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Tuesday 21 Nov 2017

दरकिनार

राकेश भारतीय
 590, डीडीए फ्लैट्स, पाकेट-ए सेक्टर- 22, द्वारका
नई दिल्ली - 110077
मो. 09968334756
बाज़ार में वर्षों पहले आये हुए लोग हाल में इधर से गुजरते तो उन दुकानों को खोजते जो कभी उनकी खऱीदारी का प्रिय पड़ाव हुआ करती थीं। देश के विभाजन के बाद विस्थापितों की रोजी-रोटी सुनिश्चित करने के लिए बसाया गया यह बाज़ार तब ग्राहकों के रूप में ज़्यादातर उन्हीं सरकारी कर्मचारियों को देखने का आदी था जो पास की कॉलोनियों में रहते थे तथा जेब ढीली करने के मामले में दिक्कतें पेश करते रहते थे। तमाम कर्मचारियों की रोजमर्रा की ज़रूरत वाली चीज़ों की उधारी खऱीद का खाता दुकानदारों के पास खुला रहता था और रकम चुकता करने के मामले में कर्मचारी का नियमित रहना तथा रकम चुकाने का तगादा करने में दुकानदार का धैर्य दिखाना इत्यादि ग्राहक-दुकानदार के सम्बन्धों का तापमान तय किया करते थे। तापमान तय करना मुश्किल तब हो जाता था जब आमदनी में कुछ इजाफ़ा करने के चक्कर में अपने नियमित दुकानदार को कोई नियमित ग्राहक अपने घर के किसी कोने में कुछ सामान जमा करने की सुविधा दे देता था और सुविधाशुल्क मिलने के बावजूद अपनी उधारी को निपटाना टालते रहने की कोशिश करता था। यहां गुजारे गये बचपन के दिनों की सबसे कटु स्मृति तेजेन्द्र की वही है जब वह सुबह-सुबह स्कूल जाने के लिए बस्ता टांगे खड़ा था और दुकानदार अंकल आकर उसके पिता पर चीखे जा रहे थे-धर्मशाला नहीं खुला है मेरे यहां . . . . . उधारी चुकता करो अभी। चार महीने की उधारी है . . .  
उस वक्त उसे सारा तमाशा बहुत अपमानजनक लगा था। बहुत बाद में ही वह समझ पाया था कि ग़लती पिता की ही थी। पिता, जो गांव पैसा भेजने और शहर में पैसा बचाने के दो छोरों के बीच तनी हुई रस्सी पर चलते हुए अक्सर ही लडख़ड़ाते रहते थे।
चलते-चलते अचानक रुक कर तेजेन्द्र बायीं ओर सिर घुमाकर ऊपर-नीचे ग़ौर से कुछ देखने की कोशिश करने लगा तो साथ ही रुके खड़े रोहन ने पूछा-आप यहां क्या खोज रहे हैं, एक दुकान। तो साइनबोर्ड पढ़ लीजिये न। यहां तो . . . . डैश गारमेंट्स . . . . यूनिसेक्स हेयरड्रेसर्स . . . . कैलिफोर्निया बेकरी . . .
