''उनकी आवाजें किसी रंगशाला में गूंजती ध्वनि समान उभरीं।
    ''चाहे जो हो ; नितम्ब की नाप में मैं ही अमीर हूँ।ÓÓ कोई बोली।
    ''लेकिन छाती मेरी जैसी किसी की न होगी,ÓÓ किसी अन्य ने कहा। ''पुरूष छातियों पर ही ललचते हैं; देखा ना, कैसे घूर रहे थे?ÓÓ
    ''अगर वे मेरी आँखों में आँखें न डालें तो मुझे कुछ भी महसूस नहीं होताÓÓ बेशकीमती मोतियों से बनी नेकलेस पहनी कोई तीसरी स्त्री बोल पड़ी।
    ''ज्वार तुम्हारा नहीं, उनके भीतर उपजी उत्तेजना का नापा जाता है,ÓÓ किसी तीखी ध्वनि में घुले ये बोल किसी निस्संतान स्त्री के मुंह निकले।
    ''मुझे किसी बात की परवाह नहीं,ÓÓ दूसरी ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया।
 ''मुझे भी नहीं,ÓÓ हसीन स्त्री रोस्का पेरेज ने राग में रंग मिलाया; इस क्षण उसकी नपाई हो रही थी जिसके चलते वह उस आरामकुर्सी से जा टकरायी जहां मैं लुका था।
    ''मैं जीत रही हूं,ÓÓ छोटी सी किसी खूंटी समान नुकीले नाकनक्श वाली चिंशे ने- एक ही भुजा में चढ़ाई हुई नौ रजत चूडिय़ां खनखाते हुए कहा।
    ''बीस,ÓÓ चिंशे की नन्हीं कमर लपेटे मेज़रिंग टेप पर खिंचे निशान को ध्यान से देख रही ऐल्विरा चीख पड़ी।
    बीस इंची कमर! ये तो किसी चिडिय़ा की लगती है! वह चिडिय़ा ही है! योगी तो नहीं-जो पेट को भीतर सिकोड़ ले? नहीं, योगी नहीं, सपेरा है वह। विकृतकामी स्त्रियाँ उस पर ललचती हैं। मेरी माँ नहीं। माँ संत है। उसे चिंशे पर दया आयी। जब चिंशे पर खुसर फुसर चली वह बोली, '' बेतुकी बकवास।ÓÓ
    मैंने उसे किसी बदमाश की बातों के लिए ''बेतुकी बकवासÓÓ जैसा फिकरा कसते हुए कभी नहीं सुना होगा। निस्संदेह, यह कोई न कोई व्यक्तिगत मामला लगता है। यह वाकई उसी की खासियत नजर आयी। खैर, मैं अपना आख्यान जारी रखता हूं। उस पल किसी आरामकुर्सी के निकट स्थित फोन खनखनाया। चिंशे और एलविरा ने एकसाथ उसका जवाब दिया। फिर किसी तकिये से यंत्र को दबा मां से बोली, ''सुनो, यह तुम्हारे लिए है।ÓÓ
    अन्य स्त्रियां परस्पर धक्कम धक्का करने लगीं जिसके चलते रोस्का ने यंत्र उठा लिया।
    ''मेरा दावा है यह निस्संदेह दाढ़ी धारी जवान होगा,ÓÓ कोई स्त्री बोल पड़ी।
    ''मेरे ख्याल से तो यह वही शैतान बच्चा है,ÓÓ अपनी नेकलेस चबाती दूसरी स्त्री ने कहा।
