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Friday 24 Nov 2017

जादू

प्रमोद कुमार बर्णवाल                         
द्वारा- प्रो. राजकुमार,
न्यू एफ- 14, हैदराबाद कॉलोनी,
बीएचयू , वाराणसी - 221005
 मो. 9451895477
दरवाज़े   के खुलते ही उनमें हरकत हुई थी।
वे कईं थीं। कुछ ऊँची छत तक छूती आलमारियों पर सवार थीं। कुछ दीवारों पर बने हुए रैक पर। कुछ कुर्सियों पर, कुछ मेज पर पड़ी थीं। कुछ मेजों और कुर्सियों के नीचे। कुछ नंगे फर्श पर।
कुछ ताजग़ी के सुवास से भरी थीं। सफेद। कुछ थोड़ा सफेद, थोड़ा पीलापन लिए। कुछ फटी हुई, मुड़ी-तुड़ी, छिद्रित। कुछ बिल्कुल पीली पड़ गईं थीं। कुछ ने अपने भीतर धूल की तहें समेट ली थीं। कुछ ने दीमकों को आश्रय दिया था, कुछ ने मकड़ी के जाले को। कुछ जीर्ण- शीर्ण हो गईं थीं। कुछ इतनी कि हाथ लगाते ही टूट कर नीचे गिरने लगे।
वे दिखने में चिडिय़ों के समान बहुत छोटी-सी थीं, इतनी कि अगर ब्रह्मांड का नक्शा बनाया जाये तो उसमें उनका अस्तित्व विलीन हो जाए; लेकिन आश्चर्य यह था कि वे अपने भीतर पूरे ब्रह्मांड को समेटे हुए थीं।
वे सभी उत्सुक थीं, और दरवाज़ा खोलकर अन्दर कदम रखने वाले जादूगर को बहुत अरमानों से देख रही थीं। जादूगर बहुत भूखा और बेचैन था, उसके चेहरे पर असंतुष्टि के भाव थे, जाने कौन-सी बातें उसे रह रहकर परेशान कर रहीं थीं। उसका सिर नीचे झुका हुआ था और उसमें आत्मविश्वास की कमी साफ -साफ  झलक रही थी।
भूखे- बेचैन-असंतुष्ट जादूगर ने बड़ी उम्मीद के साथ एक की ओर अपने हाथ बढ़ाए।
जादूगर ने जिसकी ओर अपने हाथ बढ़ाए थे, उसकी खुशी का कोई पारावार ही न रहा ; वह बहुत खुश हो गई और चिडिय़ा की तरह उसने अपने थोड़े सफेद, थोड़े पीले पंख फडफ़ड़ाने शुरू कर दिए।
जादूगर के हाथों का सुखद स्पर्श पाते ही उस चिडिय़ा ने अपने पंखों को फडफ़ड़ाना बन्द कर दिया ; और शान्तचित्त होकर जादूगर के अगले कदम का इंतज़ार करने लगी। जादूगर ने उसके पहले पंख पर अपनी नजऱें डालीं और वहाँ उगे मोतियों को निहारने लगा।
अपने पहले पंख पर जादूगर की नजऱें पड़ते ही उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और मन ही मन खुदा से प्रार्थना करने लगीं।
कुछ देर तक पहले पंख पर उगे मोतियों को निहारने के बाद जादूगर ने उसे आलमारी में वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था।
       जादूगर द्वारा फिर से आलमारी में रख दिए जाने पर वह बहुत उदास हो गई। खुदा के द्वारा उसकी प्रार्थना ठुकरा दी गई थी, मन में यह खय़ाल आते ही उसे और भी बुरा लगने लगा; वह आत्मग्लानि से भर गई। उसका हृदय शोक से भर गया; शोक में वह अपना संतुलन ठीक से रख नहीं पा रही थी। अचानक उसके कदम लडख़ड़ाए, और वह तेजी से आलमारी से नीचे फर्श की ओर गिरने लगी।