नहीं, नहीं। ये सब तो नई खुली दुकानें लगती हैं। वो दुकान सतपाल स्टेशनरीज़ के नाम से थी और उसके बाहर पतंगें भी रखी रहती थीं। कॉपी-शॉपी खरीदते रहने के साथ मैं कभी-कभार पतंग भी खऱीद ले जाता था और घंटों उड़ाता रहता था। रोहन ने पिता को किंचित आश्चर्य से देखा और कहा वॉऊ! यू हैड ऑल द टाइम टु फ्लाई काइट्स! तेजेन्द्र के चेहरे पर क्षीण सी मुस्कान उभरी। फिर उसने बेटे से कहा तब आसपास की कॉलोनियों के बीच कितनी-कितनी खुली जगह हुआ करती थी . . .एक-दो ही कारें दिखती थीं . . गिव वे पापा . . .रोहन के टोकने पर उसे अहसास हुआ कि विदेशी मूल के एक पुरुष और दो स्त्रियों के दुकान-संधान में वह अनजाने ही बाधा सा बना खड़ा हो गया है।                                                                                                                                                                    
ओह सॉरी! झट से कह कर तेजेन्द्र एक तरफ  हो गया और बड़बड़ाया और तब इस बाज़ार में किसी विदेशी का दिख जाना तो अजूबे से कम नहीं हुआ करता था। डिफऱेन्ट टाइम्स!् कह कर रोहन हंसा। येह, डिफऱेन्ट टाइम्स। कह कर तेजेन्द्र ने बेटे से आगे बढऩे को कहा।
गुजरात में नौकरी लगते ही तेजेन्द्र इस शहर से निकल गया था। वहीं गुजरात में एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित होते हुए या नौकरी बदलते हुए पंद्रह साल गुजर गये। जिस शहर में बचपन बीता, पढ़ाई-लिखाई हुई वहां कभी आया भी तो जैसे दीवाल छूकर वापस चला गया। पर इस वाली नौकरी का पैकेज इतना आकर्षक था कि तेजेन्द्र ने गुजरात से बोरिया-बिस्तर बांध कर निकलने का निर्णय लेने में बस एक हफ़्ता लगाया, वापस अपने बचपन के शहर में पहुंच जाना बिना मांगा बोनस भर था।
पुराने शहर के नये सांचे में ढल चुके स्कूलों के नये ही कि़स्म के नखरों से पार पाकर बेटे का दाखिला करवाने के बाद तेजेन्द्र उसे यहां की चीज़ों से परिचित कराने के मिशन पर था। चार्ट पेपर, रंगीन पेंसिल, भारत का भौगोलिक मानचित्र, पेंसिल-बॉक्स इत्यादि की सूची बेटे ने उसे थमाई नहीं कि तेजेन्द्र के मुंह से निकला- चलो, उस पुराने बाज़ार चलते हैं जिसके पास मैं कभी रहा करता था। वहां स्टेशनरी की एक बहुत बढिय़ा दुकान है। पर सतपाल स्टेशनरीज़ ढूंढ़े नहीं मिल रही थी।
इस बार ठिठक कर रोहन रुका। एक साइनबोर्ड को दो क्षण घूरने के बाद किलकारी जैसी आवाज़ निकाल कर बोल पड़ा व्हाट अ सरप्राइज़ पापा! पिज़्जा का सबसे बढिय़ा ब्रांड यहां भी! ठीक है, ठीक है। आजकल पिज़्जा हर जगह मिल रहा है। वापस घर लौटकर बना रखा खाना भी तो खाना है। तो मैं कौन अभी खाने जा रहा हूं। मैंने तो बस यहां नोट कर लिया। कहकर रोहन ने तर्जनी से सिर के पिछले हिस्से पर दो बार ठकठका दिया। तेजेन्द्र को हंसी आ गई। बेटे को वह पेटूराम या खद्दूराम कहकर कितना भी चिढ़ाये, तरह-तरह के व्यंजन आजमाने की प्रतीक्षा में उसका उत्साह कम नहीं होता था। इधर वह अख़बार में लगभग नियमित रूप से व्यंजनों का कॉलम पढ़ता रहता था और वही ृृपढ़कर एक दिन उसने मां-बाप को टोक दिया था आप लोग मुझे झूठ ही चिढ़ाते हैं। दरअसल मैं फ़ूडी हूं। एक फ़ूडी ही फ़ूड की असली वैल्यू जान सकता है।
बाज़ार का हुलिया वाकई काफी बदल गया लगता था। पहले के दिनों में तेजेन्द्र मुंह उठाये सीधे यहां आता था और सीधे अपने काम की दुकान पर पहुंच जाता था। अब कुछ संभल-संभल कर चलते हुए वह इस कोशिश में था कि कोई भी स्टेशनरी की दुकान दिख जाये तो वह बेटे का सामान लेकर वापस हो। उसके दायें-बायें से निकले जा रहे लोग इतने अलग किस्म के ग्राहक लग रहे थे और दिख रही दुकानों के थोबड़ों पर इतना अजनबीपन पसरा हुआ था कि सतपाल स्टेशनरीज के संधान को अब उसने स्थगित कर दिया था। बायीं हथेली अपने मुंह से आगे कर और दायीं हथेली से बेटे को रोक कर तेजेन्द्र ने एकदम से कदम रोक लिये। उसे लगा था कि कहीं नीचे से अचानक ऊपर आकर किसी तोंद ने उसका रास्ता रोक लिया है। ओय गट्टू अपना बचपन का नाम सुन कर चौंकते हुए तेजेन्द्र ने नजऱें उठाईं। दो क्षण समय लगा पहचानने में पर फिर वह तेजी से बोला मदन। बड़े मोटे हो गये, भाई। पर तुम यहां कैसे?
