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Saturday 18 Nov 2017

सिल्विना ओकेम्पो की तीन कहानियां \'तलघर\'

अनुवाद
 इंदुप्रकाश कानूनगो
282, रोहित नगर(प्रथम) गुलमोहर, भोपाल- 462039,   मो. 9981014157

1) तलघर
जाड़े के दिनों शीत से थरथर काँपता तलघर गर्मी में स्वर्ग बन जाता है। जनवरी के बेहद तप्त क्षणों में, जीने के ऊपरी सिरे खुलते द्वार पर, शीतल हवा की तलाश में कुछ लोग फर्श गंदी करते बैठे होते हैं। कोई भी खिड़की दिन की चिलकती रोशनी, न झुलसाती गरमी को भीतर आने देती है। मेरे पास , किसी, कोई करोड़पति  ग्राहक द्वारा प्रदत्त एक बड़ा सा आईना , एक काउच या कहो खटिया, और अन्य लड़कियों से बीते वर्षों मिली चार चटाइयाँ हैं। सुबह मैं(पड़ोसी इमारत के पहरेदार द्वारा उधार दी हुई) बालटियाँ पानी से भरती हूँ ताकि अपना चेहरा और हाथ साफ  कर लूँ। मैं अत्यंत साफ रहती हूँ। मेरे पास अपने वस्त्रों के लिए-परदे के पीछे- एक हेंगर, और मोमबत्तियों के लिए एक अंगीठी-कानस है। बिजली और नल नहीं हैं। मेरी नाइट-मेज एक कुर्सी है और मेरी बैठक एक मखमली तकिया है। मेरा कोई एक युवतम ग्राहक अपनी दादी के घर से पुराने परदों की जो कतरनें लाया उनसे, और पत्रिकाओं से काटे चित्रों के द्वारा मैंने दीवालें सजायी हैं। ऊपर के मकान में रहती मालकिन मुझे लंच खिलाती है; जबकि, नाश्ते के लिए मेरे पास कैंडी, अथवा, अपनी जेबों में समा सकें ऐसे इस्किट विस्किट होते हैं। यहां चूहे भी हैं; आरंभ में लगा कि इस भूतल - कि जिसका मुझे भाड़ा नहीं देना पड़ता है- में यही एकमात्र दोष है। अब मैंने गौर से देखा कि ये पशु इतने भयानक नहीं हैं; वे पर्याप्त विवेकशील हैं। कुल मिला, मक्खियों की तुलना में वे बेहतर हैं कि जो ब्यूनेसायर्स के सुन्दरतम घरों (जिनमें, जब मैं ग्यारह की थी, मालिक जूठन देते थे) में अनगिनत पायी जाती हैं। जबकि यहां ग्राहकों को चूहे दूर रखते हैं; उन्हें विभिन्न किस्म की खामोशियों के दरम्यान भेद का ज्ञान है। मेरे तन्हा होते ही वे बड़े कोलाहल के साथ बाहर निकल आते हैं। वे दौड़ते ही जाते हैं, बस पल भर ठहर, झुककर चितवन से मेरी ओर ताकते हैं, मानो उन्होंने उनके बाबत् मैं जो सोचती हूं उसे भांप लिया हो। यदा कदा फर्श पर रखा पनीर या ब्रेड का कोई टुकड़ा खा लेते हैं। न वो, न मैं- हम दोनों एक दूसरे से नहीं डरते। सबसे खराब बात तो यह है कि मैं कोई राशन जमा नहीं रख सकती क्योंकि खुद खाऊंँ  उसके पहले ही वे उसे चट कर जाते हैं। घटनाओं के इस चक्कर से खुश होते कतिपय दुष्ट लोग मुझे फरमिना, छछुंदरिया के नाम से पुकारते। मैं उन्हें मजा प्रदान करने के लिए जरा नहीं चिढ़ती। बल्कि उनसे चूहादानी मांगने की इच्छा तक नहीं दर्शाती। उनमें से एक- सबसे