     नीचे गिरने पर उसका क्या अंजाम होगा, इसकी कल्पना कर वह सिहर गई। उसने डर से अपने सारे पंख जोर - जोर से फडफ़ड़ाने शुरू कर दिए। जोर से आवाज़ करते हुए वह फर्श पर गिर पड़ी; गिरते समय वह फर्श पर कुछ दूर तक घिसटती चली गई। उसके कुछ पंख टूट गए थे; अपने टूटे पंखों को देखकर वह दुख से भर गई। उसने एक नजऱ जादूगर पर डाली और बहुत ही हसरत से उसे देखने लगी।
लेकिन उसे मायूस होना पड़ा, जादूगर ने नजऱें उसकी ओर से फेर लीं थीं, और दूसरी आलमारी की ओर अपने कदम बढ़ा दिए थे।
      जादूगर दूसरी आलमारी की ओर बढ़ा। जादूगर को अपनी ओर बढ़ते देख उस आलमारी पर बसेरा करने वालीं सारी चिडिय़ा अत्यन्त प्रसन्न हो गईं। वे बहुत ही आशा से जादूगर को देखने लगीं। जादूगर ने एक सफेद- पीले पंखों वाली चिडिय़ा की ओर अपने हाथ बढ़ा दिए, और उसे अपनी हथेलियों में भर लिया। जादूगर के द्वारा स्पर्श किए जाने के कारण सफेद- पीले पंखों वाली चिडिय़ा गर्व से भर गई, और थोड़ा अहं से भी।
....गर्व से इसलिए क्योंकि अन्य चिडिय़ा उसे यदा कदा चिढ़ाती रहती थीं कि उसका कोई कद्रदान नहीं। अनेक जादूगर उस आलमारी के पास से गुजरते, वे अन्य को स्पर्श करते, किन्तु एक लम्बे समयांतराल से उस सफेद - पीले पंख वाले चिडिय़ा की ओर किसी ने देखा तक नहीं था।
....अहं से इसलिए क्योंकि लम्बे समयांतराल से उसे किसी ने स्पर्श नहीं किया था, और आज जब किसी ने उसे स्पर्श किया तो उसे लगा कि उसका आज भी महत्व है। उसके बिना काम नहीं चल सकता। वह बेकार नहीं हुई है।
और यह भाव आते ही उसने अपने सारे पंंख आपस में जोर से चिपका लिए।
जादूगर ने उस चिडिय़ा का एक पंख खोलने की कोशिश की, पर वह खोल नहीं सका। जादूगर ने फिर कोशिश की, लेकिन चिडिय़ा तब भी नहीं मानी। जादूगर ने अपनी उंगलियों का दबाव डाला, लेकिन चिडिय़ा भाव खाती रही, उसने अपने पंख नहीं खोले। तब जादूगर ने हाथ की उंगली अपने मुँह में डाली ; और लार से अपनी उंगली गीली करने लगा। उसने अपनी गीली उंगली से पंख को स्पर्श किया; चिडिय़ा की आँखें भर आईं, और उसने अपने पंख खोल दिए। एक पंख को निहार लेने के बाद जादूगर ने दूसरे पंख को खोलने की कोशिश की; चिडिय़ा ने खुशी खुशी अपना दूसरा पंख जादूगर के सामने खोल दिए। जादूगर ने चिडिय़ा के कुछ और पंख खोलने की कोशिश की; चिडिय़ा खुशी खुशी जादूगर का साथ देती रही।
कुछ पंखों को निहार लेने के बाद जादूगर ने उस चिडिय़ा को पुन: आलमारी में रख दिया। वह चिडिय़ा खुशी से भर गई थी, वर्षों बाद किसी ने उसे स्पर्श किया था। उसने गर्व से अपने अगल बगल की चिडिय़ों को देखा। अगल बगल की चिडिय़ा उसे ईष्र्या से देख रहीं थीं। अगल बगल की चिडिय़ों में से एक झक्क सफेद पंख वाली चिडिय़ा बहुत ही शर्मिन्दा होने लगी थी, ऐसा इसलिए क्योंकि सफेद-पीले पंख वाली चिडिय़ा को सबसे ज़्यादा वही चिढ़ाती थी। एक बार तो झक्क सफेद पंखों वाली चिडिय़ा ने सफेद - पीले पंखों वाली चिडिय़ा पर व्यंग्य करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि -तुम बूढ़ी हो चुकी हो, तुम आउट ऑफ  सिलेबस हो।  