मैं? मैं तो यहीं हूं।  मदन ने उसे बाहों में घेर कर एक तरफ कर लिया।
 कहां?
ये नीचे बेसमेंट में। कहकर मदन ने दायां हाथ हिलाते हुए इशारा किया। अब गौर से देखने पर तेजेन्द्र को महसूस हुआ की सीढिय़ां वहां से नीचे बेसमेंट में जा रही हैं। ये . . . मेरा बेटा। कह कर रोहन की ओर इशारा करने के बाद तेजेन्द्र ने बेटे से कहा- ये मदन अंकल हैं, मेरे बचपन के दोस्त। रोहन के अभिवादन के उत्तर में उसकी पीठ पर दो धौल जमाकर मदन बोला चलो, दुकान में चलते हैं।
नीचे बेसमेंट में चारों तरफ  कार्टन ही कार्टन सजे हुए था। तेजेन्द्र ने उन पर नजऱें घुमाने के बाद मदन से पूछा ये किस चीज़ की दुकान खोल रखी है...  वाक्य अधूरा ही छोड़ कर मदन ने कोने में बैठे हुए एक मरियल आदमी को आवाज़ दी -ले आ ठण्डा-शण्डा जल्दी से। वह आदमी पैर घसीटते हुए सीढिय़ां चढ़ गया। अब मदन तेजेन्द्र की तरफ  झुक कर जैसे कोई राज की बात बता रहा हो, आहिस्ता से बोला- देख, गट्टू। बाज़ार में वही सलामत बचता है जो बदली हुई हवा में अपना बदला हुआ रोल समय से समझ ले। धीरे-धीरे तो हर चीज़ बदलती है पर यह बाज़ार पिछले पांच-छह सालों में बड़ी तेजी से बदलता चला गया। मोटी पूंजी वाले मोटे आसामियों को तेजी से फैल रहे इस शहर के इस बाज़ार के बड़े मौके की जगह पर होने का आइडिया एक बार आया नहीं कि बस दे धड़ाधड़ दे धड़ाधड़ . . . .तभी कोल्डडिं्रक की बोतलें आ जाने के कारण वाक्य को अधूरा ही छोड़कर वह रोहन की ओर मुड़ कर बोला-पी जा पुत्तर। बोर तो नहीं हो रहा?
रोहन ने मुस्कुरा कर सिर हिला दिया तो मदन फिर तेजेन्द्र से मुखातिब हुआ- हां तो मैं कह रहा था कि दे धड़ाधड़ दे धड़ाधड़ नेशनल-इन्टरनेशनल ब्रांड मुंह उठाये इधर आये और झण्डे गाड़कर बैठ गये। अब बता इनके सामने हम जैसे पुरानी परचूनी क्या करते?
बेसाख्ता तेजेन्द्र के मुंह से निकला- क्या करते?