वयोवृद्ध- का नाम है चार्ली चैपलिन, दूसरे का ग्रेगरी पेक, तीसरे का मार्लोन ब्रेण्डो, चौथे को द्यूलियो मार्जियो ; एक कि जो बड़ा नटखट है उसे डेनिएल गेलिन, फिर कोई यूल ब्रायनर; एक मादा जीव जीना लोलो ब्रिगिडा और एक सोफिया लॉरेन कहलाती। वाकई कितना अजीब कि इन छोटे छोटे जीवों ने ऐसे तलघर में बसेरा डाला कि जहाँ, बेशक, वे मेरे आने के पहले से यहाँ रहते आये। यहाँ तक कि सीलन भरी दीवार में उभरी आकृतियों ने चूहों का रूप लिया है; स्याह और काफी कुछ लंबी उन सूरतों में दो छोटे छोटे कान और एक लंबी नुकीली पूँछ हैं। जब कोई नहीं देख रहा हो, सड़क पार बने घर में रह रहे आदमी द्वारा मुझे प्रदत्त किसी एक तश्तरी में, मैं उनके लिए खाना जुटाती हूँ। मैं नहीं चाहती वे मेरा साथ छोड़ें। अगर कोई पड़ोसी यहाँ आ उन्हें किन्हीं पिंजरों अथवा किसी पालतू बिल्ली से हताहत करने आये, तब मैं ऐसा हंगामा खड़ा करूँगी कि वह ताजिन्दगी कभी नहीं भूले।
उन्होंने चेतावनी दी यह घर तोड़ दिया जाएगा, लेकिन मैं मरते दम यहां से नहीं हिलूंगी। ऊपरी मंजिलों में संदूकें और थैले भरे तथा अविरत सामान बांधे जा रहे हैं। सदर फाटक पर गाडिय़ां चल रही हैं, लेकिन मैं उनके निकट से यों गुजरती हंूँ मानों मैने उन्हें देखा ही न हो। उन महानुभावों से मैंने कभी एक भी सेंट नहीं मांगा। वे दिनभर मेरी जासूसी करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है मैं ग्राहकों से सांठ गांठ करती होंगी क्योंकि उन्हें भड़काने के लिए मैं खुद ही से बातें करती रहती हूं। मुझसे खफा होने की वजह, वे दरवाजा भिड़ा ताला जड़ देते हैं; क्योंकि मैं उनसे नाराज हूं, मैं उनसे दरवाजा खोलने की याचना नहीं करती। पिछले दो दिनों से चूहे विचित्र हरकतें करने लगे हैं; किसी एक ने कोई अंगूठी, तो दूसरे ने कोई कंगन और किसी बड़े चतुर-तीसरे ने कोई नेकलेस मुझे ला दी। पहले तो मैंने यकीन नहीं किया, और कोई भी कैसे करता। मैं प्रसन्न हूँ। अगर यह सब ख्वाब हो, क्या फर्क पड़ता है? मुझे प्यास लगती है मैं अपना ही पसीना चाट लेती हूँ। मुझे भूख लगती है: मैं अपनी ही उंगलियाँ और बाल चबाती हूँ। कोई पुलिस मुझे खोजने नहीं आयेगी। वे मुझसे स्वास्थ्य अथवा अच्छे आचरण संबंधी कोई प्रमाण तो नहीं मांगेंगे। छत खरखरा रही है। घास फूस की पत्तियाँ उड़ उड़ नीचे गिर रही हैं: शायद घर को उखाड़ गिराने की शुरूआत हो रही है। चीख पुकारें मच रहीं हैं। लेकिन उनमें मेरा नाम नहीं है। चूहे भयभीत हैं। बेचारे! वे नहीं जानते , नहीं समझते कि संसार कैसे चलता है। उन्हें प्रतिकार के आनंद का ज्ञान नहीं है। किसी छोटे से दर्पण में अपनी सूरत देखती हूँ। सारे जीवन शीशे में देखती अपनी सूरत के बरक्स पाती हूं कि मैं इतनी सुन्दर कभी नहीं दिखी।