इस पर सफेद-पीले पंखों वाली चिडिय़ा ने अपना बचाव करते हुए कहा था, ÓÓनहीं, ऐसा नहीं है। कोई न कोई तो ज़रूर होगा जो मुझमें उगे मोतियों को चुगना चाहेगा; कोई न कोई मेरे मोतियों का कद्रदान ज़रूर होगा।ÓÓ
झक्क सफेद पंखों वाली चिडिय़ा ने जोर-जोर से हँसते हुए कहा, तुम भ्रम में जी रही हो, तुम्हारा ज़माना लद गया। अब बाज़ार में अनेक नई चिडिय़ा आ गईं हैं, उनकी मांग ज़्यादा है, तुम्हें कोई नहीं पूछेगा।
सफेद - पीले पंखों वाली चिडिय़ा ने कहा, मैं ऐसा नहीं मानती, तुमने मुझसे ज़्यादा दुनिया नहीं देखी है।
अगर ऐसा है तो क्यों नहीं इस बात पर शर्त लग जाए।
ठीक है, बताओ क्या शर्त लगाती हो ?
अगर आज के बाद कोई तुम्हें स्पर्श करता है तो फिर मैं तुम्हें अपना चेहरा कभी नहीं दिखाऊँगी।
ठीक है।
सफेद - पीले पंखों वाली चिडिय़ा ने झक्क सफेद ंपंखों वाली चिडिय़ा को बहुत ही गर्व से देखा। झक्क सफेद पंखों वाली चिडिय़ा को उसकी नजऱें बर्दाश्त नहीं हो पा रहीं थीं, उसने नीचे फर्श की ओर देखा, और छलांग लगा दी। वह अंधेरे में कहीं खो गई।
इन सब बातों से अन्जान जादूगर ने अब तक आलमारी में रखी दूसरी चिडिय़ा को उठा लिया था, और उसमें उगे मोतियों को निहारने लगा। दूसरी चिडिय़ा बहुत खुश हो गई।
जादूगर ने दूसरी चिडिय़ा के कुछ पंखों को उलट पलट कर देखा, और फिर उसे आलमारी में रख दिया। दूसरी चिडिय़ा सिसकियां लेने लगी। दरअसल जादूगर ने उसे आलमारी के सबसे ऊपर वाले रैक से उठाया था, किन्तु वहाँ रखने की बजाय उसने उसे नीचे के रैक पर रख दिया। दूसरी चिडिय़ा तीन महीने पहले किसी और आलमारी में रहा करती थी, उससे दो महीने पहले किसी और आलमारी में ; वह बार - बार कुछ जादूगरों की लापरवाही के कारण इधर से उधर विस्थापित होती रही थी। कई जादूगर थे जो दूसरी चिडिय़ा के कद्रदान थे, वे उसे सहेज कर रखना चाहते थे। वे कई बार उसे ढूंढते हुए उसके पुराने घर में जाते रहे थे, किन्तु उसके न मिलने पर उदास होकर किसी और चिडिय़ा से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करने लगे थे।  
जादूगर  एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक पुरानी चिडिय़ा को उठाया। पुरानी चिडिय़ा जादूगर का स्पर्श पाते ही प्रसन्न हो गई।
जादूगर ने पुरानी चिडिय़ा के कुछ पंखों को उलटा पलटा और खूब प्रसन्न हो गया। जादूगर को प्रसन्न होते देख पुरानी चिडिय़ा को यह समझते देर नहीं लगी कि उसके पंखों में वैसे मोती उगे हैं जिनकी जादूगर को तलाश थी।
अचानक जादूगर उदास हो गया। पुरानी चिडिय़ा को जादूगर की उदासी का कारण समझने में देर नहीं लगी; वह भी उदास हो गई। जादूगर ने पुरानी चिडिय़ा को उठाया और वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था। पुरानी चिडिय़ा ने कहना चाहा, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, कुछ दिनों पूर्व एक और जादूगर आया था, उसने मुझे उठाया, और अपने काम के पंख तोड़ कर ले गया, मैं असहाय भाव से उसे देखती रही, मैं कुछ भी नहीं कर सकी।
जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने एक चिडिय़ा को उठाया, और उसके कुछ पंख देखने लगा। जादूगर जैसे जैसे चिडिय़ा के पंख देखता जाता था, वैसे वैसे उसकी उंगुलियों पर धूल लगती जाती थी।
चिडिय़ा जादूगर के स्पर्श से खुश तो हो रही थी पर वह थोड़ी शर्मिन्दगी भी महसूस कर रही थी, वह जादूगर से कहना चाह रही थी, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है, मेरी देखरेख और साफ - सफाई की जि़म्मेदारी जिस पर है वह अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाता, तो इसमें मेरी क्या ग़लती?ÓÓ
धूल लगे पंखों से एक पुरानी गंध निकल रही थी। पुरानी गंध जादूगर के नथुनों से टकराई, और उसे जोर की छींक आ गई। जादूगर ने जल्दी से धूल लगे पंखों वाली चिडिय़ा को पुन: आलमारी में रख दिया और वहाँ से थोड़ी दूर हट गया। उसने अपना रूमाल निकाला, अपने हाथों में पड़े धूल को झाड़ा और अपनी नाक साफ  करने लगा।
जादूगर एक आलमारी की ओर बढ़ा। उसने उस आलमारी से एक चिडिय़ा निकाली, और उसके पंखों का अवलोकन करने लगा। उसने चिडिय़ा के एक एक पंख को देखा। अचानक जादूगर बहुत खुश हो गया। चिडिय़ा के पंख थोड़े पीले पड़ गए थे ; किन्तु सारे के सारे पंख सही सलामत थे। जादूगर ने खुशी से चिडिय़ा को चूम लिया। चिडिय़ा थोड़ा शर्माई फिर गर्व से भर गई।
जादूगर ने उस थोड़े पीली पड़ गई चिडिय़ा को बहुत प्यार से उठाया और कमरे के दरवाज़े की ओर बढ़ा। अन्य चिडिय़ा उस थोड़ी पीली पड़ गई चिडिय़ा को जादूगर के सिर पर मान सम्मान के साथ जाते हुए देखने लगी थीं, और मन ही मन उसकी किस्मत से ईष्र्या करने लगी थीं। जादूगर कमरे से निकल गया, और सारी चिडिय़ा उदास हो गईं। वे सब शान्त हो गईं, और इंतज़ार करने लगीं कि कभी न कभी, कोई न कोई जादूगर उस कमरे में आएगा जो उनका कद्रदान होगा; और वे चिडिय़ा भी अपने कद्रदानों के सिर पर मान सम्मान के साथ सवार होकर सैर को निकल जाएंगी।
भूखा- बेचैन-असंतुष्ट जादूगर कमरे से निकलकर एक ओर को गया। वहाँ अनेक मेजें और कुर्सियां लगी हुईं थीं। वहाँ पहले से अनेक छोटे बड़े जादूगर बैठे हुए थे, तो कुछ कुर्सियां खाली भी थीं। भूखा- बेचैन- असंतुष्ट जादूगर एक खाली कुर्सी पर बैठ गया, और सामने की मेज पर अपने साथ लाई चिडिय़ा को रख दिया। जादूगर ने बहुत प्यार और ध्यान से चिडिय़ा के पंखों को उलटना पलटना शुरू किया। चिडिय़ा के सारे पंखों पर अनेक मोती उगे हुए थे ; जादूगर ने एक पंख खोला और उसमें स्थित सारे मोतियों को खाने लगा, फिर उसने दूसरा पंख खोला और उसमें स्थित मोतियों को खाने लगा। आश्चर्यजनक यह था कि भूखा-बेचैन असंतुष्ट जादूगर जितने मोती खाता जाता था, उतने मोती फिर से पंखों पर उगते जाते थे।