दुकानों की पगड़ी बढऩे लगी, क़ीमत बढऩे लगी तो कुछ दुकानदार मोटा पैसा अंटी में डाले और यहां से निकल लिये। बाकी बचे हमारे जैसे लोग अपनी पुरानी जगह पर इन मोटे आसामियों की दुकान सजवाने लगे और खुद ज़मीन खोद कर बेसमेंट में घुस गये। हर महीने तय रकम अपनी जेब में आती है। ऊपर बैठा नया दुकानदार क्या बेचे अपन को मतलब नहीं। अपन तो बेसमेंट में आराम से बैठे हैं कि अपनी दुकान चले या न चले। महीने की तय रकम कहीं गयी नहीं . . .
पर तुम्हारे ऊपर वाली दुकान है किस चीज़ की? फ्फ़ह फ्फह . .  कर हंसते हुए मदन बोला- भुने हुए कुक्कड़ की, इन्टरनेशनल ब्रांड। सुबह-सुबह ट्रक में लदकर देसी कुक्कड़ आते हैं और इन्टरनेशनल ब्रांड में तले भुने जाकर बेवकूफ  ग्राहकों की अंटी ढीली करवाते हैं। अपन ठहरे शुद्ध शाकाहारी और किस्मत देख! रोज अपनी छत के ऊपर तले-भुने कुक्कड़ झेलना पड़ता है। पर अपन को तय रकम से मतलब . . . फ्फह् फ्फह। रोहन अचानक जोर से हंस पड़ा। मदन उसकी ओर मुड़कर बोला-क्या हुआ?
अंकल, आप बड़ी मज़ेदार बाते करते हैं। रोहन फिर हंस दिया। अच्छा!
और नहीं तो क्या? चिकन को कुक्कड़-कुक्कड़ कहे जा रहे हैं। इस वाले चिकन का तो अख़बार में एडवरटिज़मेंट आता है। उसमें चिकन हैट पहने रहता है।
ओ। ये लड़का तो बड़ा इंटेलिजेन्ट है। कहकर मदन हंसा।  
तेजेन्द्र भी हंसकर बोला अख़बार में ये सबसे पहले खाने के आइटम वाले एडवरटिज़मेंट ही देखता है।  वाह ! कहकर मदन ने रोहन को थोड़े गौर से देखा। फिर तेजेन्द्र की ओर मुड़ा वैसे यार तू इधर आया किस काम से था? इतने साल गुजरात में बिता कर कुछ महीने पहले ही यहां आया हूं। अब यहीं नौकरी है। इसके स्कूल एडमिशन के लिए चक्कर लगाता रहा। अब थोड़ा सेटल हो गया हूं तो इसके लिए कुछ स्टेशनरी आइटम लेने वास्ते पुराना बाज़ार याद आया। सतपाल अंकल की दुकान खोज रहा था।
ये लै ! कहकर मदन ने माथे पर दो उंगलियां ठोंकी और आगे बोला- भाई, उनकी दुकान उठे हुए ज़माना गुजर गया। वो दुकान छोडऩे को तैयार नहीं थे और बेटा पीछे पड़ा था कि बेचबाच कर पैसा अंटी करो और आराम से घर बैठो। भाव ही यहां की दुकानों के इतने बढ़ गये कि बेटे को लालच आना ही था। अंत में रोज-रोज के टंटे से तंग आकर उन्होंने दुकान उठा ही दी। बड़ी अच्छी दुकान होती थी उनकी। मैं जब भी कॉपी- किताब खरीद कर पैसे देता वे उसे गिनते तक नहीं। बस कहते कि इसी तरह पढ़ाई जमाये रखो। तेजेन्द्र ने उसांस भरी। पचास साल पुरानी दुकान थी उनकी। मोह हो ही जाता है। ऊपर मेरी दुकान से भी कॉलोनी के पचास घरों में सामान जाता था, कितने-कितने लोगों से घरेलू सम्बन्ध बने। मुझे क्या अच्छा लगा उस जगह पर दूसरे को बिठाते हुए। मेरी मां तो दो हफ़्ते तक मुझसे बोली भी नहीं, कहती थी कि पुश्तैनी जगह पर दूसरे को बिठाने का सौदा कर डाला बेटे ने। पर भाई, मैं इस बाज़ार से लड़ नहीं सकता। मैं तो हर महीने की तय रकम बांध कर बीवी-बच्चों को . . . .पापा, मेरी लिस्ट की चीज़ें . . . रोहन ने आहिस्ते से इतना कहकर पिता के कंधे पर थपथपा दिया।
हां, हां। यार, तू तो इसकी चीज़ें खरीदने आया था। मदन को अहसास हुआ तो उसने बात बीच में ही रोक दी।
हां, अब चलूं। कहकर तेजेन्द्र उठा और मदन से पूछा- पर सतपाल अंकल गये कहां?