    पल बीते आरंभ हुई दूरभाषी चर्चा में सभी- यंत्र को एक से दूसरी, तीसरी .... को देती हुई-शामिल हो गयीं। भूल गया कि मुझे दुबका छिपा रहना चाहिए, खड़ा हो- बाजूबंदों और नेकलेसों की खनखनाती ध्वनियों से भड़की हुई स्त्रैण उमंग को ध्यान लगा देखने लगा। मुझपे नजर पड़ते ही माँ की वाणी और भावभंगिमा बदल गयीं। मानो दर्पण के समक्ष खड़ी हो; उसने केश सँवारे, जुर्राबों को ताना- फिर पूरा एहतियात बरतते हुए एशट्रे में अपनी सिगरेट दो या तीन बार दबा कर बुझाई। फिर हाथ पकड़ मुझे कक्ष के बाहर ले गयी; चलते चलते, हल्ले गुल्ले के अनंतर पलक झपकते मैंने,व्हिस्की प्यालों के परे रखी मेज पर विन्यस्त लंबी लंबी अलंकृत तीलियों को झपट कर जेब के हवाले कर लिया।
 वह मुझे कालीन परे की हुई, दीवारों में लगी काँच की अलमारियों को आम वस्तुओं से रिक्त की हुई और बेशकीमती उपस्करों को हटायी हुई बैठक में धका ले गयी जहां अब, उनकी एवज में, गत्ते के बने खोखले घोड़े, फर्श पर बिखरे मुकुट, पिकोलो, और छोटी छोटी मोटरगाडिय़ां बिखरी पड़ीं थीं कि जिनके मालिक मुझे छद्मवेषी युवक लग रहे थे। वहां प्रत्येक बच्चा किसी बेलून पर खतरनाक ढंग से खींचतान करता भिड़ा हुआ था। किसी वस्त्र से ढके पियानो पर मेरे लिये लाये गये सारे तोहफे रख दिये गये थे। बेचारा पियानो ? पियानो क्या, उसे बेचारा फरनांदो पुकारना बेहतर होगा! मुझे लगा कतिपय तोहफे गायब हैं क्योंकि हाथ में आते ही मैंने उन्हें ध्यान से देखा और गिना था। मैंने सोचा वे घर में कहीं अन्य जगहों पर होंगे, अत: गलियारे में भटकता कूड़ेदान तक पहुंचा, जहां गत्ते के कुछ एक बक्से और अखबारों की कतरनें हाथ आयीं। उन्हें मैं बड़ा ताव दर्शाते हुए उजड़े कक्ष में पुन: लौटा लाया। तत्क्षण लगा कि कतिपय बच्चों ने मेरी नामौजूदगी से मौका पा मुझे मिले तोहफों पर दोबारा हाथ साफ  कर दिया है। वाह! कितने निर्लज्ज ! अतिशय हिचक और अनेक अड़चनों के अनंतर मैं बच्चों के साथ सामंजस्य बिठा पाया। तदनंतर हम फर्श पर बैठ तीलियों का खेल जमाने लगे। इधर आयी दाइयों में से एक ने दूसरी से कहा, ''इस घर में बेइंतिहा खूबसूरत उपस्कर है: इतने विशाल फूलदान कि अगर पैर पर गिर जायें तो उसका कचूमर निकाल दें।ÓÓ हमारी ओर नजर घुमा उन्हीं पात्रों बाबत् फिर बोली: ''उनको अलग अलग देखेंगे तो प्रत्येक दानव लगेगा, लेकिन एक संग वे यों लगेंगे मानो शिशुरूप यीशू हों।ÓÓ
जोड़ तोड़ कर, तीलियों से बड़ी देर तक घर, सेतु, इमारतें, नक्शे बनाये। फिर थोड़ा और वक्त बीते, हाँ कि जब चश्मा चढ़ाया और जेब में बटुआ फंसाया काचो वहां पहुंचा होगा, हमने माचिसों को जलाने का जतन किया। सर्वप्रथम उन्हें अपने जूतों के तल्लों पर, तत्पश्चात् चिमनी के पत्थरों पर रगड़ा। आरंभिक चिंगारियों ने हमारी उंगलियां जला दी। काचो बड़ा ज्ञानी था, बोला कि उसे लकडिय़ों को विन्यस्त कर अलाव बनाना भर ही नहीं उसे जलाना भी