चिडिय़ा वर्षों से लोगों की सेवा करती आई थी। वह लोगों को सभ्य, सुसंस्कृत, और जानकारी से परिपूर्ण करती रही थी। किन्तु कई लोग चिडिय़ा के इस सेवा- भाव से परेशान भी हुए थे; कई आतताइयों, हुड़दंगियों, और तानाशाहों ने उसे नष्ट भ्रष्ट करने का प्रयास किया; कई ने चिडिय़ों  को उनके आलय में ही जलाकर मार डालने का प्रयास किया, किन्तु तब भी चिडिय़ों का अस्तित्व बचा रहा। आतताइयों ने चिडिय़ों पर बार-बार अत्याचार किए; किन्तु वे चिडिय़ों का कुछ बिगाड़ नहीं पाए। चिडिय़ों पर जितना अत्याचार बढ़ा उनके चाहने वाले भी बढ़ते गए।
इधर कुछ समय से चिडिय़ा एक अजीब संकट से गुजर रहीं थीं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के विकास और उनकी लोकप्रियता ने चिडिय़ों के सामने एक नया प्रतिद्वंद्वी खड़ा कर दिया था। कुछ बुद्धिजीवी तो यहाँ तक कहने लगे थे कि अब चिडिय़ों का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है, वे जल्द ही नष्ट हो जाएंगी।
भूखा- बेचैन- असंतुष्ट जादूगर चिडिय़ा के पंखों को उलटता पलटता रहा और उसमें स्थित मोतियों को खाता रहा। जादूगर शब्दों और ज्ञान का जादूगर था, वह लोगों के बीच अपनी वक्तृत्व शैली के लिए प्रसिद्ध था, उसे विभिन्न गोष्ठियों में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता। उससे जब भी कोई सवाल किया जाता वह मुस्कुराते हुए आत्मविश्वास के साथ उसका जवाब देता। वह ऐसा जवाब देता कि लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते थे। उसके पास राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक सभी तरह के जवाब होते थे। वह जब भी किसी के पूछे सवाल का जवाब नहीं दे पाता, चिडिय़ों के पास चला आता। हाल ही में किसी मित्र ने उससे कोई सवाल किया था, उस समय वह उसका जवाब नहीं दे पाया था और तब से ही वह परेशान था, उसे अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती महसूस हुई थी। इससे उसका आत्मविश्वास थोड़ा कम हुआ था। उसी सवाल का जवाब पाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए वह इस समय चिडिय़ा की शरण में आया था।
जादूगर के पास इलेक्ट्रॉनिक माध्यम भी था, और वह जब तब उसका प्रयोग भी करता था। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को रखना और सहेजना सहज और आसान था, वह कम जगह भी घेरती थी; तब भी कुछ था जो उसे चिडिय़ों के पास आने के लिए आकर्षित करता था।
जादूगर मोतियों को लगातार खाए जा रहा था। वह जैसे जैसे मोतियों को खाए जा रहा था उसकी भूख मिटती जा रही थी, उसकी बेचैनी घट रही थी। वह मित्र द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब से रू ब रू होने लगा था। उसका आत्मविश्वास बढऩे लगा, उसका चित्त गज़़ब का शान्त होने लगा। चिडिय़ा के पंखों के सुखद स्पर्श ने उसमें जादू भर दिया था।