 यहीं, इस बाज़ार में हैं।
 यहां! तेजेन्द्र के चेहरे पर आश्चर्य उभरा। गये ही नहीं बेटे के साथ। एक नये खुले और बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर में नौकरी पकड़ ली। क्या-क्या नहीं मिलता है उस स्टोर में। वहां स्टेशनरी वाला सेक्शन देखते हैं। कहते हैं कि यही काम मैं ढंग से समझता हूं। हो जाती है मुलाकात कभी आते-जाते।
तेजेन्द्र ने उस स्टोर का रास्ता पूछा तो मदन सीढिय़ों से ऊपर आकर रास्ता बाक़ायदा बता-समझा गया।
डिपार्टमेंटल स्टोर इतना बड़ा और भव्य था कि एकबारगी तेजेन्द्र की आंखें ही चौंधिया गयीं। असमंजस में खड़े-खड़े कुछ क्षण ही बीते होंगे कि एक स्मार्ट सी लड़की लपकती हुई आयी और बोली येस सर!
 स्टेशनरी सेक्शन, प्लीज़। तेजेन्द्र झटके से बोला।
 दिस वे, सर। कहती हुई वह लड़की तेजेन्द्र के आगे-आगे चल पड़ी। सुर्ख लाल स्कर्ट पहने हुए वह अपनी ऊंची एड़ी वाली जूतियों से ट्याक् ट्याक्  जैसी आवाज़ निकालती जा रही थी। राइट हियर, सर! कहकर उस लड़की ने तेजेन्द्र को जिस काउंटर पर खड़ा किया वहां उसकी स्कर्ट के रंग का ही टीशर्ट पहना हुआ एक आदमी खड़ा था। ऐट योर सर्विस, सर। उस आदमी ने कहा, तो अब पूरी सफेद हो चुकी मूंछों तथा पहले से बहुत झटक गये शरीर के बावजूद उसे सतपाल अंकल के रूप में पहचानने में तेजेन्द्र को दिक्कत नहीं हुई।
पहचाना अंकल, मैं गट्टू। आपकी दुकान से . . .।
योर रिक्वायरमेंट, सर। उन्होंने तेजेन्द्र की बात काटकर इतना कहा तो उसे समझ में नहीं आया कि उन्होंने जानबूझ कर उसकी बात काटी है या वाकई पहचान नहीं पाये हैं। पर रिक्वायरमेंट शब्द सुनते ही रोहन ने जेब से अपनी लिस्ट निकाली और उन्हें थमा दी। लाल टीशर्ट वाले आदमी ने एक बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर के अनुभवी सेल्समेन की सक्रियता से रोहन की ज़रूरत का सारा सामान आनन-फानन में एक लाल ट्रे में सजाकर सामने रख दिया और कहा पेमेंट ऐट दैट कॉर्नर काउंटर, सर। तेजेन्द्र चुपचाप ट्रे उठाकर उस काउंटर की तरफ  बढ़ गया।
भुगतान करने के बाद बाहर जाते हुए तेजेन्द्र ने एक क्षण ठिठक कर पीछे इस उम्मीद में देखा कि शायद अब वे उसे एक नजऱ देख रहे हों। पर नहीं. . वे तो काउंटर पर आ खड़े हुए एक नये ग्राहक की ज़रूरत का सामान निकालने में व्यस्त थे।