आता है। उसे डायनिंग रूम से सटे वेस्टिब्यूल- जहां उसकी आया होगी- को, आग की लपटों से घेरना आता है। मैंने विरोध किया। हमें आयाओं पर अपनी तीलियां बरबाद नहीं करना है। वे फैंसी माचिसें तो उस प्रायवेट कमरे के लिए नियत हैं जिसमें मुझे मिलीं। वे हमारी मांओं की हैं। हम पंजों के बल उस कमरे के द्वार तक पहुँचे जहां आवाजें और हंसी हमारे कानों पड़ीं। मैंने ही चाबी घुमा दरवाजा लॉक कर दिया; मैंने ही चाबी निकाल अपनी जेब के हवाले की। हमने तोहफों की पैकिंग के कागज और गत्ते के- घासफूस भरे- बक्से, मेज पर पड़े कतिपय अखबार भी, मेरे द्वारा उठाये हुए कूड़े कचरे के टुकड़े भी, और चिमनी में से निकाले चंद काष्ट खंड- जिन पर आगामी अलाव देखने हम बैठे- बटोरे। हमें मार्गारिटा की आवाज सुनाई पड़ी: ''उन्होंने हमें कमरे में लॉक कर दिया है।ÓÓ मुझे उसकी हँसी अभी तक याद है।
किसी ने जवाब दिया: ''अरे ठीक है; इसी तरह वे हमें तन्हा छोड़ तो रहे हैं।ÓÓ    आरंभ में 'अलाव Ó से चिंगारियाँ नहीं निकलीं लेकिन पल बीते वह भड़क उठा - किसी जवान दानव समान जा उभरा- राक्षसी जबान सी लपटें निकालता हुआ। उसने घर के बेशकीमती उपस्करों, दर्जनों ड्राअरों से युक्त एक चीनी अलमारी जो अनेकानेक आकृतियों- सेतु पार करते जीव जन्तुओं, गलियारों से झांकते लोगों, दरिया किनारे टहलते मनुष्यों- से सज्जित होगी, को लील लिया। उस अलमारी को लाखों लाख रूपयों से खरीदने की पेशकश को मां ने ठुकरा दिया था। कितनी बड़ी गलती! बेहतर होता बेच देती। हम सामने के दरवाजे की जानिब लौटे जहां आयाएँ एकत्र हो गयीं थीं। लंबी सी नसैनी से मदद की पुकारें लगाती आवाजें आ रही थीं। गली के नुक्कड़ पर गप मारने गया हुआ दरबान अग्निशामक को ढंग से चलाने के लिए वक्त पर नहीं पहुंचा। हमें आँगन की ओर ले जाया गया। किसी पेड़ तले खड़े हम आग की लपटों से घिरते घर को और अग्निशामक फायरमेनों के निरर्थक प्रयासों को देखते रहे। अब समझे ना, मैंने तुम्हारी सिगरेट सुलगाने को क्यों नकारा?- माचिसें मुझ पर क्यों इतना भयावना प्रभाव डालती हैं? तुमने देखा ना कि मैं कितना सेंसिटिव हूँ? बेशक, स्त्रियाँ खिड़की पर आ खड़ी हुईं थीं, लेकिन हमारी प्रचंड दिलचस्पी 'अलावÓ पर इस कदर जमी रही कि उन पर हमारा ध्यान जऱा नहीं गया। आखिरी बार माँ को इस तरह देखा: बालकनी की रेलिंग पर औंधी लटकी हुई! और हाँ, ड्राअरों से युक्त चीनी अलमारी? संयोगवश चीनी अलमारी आग से बच गयी! कतिपय नन्हीं आकृतियाँ-जिनके अनंतर उत्कीर्णित 'गोदी में बालक उठायी एक स्त्री Ó की मूरत मां और मुझसे किंचित मेल खाती थी- नष्ट हो गयीं।